
बख्तियारपुर/पटना। बिहार की राजधानी पटना के बख्तियारपुर थाना क्षेत्र से एक ऐसी रूह कंपा देने वाली और विचलित करने वाली खबर सामने आई है, जिसने न केवल सामाजिक सुरक्षा के दावों की पोल खोल दी है, बल्कि यह भी उजागर किया है कि कैसे एक आदतन अपराधी ‘सामाजिक पंचायत’ और ‘समझौते’ की आड़ में सालों तक मासूमों का शिकार करता रहा। बख्तियारपुर के एक गांव में दुष्कर्म की शिकार हुई एक नाबालिग किशोरी ने एक निजी अस्पताल में एक बच्ची को जन्म दिया है। इस घटना ने पूरे इलाके में आक्रोश और शोक की लहर पैदा कर दी है। पुलिस ने त्वरित कार्रवाई करते हुए 35 वर्षीय मुख्य आरोपी साधु यादव को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया है। आरोपी ने अपना गुनाह स्वीकार कर लिया है, लेकिन इस मामले ने उन घावों को फिर से हरा कर दिया है जो आरोपी ने पिछले कई वर्षों में कई अन्य महिलाओं और बच्चियों को दिए थे। 5 अप्रैल 2026 की यह रिपोर्ट उस तंत्र और समाज के लिए एक कड़ा सबक है जो जघन्य अपराधों में ‘समझौते’ का रास्ता तलाशते हैं।
मजबूरी, डर और जन्म: एक मासूम की चीख
बख्तियारपुर थाना क्षेत्र के एक सुदूर गांव में रहने वाली यह किशोरी पिछले कई महीनों से शारीरिक और मानसिक यातना का शिकार थी। पीड़िता के अनुसार, उसके पड़ोसी साधु यादव (पिता- रामजन्म यादव) ने उसके साथ कई बार दुष्कर्म किया। जब किशोरी ने विरोध करने की कोशिश की, तो आरोपी ने उसे डराया-धमकाया। आरोपी का आतंक इतना अधिक था कि उसने किशोरी के भाई की हत्या करने की धमकी दी थी। अपने भाई की जान बचाने के डर से मासूम किशोरी चुप रही और इसी खामोशी का फायदा उठाकर आरोपी दरिंदगी करता रहा।
किशोरी जब गर्भवती हुई, तो आरोपी साधु यादव ने पाप को छुपाने के लिए उसे जबरन गर्भपात कराने के लिए डॉक्टरों के पास ले गया। हालांकि, गर्भ काफी अधिक समय का हो चुका था, इसलिए डॉक्टरों ने किसी भी प्रकार के हस्तक्षेप से इनकार कर दिया। अंततः, किशोरी ने एक नवजात बच्ची को जन्म दिया। जिस उम्र में इस बच्ची को स्कूल जाना चाहिए था और खिलौनों से खेलना चाहिए था, उस उम्र में वह एक नवजात की मां बन गई है। अस्पताल के बेड पर पड़ी किशोरी की सूनी आंखें समाज से सवाल पूछ रही हैं कि उसका कसूर क्या था?
साधु यादव: एक आदतन अपराधी और ‘सामाजिक न्याय’ की विफलता
पुलिस की जांच और स्थानीय लोगों से पूछताछ में जो तथ्य सामने आए हैं, वे बेहद चौंकाने वाले और डरावने हैं। 35 वर्षीय साधु यादव कोई पहली बार अपराध नहीं कर रहा था। वह इलाके का ‘सीरियल रेपिस्ट’ और छेड़खानी करने वाला अपराधी रहा है।
द वॉयस ऑफ बिहार के विशेष विश्लेषण के अनुसार, साधु यादव का पिछला रिकॉर्ड कानून और समाज की विफलता का सबसे बड़ा प्रमाण है:
- 2021 का दुष्कर्म कांड: ठीक पांच वर्ष पहले, वर्ष 2021 में साधु यादव ने इसी पीड़िता की सगी चचेरी नाबालिग बहन के साथ भी दुष्कर्म किया था। उस वक्त पुलिस के पास जाने के बजाय गांव में ‘पंचायत’ बैठी। पंचायत ने उसे केवल तीन महीने के लिए गांव से बाहर निकालने का ‘सामाजिक दंड’ दिया। यदि उस वक्त पुलिस कार्रवाई हुई होती और वह जेल गया होता, तो आज यह दूसरी किशोरी शिकार न हुई होती।
- नालंदा की घटना: आरोपी ने पड़ोसी जिले नालंदा में भी एक पंचायत समिति सदस्य (महिला) के साथ छेड़छाड़ और दुष्कर्म का प्रयास किया था। वहां भी ‘लोक-लाज’ का हवाला देकर दोनों पक्षों के बीच समझौता करा दिया गया।
- पहुंच और रसूख: साधु यादव हर बार अपनी पहुंच और सामाजिक दबाव के दम पर बच निकलता था। वह युवतियों के साथ छेड़खानी को अपना अधिकार समझ बैठा था क्योंकि उसे पता था कि पंचायत उसे बचा लेगी।
पुलिस की कार्रवाई और आरोपी का इकबाल-ए-जुर्म (विशेष विश्लेषण)
मामला तब प्रकाश में आया जब किशोरी को अस्पताल ले जाया गया और पुलिस को सूचित किया गया। बख्तियारपुर पुलिस ने संवेदनशीलता दिखाते हुए पीड़िता का बयान दर्ज किया और आरोपी के खिलाफ पॉक्सो (POCSO) एक्ट की सुसंगत धाराओं के तहत प्राथमिकी दर्ज की।
पुलिस ने बिना समय गंवाए छापेमारी की और साधु यादव को धर दबोचा। पूछताछ के दौरान वह पुलिस के सामने टूट गया और अपना गुनाह कबूल कर लिया। उसने माना कि उसने किशोरी को डरा-धमकाकर उसके साथ गलत काम किया था। पुलिस ने कानूनी प्रक्रिया पूरी करने के बाद उसे न्यायिक हिरासत में जेल भेज दिया है। सिटी एसपी और अन्य वरीय अधिकारियों ने निर्देश दिए हैं कि इस मामले में साक्ष्यों का संकलन तेजी से किया जाए ताकि स्पीडी ट्रायल के जरिए अपराधी को फांसी या उम्रकैद जैसी कड़ी सजा दिलाई जा सके।
सामाजिक ‘समझौता’ बनाम कानूनी न्याय: एक कड़वी हकीकत
बख्तियारपुर की यह घटना उस ‘पंचायत संस्कृति’ पर एक तमाचा है जो दुष्कर्म जैसे गंभीर अपराधों को केवल ‘इज्जत’ का मामला बनाकर रफा-दफा कर देती है। 2021 में अगर पीड़िता की चचेरी बहन के मामले में पंचायत ने साधु यादव को सजा दिलाने में मदद की होती, तो आज यह नौबत न आती।
- अपराध को शह: जब समाज अपराधी को केवल तीन महीने के लिए गांव से बाहर निकालता है, तो यह सजा नहीं बल्कि अपराधी के लिए ‘छुट्टी’ जैसा होता है। इससे उसका साहस और बढ़ जाता है।
- लोक-लाज का डर: अक्सर ग्रामीण क्षेत्रों में परिवार लोक-लाज के डर से पुलिस के पास नहीं जाते। साधु यादव जैसे भेड़िये इसी डर का फायदा उठाते हैं।
- भाई की हत्या की धमकी: आरोपी ने पीड़िता के भाई को मारने की धमकी दी थी, जो यह दर्शाता है कि उसे कानून का कोई खौफ नहीं था।
पीड़िता का भविष्य और प्रशासन का दायित्व
फिलहाल किशोरी और उसकी नवजात बच्ची की हालत स्थिर बताई जा रही है, लेकिन असली चुनौती अब शुरू होती है। एक नाबालिग माँ और उसकी नवजात बच्ची का समाजीकरण कैसे होगा? क्या समाज उन्हें स्वीकार करेगा?
जिला प्रशासन को चाहिए कि:
- मुआवजा: पीड़िता को सरकारी प्रावधानों के तहत तत्काल आर्थिक सहायता और पुनर्वास की सुविधा दी जाए।
- शिक्षा: किशोरी की बाधित हुई शिक्षा को पुनः शुरू करने के लिए विशेष प्रयास किए जाएं।
- सुरक्षा: पीड़िता के परिवार को आरोपी के समर्थकों से सुरक्षा प्रदान की जाए, क्योंकि गांव में अभी भी तनाव की स्थिति बनी हो सकती है।
समाधान की दिशा में एक सख्त संदेश
बख्तियारपुर के इस कांड ने एक बार फिर यह साबित कर दिया है कि अपराध का कोई ‘सामाजिक समाधान’ नहीं हो सकता। दुष्कर्म जैसे मामलों में ‘पंचायत’ या ‘समझौता’ करना दूसरे अपराध को निमंत्रण देना है। साधु यादव का जेल जाना एक शुरुआत है, लेकिन अंत तब होगा जब उसे ऐसी सजा मिले जो मिसाल बन सके।
द वॉयस ऑफ बिहार की टीम इस पूरी कानूनी लड़ाई पर अपनी नजर बनाए हुए है। हमारा मानना है कि 2021 की उस पंचायत के सदस्यों की भी जवाबदेही तय होनी चाहिए जिन्होंने एक बलात्कारी को खुला छोड़ दिया था। फिलहाल, बख्तियारपुर पुलिस की मुस्तैदी ने एक दरिंदे को सलाखों के पीछे पहुँचाया है, लेकिन न्याय


