समस्तीपुर के लाल की ‘वीरगाथा’: 6 साल के मासूम ने दी शहीद पिता को मुखाग्नि; तिरंगे में लिपटे सीताराम को देख रो पड़ा बिहार!

HIGHLIGHTS: लोदीपुर गांव में ‘अमर जवान’ की अंतिम विदाई; आंसुओं के समंदर में डूबा मोरवा

  • शहादत का गौरव: जम्मू-कश्मीर में आतंकियों से लोहा लेते हुए समस्तीपुर के सीताराम राय (40) ने दी सर्वोच्च कुर्बानी।
  • भावुक विदाई: 6 साल के बेटे सुशांक ने कांपते हाथों से दी पिता को मुखाग्नि; हर आंख नम, हर जुबां पर ‘वंदे मातरम’।
  • संघर्ष की दास्तां: पिता ने कोलकाता में ठेला चलाकर बेटे को बनाया था ‘देश का रक्षक’; 22 साल का शानदार सैन्य करियर।
  • अधूरी हसरत: अप्रैल में घर आकर नया मकान बनवाना था और दिव्यांग भतीजे का कराना था इलाज; नियति को कुछ और ही मंजूर था।
  • जनसैलाब: अंतिम यात्रा में उमड़े हजारों लोग; DM रोशन कुशवाहा और सेना के अधिकारियों ने दी ‘अंतिम सलामी’।

समस्तीपुर / मोरवा | 22 मार्च, 2026

​बिहार की मिट्टी ने एक बार फिर देश की रक्षा के लिए अपना एक और वीर सपूत कुर्बान कर दिया है। जम्मू-कश्मीर की बर्फीली वादियों में आतंकवादियों के खिलाफ सर्च ऑपरेशन के दौरान समस्तीपुर के लोदीपुर (मोरवा) निवासी सीताराम राय (40) शहीद हो गए। रविवार सुबह जब शहीद का पार्थिव शरीर उनके पैतृक गांव पहुँचा, तो फिजाओं में ‘शहीद सीताराम अमर रहें’ के नारों की गूँज उठी। यह एक ऐसा क्षण था जहाँ शहादत के गौरव ने गम की चादर को ढक लिया था, लेकिन जब 6 साल के मासूम बेटे ने अपने पिता की चिता को मुखाग्नि दी, तो वहां मौजूद पत्थर दिल इंसान की भी आंखें छलक आईं।

सुशांक का ‘अंतिम सलाम’: 6 साल के मासूम ने संभाली जिम्मेदारी

​अंतिम संस्कार के दौरान सबसे हृदयविदारक दृश्य तब दिखा, जब शहीद सीताराम राय के 6 साल के पुत्र सुशांक ने अपने पिता को मुखाग्नि दी। मासूम को शायद यह पूरी तरह अहसास भी नहीं था कि उसके पिता अब कभी वापस नहीं आएंगे, लेकिन उसकी आंखों में एक अजीब सा सन्नाटा था। पूरे राजकीय सम्मान के साथ जब गार्ड ऑफ ऑनर दिया गया और बंदूकों से सलामी दी गई, तो सुशांक ने अपने पिता को अंतिम विदाई दी। लोदीपुर गांव के श्मशान घाट पर उस वक्त हजारों की भीड़ मौन खड़ी थी।

ठेला चलाने वाले पिता का ‘फौजी’ बेटा: संघर्ष से शहादत तक का सफर

​सीताराम राय की कहानी केवल बहादुरी की नहीं, बल्कि कड़े संघर्ष की भी है। उनके पिता ने जीवन भर कोलकाता में ठेला चलाकर अपने बच्चों को पाला और सीताराम को सेना में भर्ती कराया। साल 2002 में जब सीताराम भारतीय सेना में शामिल हुए, तो पूरे परिवार की उम्मीदों को पंख लग गए थे। अपने 22 साल के लंबे करियर में उन्होंने कई बार मौत को करीब से देखा, लेकिन बुधवार की सुबह उनके जीवन का आखिरी मिशन साबित हुई।

​शहीद के भाई शिवानंद ने रुंधे गले से बताया कि सीताराम ही परिवार के एकमात्र स्तंभ थे। अप्रैल में वे छुट्टी पर घर आने वाले थे। उन्हें अपने दिव्यांग भतीजे का इलाज कराना था और पुराने घर की जगह नया मकान बनवाना था। लेकिन अब वह घर तो बनेगा, पर उसके आंगन में सीताराम की वर्दी नहीं, उनकी यादें होंगी।

अंतिम वीडियो कॉल: “ड्यूटी पर जा रहा हूँ, बच्चों का ख्याल रखना”

​शहीद के मित्र सर्वेंदु ने बताया कि बुधवार सुबह ड्यूटी पर निकलने से ठीक पहले सीताराम ने अपनी पत्नी सुमन राय से वीडियो कॉल पर बात की थी। उन्होंने बच्चों के बारे में पूछा और अपनी सलामती का भरोसा दिया। लेकिन ठीक दो घंटे बाद, सुबह 11 बजे यूनिट से खबर आई कि मुठभेड़ में उन्हें गोली लगी है। पत्नी सुमन राय का रो-रोकर बुरा हाल है। वे बार-बार बेसुध होकर जिलाधिकारी रोशन कुशवाहा का हाथ पकड़कर अपने बच्चों के भविष्य की गुहार लगा रही थीं।

​”सीताराम केवल एक फौजी नहीं थे, वे इस गांव के हर बच्चे के प्रेरणास्रोत थे। 15 दिन पहले ही वे परिवार के साथ खुशियां मनाकर लौटे थे। हमें गर्व है कि हमारे जिले का बेटा तिरंगे में लिपटकर लौटा है, लेकिन यह घाव कभी नहीं भरेगा।” — रणविजय साहु, स्थानीय विधायक

 

VOB का नजरिया: बिहार के हर घर में है एक ‘सीताराम’

​’द वॉयस ऑफ बिहार’ (VOB) का मानना है कि सीताराम राय की शहादत हमें याद दिलाती है कि बिहार की मिट्टी कितनी उपजाऊ है—अनाज के लिए भी और बलिदान के लिए भी। एक पिता का ठेला चलाना और बेटे का सरहद पर सीना तानकर खड़ा होना, यही असली हिंदुस्तान है।

​लेकिन सवाल यह भी है कि जब बिहार का जवान शहीद होता है, तो प्रशासन और नेता श्मशान घाट तक तो आते हैं, लेकिन क्या उन वादों का क्या होता है जो शहीद के बच्चों की शिक्षा और परिवार के पुनर्वास के लिए किए जाते हैं? शहीद सीताराम के 5 मासूम बच्चों और दिव्यांग भतीजे के भविष्य की जिम्मेदारी अब केवल उस परिवार की नहीं, बल्कि पूरे समाज और सरकार की है। हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि सुशांक को अपने पिता की शहादत पर गर्व रहे और उसकी शिक्षा में कोई कमी न आए।

सुशासन और सम्मान के बीच एक वीर की विदाई

​आज समस्तीपुर ही नहीं, पूरा बिहार शहीद सीताराम राय को नमन कर रहा है। ‘द वॉयस ऑफ बिहार’ इस वीर सपूत की शहादत को सलाम करता है और शोकाकुल परिवार के प्रति अपनी गहरी संवेदना व्यक्त करता है।

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