लालू यादव और ‘खैनी की राजनीति’: एक चुटकी से जुड़ते रिश्ते, लेकिन सेहत का सच भी जरूरी

ग्रामीण भारत, खासकर बिहार की सामाजिक संस्कृति में खैनी केवल तंबाकू नहीं, बल्कि मेल-जोल और बातचीत का एक पारंपरिक माध्यम भी रही है। गांव की चौपाल हो, खेत-खलिहान या सफर के दौरान किसी अनजान व्यक्ति से मुलाकात—एक चुटकी खैनी कई बार बातचीत की शुरुआत और अपनापन बढ़ाने का जरिया बन जाती थी।

राष्ट्रीय जनता दल (RJD) प्रमुख लालू प्रसाद यादव भी इस ग्रामीण मनोविज्ञान को अच्छी तरह समझते थे। कहा जाता है कि फुलवरिया के ग्रामीण परिवेश में रहते हुए उन्होंने खैनी की सामाजिक भूमिका को करीब से देखा था। मुख्यमंत्री बनने के बाद भी वे कई मौकों पर मजाकिया अंदाज में खैनी को “बुद्धि वर्धिनी चूर्ण” कहा करते थे। यही वजह थी कि उनकी सरकार के दौरान जब खैनी पर प्रतिबंध लगाने का प्रस्ताव सामने आया, तो उन्होंने इसे स्वीकार नहीं किया।

ग्रामीण समाज में खैनी को कई लोग बराबरी और अपनत्व का प्रतीक भी मानते रहे हैं। अक्सर देखा जाता है कि खेत में काम करने वाला मजदूर खैनी बनाता है तो उसके साथ बैठा किसान, दुकानदार या कोई अन्य व्यक्ति भी बिना संकोच एक चुटकी मांग लेता है। कई जगहों पर इसे सामाजिक दूरी कम करने और बातचीत शुरू करने का सहज माध्यम माना जाता है।

हालांकि, यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि खैनी एक तंबाकू उत्पाद है, जिसके सेवन से मुंह का कैंसर, गले का कैंसर, मसूड़ों की बीमारी, हृदय रोग और अन्य गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं का खतरा बढ़ जाता है। इसलिए इसकी सांस्कृतिक या सामाजिक भूमिका को समझना एक अलग बात है, लेकिन इसे स्वास्थ्य की दृष्टि से सुरक्षित या लाभकारी नहीं माना जा सकता।

बिहार की सामाजिक और राजनीतिक संस्कृति में खैनी की अपनी एक ऐतिहासिक पहचान रही है, लेकिन बदलते समय में स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता भी उतनी ही जरूरी है। परंपरा और संस्कृति का सम्मान करते हुए भी लोगों को तंबाकू से होने वाले नुकसान के बारे में जागरूक करना समय की आवश्यकता है।

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