
- भागलपुर के जवाहरलाल नेहरू चिकित्सा महाविद्यालय अस्पताल (मायागंज) के हड्डी रोग विभाग में भ्रष्टाचार के गंभीर आरोपों के बाद प्रशासनिक हलचल तेज हो गई है, जहाँ एक विशेषज्ञ चिकित्सक पर मरीज के परिजनों से अवैध वसूली का आरोप लगा है।
- हड्डी रोग विशेषज्ञ डॉ. कन्हैया लाल पर आरोप है कि उन्होंने विभाग में भर्ती एक महिला मरीज के ऑपरेशन हेतु सर्जिकल सामान खरीदने के नाम पर परिजनों से 40 हजार रुपये की मोटी रकम की मांग की थी।
- मामले की गंभीरता को देखते हुए अस्पताल प्रशासन ने आरोपी चिकित्सक से स्पष्टीकरण मांगा था, जिसका लिखित जवाब बुधवार को अस्पताल अधीक्षक के कार्यालय में जमा करा दिया गया है।
- मायागंज अस्पताल के अधीक्षक डॉ. हिमांशु परमेश्वर दुबे ने मामले में त्वरित कार्रवाई करते हुए आरोपी डॉक्टर के जवाब को अग्रतर अनुशंसा और निर्णय हेतु बिहार सरकार के अपर मुख्य सचिव (स्वास्थ्य विभाग) को प्रेषित कर दिया है।
- सरकारी अस्पताल में निःशुल्क इलाज के दावों के बीच इस तरह के ‘कैश डिमांड’ ने अस्पताल की साख पर सवाल खड़े कर दिए हैं, जिससे अब स्वास्थ्य विभाग के मुख्यालय स्तर पर इस मामले की उच्चस्तरीय जांच और कार्रवाई की संभावना बढ़ गई है।
भागलपुर (द वॉयस ऑफ बिहार)।मायागंज में ‘कमीशन’ का खेल और बेबस मरीज: भ्रष्टाचार की जड़ें कितनी गहरी?
पूर्वी बिहार का सबसे बड़ा अस्पताल माना जाने वाला मायागंज (JLNMCH) एक बार फिर विवादों के घेरे में है। इस बार मामला किसी बुनियादी सुविधा की कमी का नहीं, बल्कि सीधे तौर पर एक चिकित्सक की कार्यशैली और ईमानदारी से जुड़ा है। हड्डी रोग विभाग, जहाँ अक्सर गरीब और मध्यम वर्गीय परिवारों के लोग गंभीर चोटों या फ्रैक्चर के इलाज के लिए पहुँचते हैं, वहां से 40 हजार रुपये की मांग की खबर ने पूरे जिले के स्वास्थ्य महकमे में हड़कंप मचा दिया है। सरकारी अस्पतालों की स्थापना इसीलिए की गई थी ताकि समाज के अंतिम पायदान पर खड़े व्यक्ति को बिना किसी आर्थिक बोझ के इलाज मिल सके, लेकिन डॉ. कन्हैया लाल पर लगे इन आरोपों ने इस पूरी अवधारणा को चुनौती दी है। जब रक्षक ही भक्षक की भूमिका में नजर आने लगे, तो पीड़ित मानवता का भरोसा टूटना लाजमी है।
घटनाक्रम: 40 हजार का वह ‘सर्जिकल’ सौदा
मामला तब सामने आया जब हड्डी रोग विभाग में भर्ती एक महिला के परिजनों ने अस्पताल प्रशासन के समक्ष अपनी पीड़ा रखी। परिजनों का आरोप था कि डॉ. कन्हैया लाल ने ऑपरेशन के लिए आवश्यक सर्जिकल आइटम (जैसे रॉड, प्लेट या अन्य इंप्लांट्स) की खरीद के नाम पर उनसे 40 हजार रुपये मांगे। परिजनों का कहना है कि उन्हें बताया गया कि यदि वे यह रकम नहीं देंगे, तो ऑपरेशन में देरी हो सकती है या सरकारी स्तर पर मिलने वाले सामान की गुणवत्ता ठीक नहीं होगी। एक गरीब परिवार के लिए 40 हजार रुपये की रकम जुटाना पहाड़ तोड़ने जैसा है। जब परिजनों को कोई रास्ता नहीं सूझा, तो उन्होंने अपनी आवाज बुलंद की और मामले की शिकायत अस्पताल के वरिष्ठ पदाधिकारियों से की। इस शिकायत ने अस्पताल के गलियारों में दबे पाँव चल रहे ‘कमीशन तंत्र’ की कलई खोलकर रख दी है।
आरोपी डॉक्टर का स्पष्टीकरण: बचाव की दलीलें या सच?
शिकायत मिलने के तुरंत बाद अस्पताल अधीक्षक डॉ. हिमांशु परमेश्वर दुबे ने डॉ. कन्हैया लाल को कारण बताओ नोटिस (Show-cause notice) जारी किया था। बुधवार को आरोपी चिकित्सक ने अपना लिखित स्पष्टीकरण अस्पताल कार्यालय में समर्पित कर दिया। हालांकि, डॉ. कन्हैया लाल ने अपने जवाब में क्या दलीलें दी हैं, इसका पूरा खुलासा अभी नहीं हुआ है, लेकिन सूत्रों की मानें तो उन्होंने खुद को निर्दोष बताते हुए आरोपों को निराधार बताया है। चिकित्सा जगत में अक्सर ऐसे बचाव लिए जाते हैं कि सर्जिकल सामान बाहर से मंगवाने की सलाह केवल मरीज की बेहतरी के लिए दी गई थी, लेकिन जब बात नकद राशि की मांग तक पहुँचती है, तो मामला आपराधिक हो जाता है। अब यह स्वास्थ्य विभाग के विशेषज्ञों का काम है कि वे इस जवाब की प्रमाणिकता की जांच करें।
अधीक्षक की कार्रवाई: गेंद अब पटना के पाले में
अस्पताल अधीक्षक डॉ. हिमांशु परमेश्वर दुबे ने इस संवेदनशील मामले में कोई ढिलाई न बरतते हुए फाइल को सीधे राज्य मुख्यालय भेजने का निर्णय लिया। अधीक्षक ने डॉ. कन्हैया लाल द्वारा दिए गए जवाब को ज्यों का त्यों बिहार सरकार के अपर मुख्य सचिव के पास भेज दिया है। अधीक्षक का यह कदम दर्शाता है कि मामला अब स्थानीय स्तर पर सुलझाने या दबाने वाला नहीं रह गया है। चूंकि सरकारी डॉक्टरों की नियुक्ति और उनके विरुद्ध अनुशासनात्मक कार्रवाई का अधिकार राज्य मुख्यालय (पटना) के पास होता है, इसलिए अब वहां से आने वाला निर्देश ही डॉ. कन्हैया लाल के भविष्य को तय करेगा। इस कार्रवाई ने अस्पताल के अन्य डॉक्टरों और कर्मियों को भी यह संदेश दिया है कि भ्रष्टाचार के मामलों में स्थानीय स्तर पर कोई ‘सेफ पैसेज’ नहीं मिलेगा।
मायागंज की पुरानी बीमारी: सर्जिकल सामानों की ‘बाहरी’ खरीद
यह कोई पहली बार नहीं है जब मायागंज अस्पताल में सर्जिकल सामानों की खरीद को लेकर सवाल उठे हों। हड्डी रोग विभाग और हृदय रोग विभाग जैसे संवेदनशील विभागों में इंप्लांट्स की खरीद हमेशा से विवादों में रही है। सरकारी प्रावधानों के अनुसार, अधिकांश आवश्यक सामग्री अस्पताल के भंडार में उपलब्ध होनी चाहिए, और यदि नहीं है, तो उसे ‘अमृत फार्मेसी’ या अन्य सरकारी माध्यमों से मंगवाया जाना चाहिए। लेकिन अक्सर देखा जाता है कि डॉक्टर विशेष रूप से किसी निजी दुकान का नाम सुझाते हैं या खुद पैसे लेकर सामान मंगवाने का वादा करते हैं। इस प्रक्रिया में भारी कमीशन का खेल होता है, जिसकी मार अंततः मरीज की जेब पर पड़ती है। डॉ. कन्हैया लाल पर लगे आरोप इसी पुराने और दूषित तंत्र का एक हिस्सा प्रतीत होते हैं।
मरीजों का अविश्वास और प्रशासनिक जवाबदेही
मायागंज अस्पताल केवल भागलपुर ही नहीं, बल्कि बांका, मुंगेर, लखीसराय और झारखंड के साहिबगंज एवं गोड्डा जिलों के मरीजों की जीवनरेखा है। यहाँ हर दिन हजारों की संख्या में ओपीडी और इंडोर मरीज आते हैं। यदि यहाँ के विशेषज्ञ चिकित्सक ही भ्रष्टाचार में संलिप्त पाए जाते हैं, तो पूरे संस्थान की विश्वसनीयता गिरती है। गरीब मरीज पहले से ही बीमारी और तंगी से जूझ रहा होता है, ऊपर से डॉक्टर की ऐसी मांग उसे मानसिक रूप से तोड़ देती है। डॉ. हिमांशु परमेश्वर दुबे ने जिस तेजी से फाइल पटना भेजी है, उससे न्याय की उम्मीद तो जगी है, लेकिन क्या केवल एक डॉक्टर पर कार्रवाई काफी है? या फिर उस पूरे सिंडिकेट को ध्वस्त करने की जरूरत है जो सर्जिकल आइटमों के नाम पर मरीजों का खून चूस रहा है?
आगामी जांच की दिशा: क्या होगा अगला कदम?
पटना मुख्यालय में अपर मुख्य सचिव के पास मामला पहुँचने के बाद अब वहां से एक स्वतंत्र जांच टीम गठित की जा सकती है। यह टीम न केवल डॉ. कन्हैया लाल के बयानों की जांच करेगी, बल्कि शिकायतकर्ता परिजनों के बयान भी दर्ज किए जाएंगे। यदि आरोप सिद्ध होते हैं, तो डॉ. कन्हैया लाल को सेवा से निलंबन या उनके मेडिकल लाइसेंस की समाप्ति जैसी कड़ी सजा का सामना करना पड़ सकता है। इसके साथ ही, अस्पताल प्रशासन को यह भी जांचना होगा कि क्या हड्डी रोग विभाग में यह एक सामान्य प्रथा बन गई है? क्या अन्य डॉक्टरों के खिलाफ भी ऐसी दबी-कुचली शिकायतें मौजूद हैं?
भ्रष्टाचार मुक्त स्वास्थ्य सेवा का सपना
जवाहरलाल नेहरू चिकित्सा महाविद्यालय अस्पताल में हुई यह घटना एक चेतावनी है कि सुशासन के दावों के बावजूद धरातल पर सब कुछ ठीक नहीं है। 40 हजार रुपये की मांग केवल एक डॉक्टर की निजी गलती नहीं, बल्कि व्यवस्था की विफलता है। डॉ. कन्हैया लाल का जवाब अब सचिवालय की फाइलों में बंद है, लेकिन भागलपुर की जनता की निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि क्या रसूखदार डॉक्टरों के खिलाफ भी कानून उतना ही सख्त होता है जितना एक आम आदमी के खिलाफ। मायागंज की साख तभी बचेगी जब डॉक्टर अपनी ‘फीस’ और ‘कमीशन’ से ऊपर उठकर अपनी ‘शपथ’ को याद रखेंगे।


