
पटना | बिहार न्यूज़: बिहार में पुलिस की कार्यशैली को लेकर एक बार फिर न्यायपालिका ने कड़ा रुख अपनाया है। ने जमुई जिले में कथित अवैध गिरफ्तारी के मामले में सख्त टिप्पणी करते हुए पुलिस अधीक्षक (SP), एसडीपीओ (SDPO) और तत्कालीन थाना प्रभारी (SHO) के खिलाफ विभागीय कार्रवाई के आदेश दिए हैं। कोर्ट ने राज्य के पुलिस महानिदेशक (DGP) को स्पष्ट निर्देश दिया है कि पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कर कार्रवाई सुनिश्चित की जाए।
अदालत की सख्त टिप्पणी, SHO पर जांच से रोक
न्यायमूर्ति की एकल पीठ ने सुनवाई के दौरान कहा कि पुलिस ने कानून और सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों की खुली अनदेखी की है। कोर्ट ने आदेश दिया कि जब तक जांच पूरी नहीं हो जाती, संबंधित SHO को किसी भी मामले की जांच की जिम्मेदारी नहीं दी जाएगी।
सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों की अनदेखी पर नाराजगी
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में फैसले का हवाला देते हुए कहा कि 7 साल से कम सजा वाले मामलों में सीधे गिरफ्तारी नहीं की जा सकती। ऐसे मामलों में पहले के तहत नोटिस देना अनिवार्य है।
कोर्ट ने पाया कि जमुई पुलिस ने इन निर्देशों की अवहेलना की और बिना पर्याप्त कारण के गिरफ्तारी की, जो कि न्यायालय के आदेशों का उल्लंघन है।
क्या है पूरा मामला?
पूरा विवाद वर्ष 2020 में दर्ज एक प्राथमिकी से जुड़ा है। आरोप था कि एक व्यक्ति के फेसबुक अकाउंट से आपत्तिजनक पोस्ट किए गए, जिसके बाद पुलिस ने मामला दर्ज कर लिया। इस केस में और के तहत धाराएं लगाई गईं।
याचिकाकर्ता का कहना है कि:
- मामले को गंभीर बनाने के लिए गलत धाराएं जोड़ी गईं
- बिना नोटिस दिए उन्हें हिरासत में लिया गया
- सादे कपड़ों में पुलिसकर्मियों ने रास्ते से उठाया
- थाने में अभद्र व्यवहार और धमकी दी गई
हथकड़ी लगाकर पेश करने पर भी आपत्ति
कोर्ट ने इस बात पर भी गंभीर नाराजगी जताई कि आरोपी को हथकड़ी लगाकर मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (CJM) के समक्ष पेश किया गया। अदालत ने इसे ‘दुर्भावनापूर्ण कार्रवाई’ करार देते हुए कहा कि यह न केवल मानवाधिकारों का उल्लंघन है, बल्कि स्थापित कानूनी प्रक्रिया के खिलाफ भी है।
अवमानना नोटिस जारी
हाईकोर्ट ने मामले में शामिल तत्कालीन जांच अधिकारी और SHO को के तहत ‘सिविल अवमानना’ का दोषी मानते हुए कारण बताओ नोटिस जारी किया है। अधिकारियों को 8 सप्ताह के भीतर जवाब देने का निर्देश दिया गया है।
अगली सुनवाई 19 जून को
कोर्ट ने इस मामले की अगली सुनवाई 19 जून 2026 को निर्धारित की है। तब तक संबंधित SHO पर जांच कार्य करने की रोक जारी रहेगी। इस आदेश के बाद पुलिस महकमे में हलचल तेज हो गई है और कई स्तरों पर समीक्षा शुरू होने की संभावना है।
हाईकोर्ट का यह फैसला साफ संकेत देता है कि कानून से ऊपर कोई नहीं है—चाहे वह पुलिस ही क्यों न हो। सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों की अनदेखी और नागरिक अधिकारों के उल्लंघन पर अब न्यायपालिका सख्ती से कार्रवाई कर रही है, जो भविष्य में पुलिसिंग सिस्टम में सुधार का रास्ता खोल सकता है।


