“भारत में दुनिया को जोड़ने की ताकत”: मोहन भागवत बोले—स्वार्थ त्याग से ही रुकेगी जंग

नई दिल्ली | 20 मार्च 2026: राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) प्रमुख ने वैश्विक शांति को लेकर बड़ा बयान दिया है। उन्होंने कहा कि दुनिया में बढ़ते संघर्षों और युद्ध जैसी स्थितियों का मूल कारण स्वार्थ और वर्चस्व की भावना है, और जब तक मानवता इन प्रवृत्तियों से ऊपर नहीं उठेगी, तब तक स्थायी शांति संभव नहीं है।

“स्वार्थ और वर्चस्व से पैदा होते हैं संघर्ष”

भागवत ने कहा कि आज दुनिया के अधिकांश विवादों के पीछे एक ही कारण है—दूसरों पर हावी होने की मानसिकता। देश और समाज जब अपने हितों को सर्वोपरि मानकर चलते हैं, तो टकराव स्वाभाविक हो जाता है।

उन्होंने जोर देते हुए कहा कि यदि मानव समाज स्वार्थ को त्यागकर सामूहिक हितों को प्राथमिकता दे, तो कई बड़े संघर्ष अपने आप समाप्त हो सकते हैं।

भारत की परंपरा में है समाधान

संघ प्रमुख ने भारत की सांस्कृतिक विरासत का जिक्र करते हुए कहा कि “सब एक हैं” की भावना हमारी प्राचीन सोच का हिस्सा रही है। यही विचार दुनिया को एकजुट करने और शांति स्थापित करने में अहम भूमिका निभा सकता है।

उन्होंने कहा कि भारत की परंपरा ‘वसुधैव कुटुंबकम’ यानी पूरी दुनिया एक परिवार है, केवल एक नारा नहीं बल्कि जीवन का मार्गदर्शन है।

अच्छे मूल्यों से ही संभव है स्थायी शांति

भागवत के अनुसार, शांति केवल समझौतों या संधियों से नहीं आएगी, बल्कि इसके लिए समाज में अच्छे मूल्यों का पालन जरूरी है। उन्होंने कहा कि जब तक इंसान अपने आचरण में नैतिकता, सहिष्णुता और सहयोग को नहीं अपनाएगा, तब तक शांति अस्थायी ही रहेगी।

विश्व के लिए भारत का संदेश

उन्होंने यह भी कहा कि आज के समय में दुनिया को एक ऐसे मार्गदर्शन की जरूरत है, जो विभाजन नहीं बल्कि एकता की बात करे। भारत इस दिशा में एक उदाहरण बन सकता है।

भागवत के मुताबिक, भारत का सांस्कृतिक दृष्टिकोण वैश्विक स्तर पर शांति और सौहार्द स्थापित करने की क्षमता रखता है।

निष्कर्ष

संघ प्रमुख का यह बयान ऐसे समय में आया है जब दुनिया के कई हिस्सों में तनाव और संघर्ष की स्थिति बनी हुई है। उनके अनुसार, स्थायी शांति का रास्ता केवल शक्ति प्रदर्शन नहीं, बल्कि एकता, नैतिकता और मानवता के मूल्यों से होकर गुजरता है—और यही संदेश भारत दुनिया को दे सकता है।

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