
भागलपुर/कहलगांव। सरहद की रक्षा का संकल्प लेकर घर से निकले कहलगांव के एक जांबाज का सफर इतनी खामोशी और दर्द के साथ खत्म होगा, इसकी कल्पना हरचंदपुर गांव के किसी भी शख्स ने नहीं की थी। भागलपुर जिले के कहलगांव थाना क्षेत्र अंतर्गत हरचंदपुर गांव के निवासी और भारतीय सेना के जवान अमित कुमार को पूरे सैन्य सम्मान के साथ अंतिम विदाई दी गई। यह विदाई जितनी गौरवमयी थी, उतनी ही हृदयविदारक भी, क्योंकि जिस जवान की कलाई पर रक्षा का भार था, उसने जीवन की जंग से हार मानकर मौत को गले लगा लिया। अमित कुमार राजस्थान के सूरतगढ़ में तैनात थे और कुछ ही दिन पहले छुट्टियां बिताने अपने गांव आए थे। उनकी मौत की खबर ने पूरे इलाके में सन्नाटा पसार दिया है। नम आंखों और गगनभेदी नारों के बीच सेना की टुकड़ी ने उन्हें अंतिम सलामी दी, जिसके बाद श्मशान घाट पर उनका अंतिम संस्कार संपन्न हुआ।
छुट्टियों के बीच पसरा मौत का सन्नाटा
हरचंदपुर गांव के रहने वाले सुबोध मंडल के 27 वर्षीय पुत्र अमित कुमार भारतीय सेना की ईएमई कोर (EME Corps) में पदस्थापित थे। उनकी वर्तमान तैनाती राजस्थान के सूरतगढ़ स्थित 99 एडीजीपी वर्कशॉप में थी। जानकारी के अनुसार, अमित करीब 13 दिन पहले ही अपनी वार्षिक छुट्टी लेकर घर पहुँचे थे। घर में खुशियों का माहौल था कि बेटा सरहद से सकुशल वापस आया है, लेकिन किसी को इस बात का आभास नहीं था कि इन खुशियों के पीछे कोई गहरा मानसिक तनाव या परेशानी छिपी हुई है।
बताया जा रहा है कि शनिवार और रविवार की दरम्यानी रात जवान ने जहर खाकर आत्महत्या कर ली। जैसे ही परिजनों को इस बात का पता चला, घर में कोहराम मच गया। आनन-फानन में उन्हें अस्पताल ले जाने की कोशिश की गई, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी। कहलगांव पुलिस ने सूचना मिलते ही शव को अपने कब्जे में लिया और पोस्टमार्टम की प्रक्रिया पूरी कराई। आत्महत्या के कारणों का अभी तक स्पष्ट रूप से खुलासा नहीं हो पाया है, लेकिन गांव में चर्चाओं का बाजार गर्म है। पुलिस इस मामले की हर पहलू से जांच कर रही है ताकि यह पता लगाया जा सके कि आखिर एक अनुशासित सैनिक को ऐसा आत्मघाती कदम उठाने के लिए किसने मजबूर किया।
सैन्य सम्मान और ‘गार्ड ऑफ ऑनर’ का गौरवमयी क्षण
सोमवार को जब अमित कुमार का पार्थिव शरीर कहलगांव पहुँचा, तो वहां हजारों की संख्या में ग्रामीण और युवा जमा हो गए। सेना के जवान की अंतिम विदाई को लेकर दानापुर कैंट से सेना की एक विशेष टुकड़ी हरचंदपुर पहुँची थी। तिरंगे में लिपटे अमित के पार्थिव शरीर को देखकर हर किसी की आंखें भर आईं। श्मशान घाट पर माहौल तब और भी गमगीन हो गया जब सेना के जवानों ने अपने साथी को ‘गार्ड ऑफ ऑनर’ दिया।
हवा में गूँजती गोलियों की आवाज और बिगुल की मातमी धुन ने शहीद के सम्मान में पूरे वातावरण को राष्ट्रवाद और शोक के संगम में डुबो दिया। सेना के अधिकारियों ने अमित के पार्थिव शरीर पर पुष्पचक्र अर्पित कर उन्हें अंतिम सलामी दी। यह दृश्य देखकर गांव का हर बच्चा और बुजुर्ग ‘अमित कुमार अमर रहें’ के नारे लगाने लगा। भले ही अमित की मृत्यु एक दुखद और चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों में हुई, लेकिन भारतीय सेना ने अपने जवान की सेवा और कर्तव्य को सर्वोपरि रखते हुए उन्हें वह सम्मान दिया जिसके वे हकदार थे।
परिजनों का विलाप और मासूम बच्ची का भविष्य
अमित कुमार अपने पीछे एक भरा-पूरा लेकिन अब पूरी तरह टूट चुका परिवार छोड़ गए हैं। उनके परिवार में उनकी पत्नी रजनी कुमारी और एक छोटी सी मासूम पुत्री है। बताया जा रहा है कि अमित अपनी पत्नी और बच्ची के साथ अलग घर में रहते थे। पति की इस तरह अचानक मौत से रजनी कुमारी पूरी तरह सुध-बुध खो बैठी हैं। उनका रो-रोकर बुरा हाल है और वे बार-बार उस पल को याद कर रही हैं जब अमित हंसते हुए घर आए थे।
अमित के पिता सुबोध मंडल और अन्य परिजनों के लिए यह क्षति अपूरणीय है। 27 साल की छोटी सी उम्र में अमित ने देश की सेवा के लिए खुद को समर्पित किया था, लेकिन निजी जीवन की उलझनों ने उनकी जीवनलीला समाप्त कर दी। श्मशान घाट पर जब अंतिम क्रिया की शुरुआत हुई, तो अमित के बड़े भाई के पुत्र (भतीजे) आदित्य कुमार ने उन्हें मुखाग्नि दी। मुखाग्नि के समय वहां मौजूद हर शख्स की पलकें भीग गईं।
राजनैतिक और सामाजिक दिग्गजों ने दी श्रद्धांजलि
जवान अमित कुमार की अंतिम शवयात्रा में समाज के हर वर्ग के लोग शामिल हुए। राजनैतिक दलों के नेताओं ने दलगत राजनीति से ऊपर उठकर मृत जवान को नमन किया। अंतिम यात्रा में शामिल होने वालों में पूर्व विधायक रामविलास पासवान, जिला पार्षद जनार्दन आजाद, अमल कुमार उर्फ गुड्डू, डॉ. प्रवीण कुमार राणा और पवन कुमार भारती प्रमुख रूप से शामिल थे। इन नेताओं ने शोक संतप्त परिवार से मुलाकात की और उन्हें ढांढस बंधाया।
वहीं, क्षेत्रीय विधायक मुरारी पासवान ने भी अमित कुमार के पैतृक आवास पर पहुँचकर अपनी संवेदनाएं प्रकट कीं। विधायक ने कहा कि एक सैनिक का जाना केवल एक परिवार की हानि नहीं है, बल्कि पूरे समाज और राष्ट्र के लिए एक बड़ा आघात है। उन्होंने प्रशासन से मांग की कि मामले की निष्पक्ष जांच हो ताकि सच सामने आ सके। ग्रामीणों का कहना था कि अमित एक मिलनसार और अनुशासित युवक थे और उनके इस कदम ने सबको हैरत में डाल दिया है।
ईएमई कोर और सूरतगढ़ में अमित की सेवाएं
अमित कुमार भारतीय सेना की तकनीकी विंग ‘इलेक्ट्रिकल एंड मैकेनिकल इंजीनियर्स’ (EME) कोर का हिस्सा थे। इस कोर की जिम्मेदारी सेना के हथियारों, वाहनों और उपकरणों की मरम्मत और देखरेख करना होता है। राजस्थान के सूरतगढ़ जैसे संवेदनशील इलाके में 99 एडीजीपी वर्कशॉप में उनकी तैनाती उनके पेशेवर कौशल को दर्शाती थी। सेना के सूत्रों के अनुसार, अमित का ट्रैक रिकॉर्ड अच्छा रहा था और वे अपने कर्तव्यों के प्रति हमेशा सजग रहते थे।
सूरतगढ़ से आए उनके कुछ साथियों ने बताया कि अमित अपनी ड्यूटी को लेकर काफी गंभीर थे। छुट्टियां लेकर जब वे घर के लिए निकले थे, तब काफी खुश थे। सेना के अधिकारियों ने बताया कि अमित जैसे होनहार जवान का जाना विभाग के लिए भी एक बड़ी क्षति है। उनके पार्थिव शरीर के साथ आए सैन्य अधिकारियों ने परिजनों को सांत्वना देते हुए कहा कि सेना हमेशा उनके परिवार के साथ खड़ी रहेगी।
जांच के घेरे में आत्महत्या की वजह
कहलगांव थाना पुलिस इस पूरे मामले को संदिग्ध मानकर चल रही है। हालांकि प्राथमिक दृष्टि में यह आत्महत्या का मामला है, लेकिन पुलिस यह पता लगाने की कोशिश कर रही है कि क्या कोई पारिवारिक कलह या बाहरी दबाव इसके पीछे था। पुलिस ने अमित के मोबाइल फोन और अन्य निजी सामानों को जांच के लिए अपने कब्जे में ले लिया है। पोस्टमार्टम रिपोर्ट आने के बाद ही जहर की प्रकृति और मौत के सटीक समय का पता चल पाएगा।
गांव में इस बात की भी चर्चा है कि अमित पिछले कुछ दिनों से थोड़े गुमसुम थे। सेना की नौकरी के दौरान आने वाले मानसिक दबाव और लंबी दूरियों के कारण कई बार जवान मानसिक तनाव का शिकार हो जाते हैं। सामाजिक कार्यकर्ताओं ने इस घटना के बाद जवानों के मानसिक स्वास्थ्य (Mental Health) पर विशेष ध्यान देने की जरूरत पर जोर दिया है।
अमित कुमार की अंतिम विदाई ने हरचंदपुर गांव को एक गहरे गम में डुबो दिया है। जिस घर से शहनाइयों और बच्चों की किलकारियों की उम्मीद थी, वहां आज केवल सन्नाटा और सिसकियां शेष हैं। तिरंगे में लिपटा उनका शरीर जब चिता की आग में विलीन हुआ, तो वहां मौजूद हर शख्स ने यही प्रार्थना की कि देश के किसी भी जवान को ऐसी परिणति न देखनी पड़े। अमित की यादें अब केवल उनके गांव की गलियों और उनकी छोटी सी बेटी की आंखों में शेष रहेंगी, जिसे शायद अभी यह पता भी नहीं है कि उसके पिता अब कभी वापस नहीं आएंगे।


