
नई दिल्ली/पटना। राष्ट्रीय जनता दल के सुप्रीमो और बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद के लिए देश की सर्वोच्च अदालत से सोमवार, 13 अप्रैल 2026 को मिली-जुली खबर सामने आई है। चर्चित ‘नौकरी के बदले जमीन’ (Land-for-Jobs) घोटाले में कानूनी लड़ाई लड़ रहे लालू प्रसाद को सुप्रीम कोर्ट ने निचली अदालत में व्यक्तिगत रूप से पेश होने से बड़ी राहत प्रदान की है। हालांकि, उनके लिए एक बड़ा झटका यह रहा कि अदालत ने केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI) द्वारा दर्ज किए गए मुकदमे को रद्द करने की उनकी याचिका को स्वीकार नहीं किया। जस्टिस एम.एम. सुंदरेश और जस्टिस एन. कोटिस्वर सिंह की पीठ ने स्पष्ट किया कि मामले का ट्रायल जारी रहेगा, लेकिन लालू प्रसाद की उम्र और स्थिति को देखते हुए उन्हें विशेष अदालत में बार-बार पेश होने की अनिवार्यता से छूट दी जाती है। यह फैसला ऐसे समय में आया है जब बिहार की राजनीति में एक बड़ा सत्ता परिवर्तन हो रहा है और विपक्षी खेमा इस कानूनी घटनाक्रम को बहुत बारीकी से देख रहा है।
सुप्रीम कोर्ट का रुख: राहत और सख्ती का संतुलन
सुप्रीम कोर्ट में सोमवार को हुई सुनवाई के दौरान लालू प्रसाद की ओर से पेश वकीलों ने तर्क दिया कि उनके खिलाफ दर्ज किया गया यह मामला राजनीतिक प्रतिशोध से प्रेरित है और इसमें पर्याप्त साक्ष्य नहीं हैं। याचिका में दिल्ली हाई कोर्ट के 24 मार्च 2026 के उस फैसले को चुनौती दी गई थी, जिसमें हाई कोर्ट ने सीबीआई की प्राथमिकी (FIR) को रद्द करने की मांग वाली याचिका को खारिज कर दिया था। लालू प्रसाद की दलील थी कि जिस समय की यह घटनाएं बताई जा रही हैं, उस दौरान वे रेल मंत्री थे और उन पर लगाए गए आरोप पूरी तरह निराधार हैं।
पीठ ने दलीलों को सुनने के बाद कहा कि वह वर्तमान स्तर पर मुकदमे की कार्यवाही में हस्तक्षेप नहीं करेगी। जस्टिस सुंदरेश की पीठ ने निर्देश दिया कि अपीलकर्ता (लालू प्रसाद) ट्रायल के दौरान उन सभी कानूनी बिंदुओं को उठा सकते हैं जो उनकी रक्षा के लिए आवश्यक हैं। अदालत ने मुकदमे के गुण-दोष पर कोई भी टिप्पणी करने से इनकार कर दिया, जिसका अर्थ है कि सीबीआई अपनी जांच और साक्ष्य प्रस्तुतीकरण की प्रक्रिया को विशेष अदालत में जारी रख सकती है। हालांकि, निजी पेशी से छूट मिलना लालू प्रसाद के लिए एक बड़ी व्यावहारिक जीत मानी जा रही है, क्योंकि स्वास्थ्य कारणों और सुरक्षा प्रोटोकॉल की वजह से बार-बार अदालत जाना उनके लिए चुनौतीपूर्ण था।
भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 17ए का पेच
इस पूरी सुनवाई में सबसे महत्वपूर्ण कानूनी बिंदु भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 17ए (Section 17A of PC Act) को लेकर रहा। लालू प्रसाद के पक्ष ने तर्क दिया कि किसी भी लोक सेवक के खिलाफ जांच शुरू करने से पहले सक्षम प्राधिकारी से पूर्व अनुमति लेना अनिवार्य है, जो इस मामले में नहीं ली गई। सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने इस पर एक महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि अपीलकर्ता ट्रायल के दौरान इस मुद्दे को उठा सकते हैं कि क्या इस विशेष मामले में धारा 17ए लागू होती है या नहीं।
अदालत ने कहा कि यह एक ऐसा बिंदु है जिस पर ट्रायल कोर्ट साक्ष्यों के आधार पर विचार कर सकती है। यदि यह सिद्ध हो जाता है कि जांच की प्रक्रिया में कानूनी मानदंडों का उल्लंघन हुआ है, तो इसका लाभ अभियुक्त को मिल सकता है। लेकिन वर्तमान में, सुप्रीम कोर्ट ने सीबीआई के केस को ‘क्वाश’ (रद्द) करने से मना कर दिया है। यह कानूनी प्रावधान 2018 में संशोधनों के माध्यम से जोड़ा गया था, जिसका उद्देश्य लोक सेवकों को दुर्भावनापूर्ण जांच से बचाना है। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि निचली अदालत में लालू प्रसाद के वकील इस धारा का उपयोग किस प्रकार करते हैं।
क्या है ‘नौकरी के बदले जमीन’ घोटाला?
यह मामला उस समय का है जब लालू प्रसाद 2004 से 2009 के बीच केंद्र की यूपीए सरकार में रेल मंत्री थे। सीबीआई का आरोप है कि रेल मंत्री रहते हुए लालू प्रसाद ने रेलवे के विभिन्न जोन में ‘ग्रुप डी’ के पदों पर नियुक्तियों के बदले में अभ्यर्थियों और उनके परिवारों से बेहद कम कीमत पर जमीनें अपने परिवार के सदस्यों के नाम करवाई थीं। जांच एजेंसी का दावा है कि ये नियुक्तियां बिना किसी विज्ञापन या सार्वजनिक सूचना के की गई थीं और चयन प्रक्रिया में धांधली की गई थी।
सीबीआई के अनुसार, पटना और अन्य शहरों में स्थित कीमती जमीनों को उपहार के तौर पर या बाजार भाव से बहुत कम कीमत पर राबड़ी देवी, मीसा भारती और लालू प्रसाद के अन्य परिजनों के नाम हस्तांतरित किया गया था। इस मामले में सीबीआई के साथ-साथ प्रवर्तन निदेशालय (ED) भी मनी लॉन्ड्रिंग के कोण से जांच कर रही है। लालू प्रसाद, राबड़ी देवी और तेजस्वी यादव सहित परिवार के कई सदस्य इस मामले में नामजद हैं और जमानत पर बाहर हैं। सुप्रीम कोर्ट का ताजा आदेश केवल सीबीआई द्वारा दर्ज प्राथमिकी और ट्रायल कोर्ट में पेशी से जुड़ा है।
ट्रायल कोर्ट में कार्यवाही का भविष्य
सुप्रीम कोर्ट से व्यक्तिगत पेशी में छूट मिलने के बाद अब दिल्ली की राउज एवेन्यू स्थित विशेष सीबीआई अदालत में मामले की सुनवाई में तेजी आने की उम्मीद है। निजी पेशी से छूट का मतलब यह है कि अब लालू प्रसाद की अनुपस्थिति में भी उनके वकील उनके पक्ष का प्रतिनिधित्व कर सकेंगे, जिससे स्वास्थ्य खराब होने की स्थिति में भी सुनवाई टलेगी नहीं। हालांकि, अदालत ने यह भी स्पष्ट किया है कि यदि ट्रायल के किसी विशेष चरण में न्यायाधीश को उनकी भौतिक उपस्थिति अनिवार्य लगती है, तो उन्हें हाजिर होना पड़ सकता है।
कानूनी जानकारों का मानना है कि सुप्रीम कोर्ट के इस निर्देश से अब सीबीआई पर भी दबाव होगा कि वह अपने गवाहों और सबूतों को जल्द से जल्द पेश करे। लालू प्रसाद के वकीलों के पास अब यह अवसर होगा कि वे ट्रायल कोर्ट में यह साबित करें कि सीबीआई के पास उनके खिलाफ कोई सीधा लिंक नहीं है। धारा 17ए का मुद्दा इस केस की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। यदि ट्रायल कोर्ट यह मान लेती है कि पूर्व अनुमति के बिना जांच शुरू करना गलत था, तो पूरा मुकदमा ही खतरे में पड़ सकता है।
बिहार की राजनीति पर इस फैसले का असर
सोमवार को आया यह फैसला बिहार की राजनीति के लिए भी काफी अहम है। जिस दिन सुप्रीम कोर्ट में लालू प्रसाद को राहत और सख्ती का मिला-जुला संदेश मिला, ठीक उसी दिन बिहार में नीतीश कुमार के इस्तीफे और सत्ता परिवर्तन की हलचल अपने चरम पर थी। राजद खेमे के लिए अपने नेता को पेशी से छूट मिलना एक नैतिक जीत की तरह है। राजद नेताओं का कहना है कि यह साबित करता है कि लालू प्रसाद को जानबूझकर परेशान किया जा रहा था।
हालांकि, भाजपा और अन्य विरोधी दल इसे एक अलग नजरिए से देख रहे हैं। उनका तर्क है कि सुप्रीम कोर्ट ने मुकदमा रद्द करने से मना कर दिया है, जो यह दर्शाता है कि आरोपों में प्रथम दृष्टया गंभीरता है। बिहार की नई उभरती राजनीति में, जहाँ भाजपा अब खुद के नेतृत्व वाली सरकार बनाने जा रही है, भ्रष्टाचार के इन पुराने मामलों का जिक्र बार-बार होगा। लालू प्रसाद के लिए यह कानूनी लड़ाई अब लंबी खिंच सकती है, लेकिन सुप्रीम कोर्ट के इस आदेश ने उन्हें शारीरिक और मानसिक रूप से थोड़ी राहत जरूर दी है।
राजधानी पटना के 10, सर्कुलर रोड (राबड़ी देवी का आवास) पर इस खबर के बाद कार्यकर्ताओं के बीच चर्चाओं का बाजार गर्म रहा। समर्थकों का मानना है कि अब लालू प्रसाद अपनी पूरी ऊर्जा पार्टी के संगठन और आगामी राजनीतिक चुनौतियों पर केंद्रित कर सकेंगे, क्योंकि उन्हें अब हर तारीख पर दिल्ली के चक्कर नहीं लगाने होंगे। कानूनी रूप से यह मामला अभी कई मोड़ों से गुजरेगा, लेकिन सुप्रीम कोर्ट का सोमवार का हस्तक्षेप इस बहुचर्चित घोटाले के न्यायिक इतिहास में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर बन गया है।


