शराबबंदी मामलों में पटना हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: सिर्फ ब्रेथ एनालाइजर रिपोर्ट के आधार पर नहीं होगी सजा

पटना: बिहार में लागू शराबबंदी कानून से जुड़े मामलों पर पटना हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि केवल ब्रेथ एनालाइजर टेस्ट के आधार पर किसी व्यक्ति को शराब सेवन का दोषी नहीं ठहराया जा सकता। कोर्ट ने कहा कि आरोप को साबित करने के लिए रक्त (ब्लड) और मूत्र (यूरिन) की वैज्ञानिक जांच भी आवश्यक है।

बिहार सरकार ने अप्रैल 2016 में पूरे राज्य में पूर्ण शराबबंदी कानून लागू किया था। इसके तहत शराब पीने, बेचने और कारोबार करने वालों के खिलाफ कड़ी कानूनी कार्रवाई का प्रावधान है। इसी कानून के तहत पुलिस और उत्पाद विभाग नियमित रूप से छापेमारी और गिरफ्तारी करते रहे हैं।

यह फैसला 24 नवंबर 2016 के एक मामले की सुनवाई के दौरान आया। उस समय बीएमपी-6 में तैनात जवान मनोज ठाकुर को कथित रूप से नशे की हालत में हंगामा करने के आरोप में गिरफ्तार किया गया था। उत्पाद विभाग ने ब्रेथ एनालाइजर टेस्ट के आधार पर शराब पीने की पुष्टि होने का दावा किया था और उनके खिलाफ प्राथमिकी दर्ज की गई थी।

निचली अदालत से राहत नहीं मिलने के बाद मनोज ठाकुर ने पटना हाईकोर्ट में अपील दायर की। सुनवाई के दौरान अदालत ने कहा कि ब्रेथ एनालाइजर रिपोर्ट अकेले शराब सेवन का अंतिम और अचूक प्रमाण नहीं मानी जा सकती। यदि किसी व्यक्ति पर शराब पीने का आरोप लगाया जाता है तो उसकी पुष्टि के लिए रक्त और मूत्र की जांच भी कराई जानी चाहिए।

हाईकोर्ट ने अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट और अन्य उच्च न्यायालयों के पूर्व निर्णयों का भी उल्लेख किया। अदालत ने कहा कि वैज्ञानिक साक्ष्यों के बिना केवल ब्रेथ एनालाइजर रिपोर्ट के आधार पर दोष सिद्ध करना उचित नहीं है।

इन्हीं कानूनी और वैज्ञानिक आधारों को ध्यान में रखते हुए पटना हाईकोर्ट ने करीब दस साल पुराने इस मामले में जवान मनोज ठाकुर को बड़ी राहत देते हुए उनके पक्ष में फैसला सुनाया। अदालत ने स्पष्ट किया कि भविष्य में भी शराबबंदी से जुड़े मामलों में वैज्ञानिक जांच और पर्याप्त साक्ष्यों को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।

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