जदयू में हरिवंश की छुट्टी तय या होगा सरप्राइज?नीतीश का अगला दांव क्या? निशांत के ‘राजनीतिक राज्याभिषेक’ की चर्चा तेज

बिहार से राज्यसभा के लिए भारतीय जनता पार्टी और राष्ट्रीय लोक मोर्चा ने अपने उम्मीदवारों का ऐलान कर दिया है। अब सबकी निगाहें मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और उनकी पार्टी जनता दल (यूनाइटेड) (जदयू) के फैसले पर टिकी हैं।

चर्चा है कि राज्यसभा के उपसभापति हरिवंश नारायण सिंह को इस बार दोबारा मौका नहीं मिल सकता। जदयू में ‘किंग महेंद्र’ को छोड़कर किसी नेता को तीसरी बार उच्च सदन भेजने की परंपरा नहीं रही है—चाहे वे आरसीपी सिंह हों या वशिष्ठ नारायण सिंह। ऐसे में पत्रकारिता से राजनीति के शीर्ष तक पहुंचे हरिवंश के सामने अब आगे की भूमिका को लेकर सवाल खड़े हो गए हैं।


निशांत कुमार का ‘संसदीय राज्याभिषेक’?

सबसे ज्यादा चर्चा नीतीश कुमार के बेटे निशांत कुमार को लेकर है। सियासी हलकों में कयास हैं कि उन्हें राज्यसभा भेजकर नीतीश अपनी राजनीतिक विरासत को नई दिशा दे सकते हैं।

हालांकि नीतीश सार्वजनिक मंचों पर परिवारवाद के खिलाफ बोलते रहे हैं और निशांत की राजनीति में एंट्री की अटकलों को खारिज करते रहे हैं, लेकिन पार्टी के भीतर उन्हें उच्च सदन भेजने की संभावनाओं को ‘संसदीय राज्याभिषेक’ के तौर पर देखा जा रहा है।


रामनाथ ठाकुर: ईबीसी समीकरण का दांव

दूसरी ओर, जननायक कर्पूरी ठाकुर के पुत्र रामनाथ ठाकुर को तीसरी बार राज्यसभा भेजे जाने की चर्चा जोरों पर है। उन्हें मौका देना नीतीश कुमार की अति पिछड़ा (EBC) राजनीति का अहम हिस्सा माना जा रहा है।

ईबीसी मतदाता जदयू के कोर वोटर माने जाते हैं। कर्पूरी ठाकुर की विरासत को सम्मान देकर नीतीश इस सामाजिक आधार को और मजबूत करना चाहते हैं। अगर ऐसा होता है, तो रामनाथ ठाकुर तीसरी बार राज्यसभा पहुंचने वाले अपवाद बनेंगे।


2022 की ‘टीस’ और हरिवंश

हरिवंश नारायण सिंह की संभावित विदाई के पीछे 2022 की राजनीतिक घटनाएं भी अहम मानी जा रही हैं। जब नीतीश कुमार ने एनडीए छोड़कर महागठबंधन का साथ लिया, तब हरिवंश ने उपसभापति पद से इस्तीफा नहीं दिया और संवैधानिक मर्यादा का हवाला दिया।

हालांकि इसे उनका संस्थागत निर्णय माना गया, लेकिन जदयू के भीतर इसे भाजपा के प्रति झुकाव के रूप में देखा गया। माना जाता है कि तभी से नेतृत्व और हरिवंश के बीच दूरी बढ़ी।


क्या फिर चौंकाएंगे नीतीश?

बिहार की राजनीति में नीतीश कुमार अपने ‘सरप्राइज’ फैसलों के लिए जाने जाते हैं। भाजपा ने अपनी सूची में ओबीसी, सवर्ण और दलित समीकरण साधने की कोशिश की है। अब निगाहें जदयू पर हैं कि वह सामाजिक और राजनीतिक संतुलन कैसे साधता है।

क्या पार्टी अपनी पुरानी परंपरा पर कायम रहेगी, या अंतिम क्षणों में कोई नया मोड़ आएगा? इसका जवाब उम्मीदवारों की आधिकारिक घोषणा के साथ ही सामने आएगा।

फिलहाल, बिहार की सियासत में राज्यसभा को लेकर कयासों का दौर जारी है।

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