
भागलपुर। 08 अप्रैल 2026: बिहार के भागलपुर जिले के नाथनगर थाना क्षेत्र अंतर्गत शंकरपुर दियारा में बुधवार को उस समय अफरा-तफरी और तनाव की स्थिति पैदा हो गई, जब जिला प्रशासन की टीम गंगा नदी के बीचों-बीच बने एक ‘अवैध’ मिट्टी के रास्ते को हटाने पहुँची। दीपनगर गंगा घाट के पास प्रशासन की इस कार्रवाई की भनक लगते ही हजारों की संख्या में दियारा वासी और किसान लामबंद हो गए और प्रशासन के खिलाफ मोर्चा खोल दिया। ग्रामीणों के भारी विरोध और नारेबाजी के कारण स्थिति इतनी संवेदनशील हो गई कि सदर अनुमंडल पदाधिकारी (SDO) को खुद मोर्चा संभालना पड़ा। प्रशासन जहाँ इसे जलमार्ग की सुरक्षा के लिए जरूरी बता रहा है, वहीं दियारा के किसानों के लिए यह रास्ता उनकी आजीविका और अस्तित्व का सवाल बन गया है।
विकास बनाम आजीविका: आखिर क्यों भड़का ग्रामीणों का गुस्सा?
शंकरपुर दियारा और आसपास के इलाकों में रहने वाले हजारों लोगों के लिए गंगा की मुख्य धारा और उपधाराओं के बीच आवागमन हमेशा से एक बड़ी चुनौती रहा है। ग्रामीणों ने अपनी सुविधा और फसलों की ढुलाई के लिए दीपनगर गंगा घाट के पास मिट्टी और बालू भरकर एक अस्थाई रास्ता बनाया था।
ग्रामीणों का पक्ष और उनकी मजबूरी:
शंकरपुर पंचायत के मुखिया अशोक मंडल और प्रदर्शन कर रहे किसानों का कहना है कि यह रास्ता उनके लिए किसी ‘लाइफलाइन’ (जीवनरेखा) से कम नहीं है।
- फसलों की बर्बादी का डर: वर्तमान में दियारा क्षेत्र में हजारों एकड़ में गेहूं और मक्के की फसल तैयार खड़ी है। कटाई का समय नजदीक है और अगर यह रास्ता हटा दिया जाता है, तो किसान अपनी उपज को ट्रैक्टरों के जरिए शहर की मंडियों तक नहीं पहुँचा पाएंगे।
- शहर से संपर्क भंग: दियारा वासियों के लिए शिक्षा, स्वास्थ्य और अन्य बुनियादी जरूरतों के लिए नाथनगर और भागलपुर शहर जाना अनिवार्य है। नाव के भरोसे हजारों लोगों का रोजाना आना-जाना न केवल जोखिम भरा है, बल्कि समय और पैसे की भी बर्बादी है।
- वैकल्पिक मार्ग की समस्या: ग्रामीणों का आरोप है कि प्रशासन जिस कोयला घाट वाले रास्ते की बात कर रहा है, वह काफी दूर है और वहां की भौगोलिक स्थिति छोटे किसानों के लिए अनुकूल नहीं है।
प्रशासन की दलील: अंतरराष्ट्रीय जलमार्ग और जहाजों की सुरक्षा
दूसरी ओर, जिला प्रशासन इस रास्ते को पूरी तरह ‘अवैध’ और ‘खतरनाक’ करार दे रहा है। सदर अनुमंडल पदाधिकारी (SDO) बिकाश कुमार ने मौके पर पहुँचकर ग्रामीणों को समझाने की कोशिश की, लेकिन लोग अपनी मांग पर अड़े रहे।
प्रशासनिक पक्ष के मुख्य बिंदु:
- जलमार्ग में बाधा: गंगा नदी का यह हिस्सा राष्ट्रीय जलमार्ग (National Waterway) का हिस्सा है। यहाँ से मालवाहक जहाजों (Cargo Ships) का आवागमन निरंतर होता है। ग्रामीणों द्वारा बनाया गया मिट्टी का बांध या रास्ता नदी की गहराई को कम कर देता है और जहाजों के फंसने या टकराने का खतरा बना रहता है।
- IWT के निर्देश: अंतर्देशीय जलमार्ग प्राधिकरण (IWAI) की ओर से सख्त निर्देश हैं कि नदी की मुख्य धारा में किसी भी प्रकार का अवरोध न पैदा किया जाए। सुचारू व्यापार और परिवहन के लिए जलमार्ग को बाधा मुक्त रखना अनिवार्य है।
- वैकल्पिक व्यवस्था: एसडीओ बिकाश कुमार ने कहा कि प्रशासन किसानों की समस्याओं के प्रति संवेदनशील है, इसीलिए कोयला घाट के पास एक वैकल्पिक मार्ग चिन्हित किया गया है, जहाँ से किसान सुरक्षित तरीके से आवागमन कर सकते हैं।
मौके पर तनाव: नारेबाजी और आमने-सामने की स्थिति
बुधवार की सुबह जैसे ही प्रशासन की जेसीबी और अन्य मशीनें रास्ता काटने के लिए घाट पर पहुँचीं, शंकरपुर पंचायत के मुखिया अशोक मंडल के नेतृत्व में सैकड़ों किसान मशीनों के आगे लेट गए। “प्रशासन हाय-हाय” और “रास्ता नहीं तो वोट नहीं” जैसे नारों से पूरा दियारा गूंज उठा।
स्थिति तब और गंभीर हो गई जब कुछ प्रदर्शनकारियों और पुलिस कर्मियों के बीच तीखी नोकझोंक हुई। ग्रामीणों का कहना था कि जब तक प्रशासन उन्हें फसलों की ढुलाई की ठोस लिखित गारंटी नहीं देता, वे रास्ता हटने नहीं देंगे। भीड़ के बढ़ते दबाव को देखते हुए नाथनगर पुलिस के साथ अतिरिक्त बल को भी मौके पर बुलाना पड़ा। सदर एसडीओ बिकाश कुमार ने आक्रोशित किसानों के साथ घंटों वार्ता की, लेकिन ग्रामीण तत्काल रास्ता हटाने के पक्ष में बिल्कुल नहीं थे।
दियारा की खेती और अर्थव्यवस्था पर संकट
भागलपुर का दियारा क्षेत्र अपनी उपजाऊ मिट्टी के लिए जाना जाता है। यहाँ का मक्का और गेहूं पूरे जिले की खाद्य सुरक्षा में अहम भूमिका निभाता है। किसानों का तर्क है कि दियारा में खेती करना पहले से ही एक जुआ है; कभी बाढ़ तो कभी नीलगायों का आतंक। ऐसे में अगर आवागमन का एकमात्र सुलभ साधन भी छीन लिया जाएगा, तो किसान कर्ज के बोझ तले दब जाएंगे।
मुखिया अशोक मंडल ने बताया कि दियारा में सड़कों का अभाव है। सरकारी स्तर पर पुल या पक्का रास्ता न होने के कारण ग्रामीण आपसी सहयोग से चंदा इकट्ठा कर ऐसे अस्थाई रास्ते बनाते हैं। प्रशासन को चाहिए कि रास्ता हटाने से पहले पक्की वैकल्पिक व्यवस्था की जाए, न कि केवल कार्रवाई कर किसानों को उनके हाल पर छोड़ दिया जाए।
निष्कर्ष: समाधान की तलाश और प्रशासनिक चुनौती
खबर लिखे जाने तक शंकरपुर दियारा में स्थिति तनावपूर्ण लेकिन नियंत्रण में बनी हुई है। प्रशासन ने फिलहाल कार्रवाई को रोककर ग्रामीणों को बातचीत के लिए आमंत्रित किया है। यह मामला एक बड़े नीतिगत सवाल को जन्म देता है—क्या अंतरराष्ट्रीय जलमार्गों के विकास की कीमत स्थानीय किसानों की आजीविका छीन कर चुकाई जानी चाहिए?
प्रशासन के लिए यह एक ‘दोधारी तलवार’ जैसी स्थिति है। एक तरफ केंद्र और राज्य सरकार का दबाव है कि गंगा को मालवाहक जहाजों के लिए सुगम बनाया जाए, वहीं दूसरी तरफ हजारों किसानों का आक्रोश है जो सीधे तौर पर कानून-व्यवस्था की समस्या पैदा कर सकता है। अब देखना यह होगा कि सदर एसडीओ और जिला प्रशासन इस विवाद का क्या बीच का रास्ता निकालते हैं जिससे जलमार्ग भी सुरक्षित रहे और किसानों की मेहनत भी मंडियों तक पहुँच सके।


