
रामगढ़ (कैमूर), 19 मई 2026। बिहार के कैमूर जिला अंतर्गत रामगढ़ प्रक्षेत्र के बहुचर्चित ‘कृष्णमुरारी एंड फैमिली मर्डर केस’ में पुलिसिया अनुसंधान और मुख्य अभियुक्तों की गिरफ्तारी के बाद दरिंदगी की एक ऐसी खौफनाक और रोंगटे खड़े कर देने वाली दास्तान सतह पर आई है, जिसने मानवीय संवेदनाओं को पूरी तरह झकझोर कर रख दिया है। मुख्य आरोपी विकास ने पुलिस अभिरक्षा के कड़े विमर्श कक्ष में आत्मग्लानि और प्रतिशोध के संमिश्रण के बीच जुर्म कबूलते हुए दिल दहला देने वाला खुलासा किया है।
विलेखों के अनुसार, जिस 7 मई को कृष्णमुरारी की मासूम बेटी कीर्ति का जन्मदिन था और पूरा घर कभी उत्सव के माहौल में डूबा करता था, उसी नियत तारीख को चाचा विकास ने अपने सहयोगियों के साथ मिलकर एक-एक कर परिवार के चारों सदस्यों का बेरहमी से गला रेत दिया। इस जघन्य हत्याकांड का सबसे स्याह और विस्मयकारी कोण यह रहा कि जब कसाई बन चुके बेटे और उसके दोस्त मासूम बच्चों की गर्दन पर कुल्हाड़ी चला रहे थे, तब बच्चों की सगी दादी (कृष्णमुरारी की मां) दूसरे कमरे में बैठकर अपनी ही पोती और नाती-पोतों की आखिरी चीखें खामोशी से सुनती रही, लेकिन ममता के इस पतन ने तिनका भर भी दखल देने की कोशिश नहीं की।
कीर्ति के जन्मदिन पर लिखी गई खूनी स्क्रिप्ट: एक-एक कर चारों को उतारा मौत के घाट
जांच प्रणालियों और मुख्य आरोपी विकास के इकबालिया बयान के अनुसार, वह महाराष्ट्र से अपने दोस्तों के साथ मिलकर अपने ही भाई के संपूर्ण विन्यास को नष्ट करने का कड़ा इरादा ठानकर रामगढ़ आया था। हत्या की तारीख के रूप में उसने जानबूझकर 7 मई का दिन मुकर्रर किया, जो उसकी भतीजी कीर्ति का जन्मदिन था। दो वर्ष पूर्व इसी तिथि को कृष्णमुरारी ने अपनी बेटी का जन्मदिन अत्यंत धूमधाम से मनाया था, जिसमें इसी दादी ने कीर्ति को गोद में लेकर तस्वीरें खिंचवायी थीं।
घटनाक्रम की कड़ियों को स्पष्ट करते हुए विकास ने बताया कि 7 मई को वह अपने छोटे भाई गौतम और दोस्त दीपक राजपूत के साथ घर के भीतर बैठा हुआ था और सभी ऊपरी तौर पर शेयर बाजार (स्टॉक मार्केट) को लेकर सामान्य चर्चा संधारित कर रहे थे। इसी दौरान जैसे ही कृष्णमुरारी घर के मुहाने पर पहुंचा, तीनों ने उसे दबोच लिया और कड़े प्रहार के साथ उसका गला रेत दिया। पति की चीख सुनकर जब उसकी पत्नी (भाभी) बीच-बचाव करने दौड़ी, तो दरिंदों ने उसकी भी जीवन लीला समाप्त कर दी।
इस दोहरे मर्डर के बाद, आंगनबाड़ी केंद्र से मासूम कीर्ति हंसती-खेलती घर लौटी। कमरे के भीतर मम्मी-पापा के खून से सने शवों को देखकर वह चीख भी नहीं पाई थी कि चाचा विकास और गौतम ने उसे दबोच लिया। वह बाहर जाकर किसी को यह सच न बता सके, इसलिए दरिंदों ने उस मासूम भतीजी का भी गला रेत दिया। इसके कुछ ही देर बाद जब स्कूल से बेटा अंश घर वापस आया, तो इन कसाइयों के हाथों वह वीर बालक भी मारा गया। इस प्रकार कुछ ही मिनटों के भीतर एक पूरा हंसता-खेलता परिवार काल के गाल में समा गया।
पुलिस को बड़ी सफलता: महाराष्ट्र से भाई और दोस्त गिरफ्तार, नाबालिग रिमांड होम भेजी गई
मुख्य आरोपी विकास को जेल के सलाखों के पीछे भेजने के बाद पुलिस के विशेष खोजी दस्तों को इस प्रक्रम में एक और बड़ी सांगठनिक सफलता हाथ लगी है। हत्याकांड को अंजाम देने के बाद रामगढ़ से फरार होकर महाराष्ट्र के विभिन्न अंचलों में छिपे बैठे विकास के सगे छोटे भाई गौतम और उसके मुख्य दोस्त दीपक राजपूत को पुलिस की विशेष रेडिंग टीम ने कड़े तकनीकी सर्विलांस के बल पर महाराष्ट्र से विधिक रूप से गिरफ्तार कर लिया है। पुलिस टीम इन दोनों को कड़े पहरे के बीच ट्रांजिट रिमांड पर लेकर रामगढ़ लौट रही है, जिसके बाद इनके बयानों का मिलान कराया जाएगा।
इसके समानांतर ही, इस जघन्य नरसंहार की चश्मदीद गवाह रही और साक्ष्यों को नष्ट करने में अपराधियों का साथ देने वाली सुभाष की पत्नी को भी पुलिस ने अपनी विधिक अभिरक्षा में ले लिया है। चूंकि वह कानूनन विधिक रूप से नाबालिग है, इसलिए उसे किशोर न्याय बोर्ड के विनिर्देशों के तहत ‘रिमांड होम’ भेज दिया गया है। जांच में यह प्रामाणिक सच सामने आया है कि हत्या के समय घर में कृष्णमुरारी की मां (दादी) के साथ यह नाबालिग लड़की भी भौतिक रूप से उपस्थित थी। इन दोनों ने न तो पीड़ितों को बचाने का कोई मानवीय प्रयास किया और न ही चीख-पुकार सुनकर आस-पास के पड़ोसियों या पुलिस ग्रिड को इस खूनी विचलनों की भनक लगने दी।
साक्ष्य मिटाने की क्रूर कोशिश: फर्श और दीवारों पर फेरा सीमेंट का प्लास्टर
मर्डर की वारदात को मुकम्मल करने के बाद सबूतों और वैज्ञानिक साक्ष्यों को नष्ट करने का एक अत्यंत शातिर और घिनौना खेल खेला गया। खून से सने पूरे कमरे से लाल धब्बों को मिटाने की कोशिश आरोपियों द्वारा घंटों तक पानी और रासायनिक खाकों से की जाती रही। जब बार-बार धोने के उपरांत भी फर्श और दीवारों से खून के गहरे दाग खत्म नहीं हुए, तो मुख्य आरोपी विकास बाजार से सीमेंट खरीदकर लाया। अपराधियों ने सबूत मिटाने के विन्यास के तहत कमरे के फर्श और दीवारों को सीमेंट से पूरी तरह ‘प्लास्टर’ कर दिया ताकि पुलिस की फॉरेंसिक टीमें वहां तक न पहुंच सकें। हालांकि, पुलिस के तकनीकी कप्तानों का कहना है कि सीमेंट के इस प्लास्टर के नीचे दबे खून के कतिपय अंश ही इन दरिंदों को न्यायालय के समक्ष कड़ी सजा दिलाने का सबसे अचूक और विधिक सबूत साबित होंगे।
इसके साथ ही, जिस मुख्य हथियार (कुल्हाड़ी) का उपयोग कर चारों शवों के टुकड़े करने और गला रेतने का विधिक अपराध किया गया था, उसे ठिकाने लगाने के लिए विकास ने कड़ा हथकंडा अपनाया था। विकास ने अपने स्वीकृत बयान में स्वीकार किया है कि उसने वारदात के तुरंत बाद उस कुल्हाड़ी को प्रक्षेत्र के ‘फनसेवा पुल’ से नीचे गहरी नदी के भीतर फेंक दिया था। पुलिस स्थानीय गोताखोरों और विशेष चुंबकीय उपकरणों की मदद से नदी की तलहटी में उस मुख्य हथियार की तलाश के लिए सघन खोजी अभियान चला रही है, ताकि केस डायरी के भौतिक विन्यासों को मुकम्मल किया जा सके।
हत्याकांड के पीछे का मुख्य कारण: भाइयों को पढ़ाया, पर संकट में मिला धोखा
पुलिस अनुसंधान और सोशल मीडिया के डंप डेटा के विश्लेषण से इस सामूहिक हत्याकांड के पीछे छिपी गहरी रंजिश, प्रतिशोध और मानसिक अवसाद का कड़वा सच भी उजागर हुआ है। विकास ने बताया कि वर्ष 2003 में उसने अपनी कुशाग्र बुद्धि के बल पर नवोदय विद्यालय की कठिन प्रवेश परीक्षा पास की थी, परंतु उसके पिता की आर्थिक स्थिति अत्यंत दयनीय होने के कारण उसे आगे की पढ़ाई का संबल हस्तगत नहीं हो सका। घर की कंगाली से तंग आकर वह 12-13 साल की अल्पायु में ही अपना घर छोड़कर सपनों की नगरी बॉम्बे (मुंबई) भाग गया था।
मुंबई के कठिन प्रक्षेप में उसने अपने जीवन को दांव पर लगाकर संघर्ष किया। वह रात 6 बजे से लेकर 10 बजे तक नाइट स्कूल में कड़ाई से पढ़ाई करता था और दिन के समय सड़कों पर कबाड़ (भंगार चुनने) का काम करता था। करीब 12-13 वर्षों तक कबाड़ चुनकर जो भी आंशिक जमा पूंजी उसने संचित की, उसे लेकर जब वह वापस गांव लौटा, तो उसने अपने सगे भाइयों की पढ़ाई का पूरा जिम्मा अपने कंधों पर उठा लिया। वर्ष 2012 में उसने बॉम्बे के भीतर मेहनत की कमाई से एक छोटा कमरा खरीदा था, जिसे उसने केवल इसलिए बेच दिया ताकि उसके छोटे भाइयों को आईटीआई (ITI) की तकनीकी शिक्षा दिलाई जा सके और उनका भविष्य संवर सके।
विकास का कड़ा दर्द तब छलका जब उसने बताया कि वैश्विक महामारी लॉकडाउन के उस अत्यंत कठिन और त्रासद दौर में जब उसके पास कोई रोजगार शेष नहीं था, तो उसने सड़कों पर भीख मांगकर अपने भाई के बच्चों का पेट पाला था। परंतु, जब वही भाई आर्थिक रूप से संपन्न और स्थापित हो गए, और स्वयं विकास एक गहरे वित्तीय संकट के चक्रव्यूह में फंस गया, तो इन भाइयों ने उसकी मदद करना तो दूर, उसे पहचानने से भी इनकार कर दिया। अपनों से मिले इसी गहरे धोखे, विश्वासघात और उपेक्षा की ज्वाला ने विकास को एक खूंखार हत्यारे में तब्दील कर दिया, जिसने अंततः पूरे वंश को ही मलबे में तब्दील करने का खूनी रास्ता चुन लिया। पुलिस प्रशासन पूरे मामले की स्पीडी ट्रायल के विलेखों को मुकम्मल करने में जुटा हुआ है।


