
हमीरपुर/बैसा (पूर्णिया), 23 मई 2026। न्यायपालिका के विन्यास से सामाजिक शुचिता को संबल देने वाली और बच्चों के विरुद्ध होने वाले लैंगिक अपराधों पर एक अभेद्य सुरक्षा कवच निर्मित करने वाली एक बेहद प्रखर विधिक प्रविष्टि पटल पर आई है। पॉक्सो (POCSO) मामलों की विशेष अदालत ने धार्मिक स्थल की पवित्रता को तार-तार करते हुए एक अबोध और कनिष्ठ बालिका के साथ अमानवीय कृत्य को अंजाम देने वाले एक दोषी मौलाना के खिलाफ ऐतिहासिक और कड़ा दंडात्मक चक्रव्यूह लॉक कर दिया है।
विशेष न्यायाधीश (पॉक्सो) अनिल कुमार खरवार की विधिक अदालत ने शुक्रवार को इस संवेदनशील मामले की अंतिम संचिका पर हस्ताक्षर करते हुए दोषी मौलाना को प्राकृतिक जीवन की आखिरी सांस तक (मृत्युपर्यन्त) कारावास की कड़क सजा मुकम्मल की है। अदालत के इस कड़े रुख के बाद न केवल पीड़िता के परिजनों को एक लंबा विधिक न्याय हस्तगत हुआ है, बल्कि समाज विरोधी मानसिकताओं के भीतर भी कानून का एक अभेद्य खौफ लाइव प्रमाणित हुआ है। विधिक न्यायपीठ ने कारावास के इस कड़े विन्यास के साथ-साथ दोषी के ऊपर 26 हजार रुपये की सांख्यिकी का आर्थिक जुर्माना भी विधारित किया है।
पूर्णिया के कोचगढ़ का निवासी है दोषी मौलाना, मस्जिद में बच्चों को पढ़ाता था अरबी
इस संगीन मामले की विधिक संचिकाओं और जासूसी विलेखों के अनुसार, कठोरतम दंडात्मक धारा की जद में आया मुख्य दोषी मौलाना मुंतजिर आलम मूल रूप से बिहार राज्य के अंतर्गत आने वाले पूर्णिया जिले के रौटा थाना क्षेत्र के कोचगढ़ अंचल का निवासी संधारित है। वह कतिपय समय पूर्व अपनी पहचान और धार्मिक प्रचालन को डाइवर्ट करते हुए उत्तर प्रदेश के हमीरपुर जिला अंतर्गत आने वाले कुरारा थाना क्षेत्र के एक स्थानीय ग्रामीण प्रक्षेप में प्रविष्ट हुआ था।
वहां गांव की एक मस्जिद के भीतर वह कनिष्ठ बच्चों को उर्दू और अरबी भाषाओं के विन्यास को आत्मसात कराने का लिपिकीय कार्य देख रहा था। स्थानीय नागरिकों ने उस पर अटूट विश्वास जताते हुए अपने बच्चों के भविष्य को संवारने का दायित्व सुपुर्द किया था, परंतु मौलाना के भीतर एक बेहद संदेहास्पद और कलुषित मानसिक विकार संधारित हो चुका था, जिसने इस पवित्र दायित्व को एक अमानवीय अपराध की पटकथा में तब्दील कर दिया।
29 नवंबर 2023 की वह खौफनाक सुबह: भाई को बर्तन धोने में उलझाकर कमरे में किया बंद
इस हृदयविदारक और खौफनाक वारदात के धरातलीय विन्यासों को आपस में जोड़ने के लिए हमें मचलते ढाई वर्ष पूर्व यानी 29 नवंबर 2023 की उस काली सुबह के टाइम-स्टैम्प को खंगालना होगा। विशेष लोक अभियोजक (पॉक्सो एक्ट) रुद्रप्रताप सिंह द्वारा न्यायालय के पटल पर प्रस्तुत किए गए विलेखों के अनुसार, उस नियत तिथि की सुबह एक 11 वर्षीय अबोध बच्ची अपने सहोदर भाई के समन्वय से गांव की उसी मस्जिद के भीतर धार्मिक और भाषाई शिक्षा ग्रहण करने के उद्देश्य से नियमित रूप से प्रविष्ट हुई थी।
मस्जिद के शांत वातावरण और अंचल में अन्य वयस्कों की अनुपस्थिति का फायदा उठाते हुए मौलाना मुंतजिर आलम ने एक बेहद शातिर और कूटनीतिक चक्रव्यूह लाइव किया। उसने पीड़िता की आवाज और उसके प्रतिरोध को पहले ही म्यूट करने की नीयत से उसके छोटे भाई को बहला-फुसलाकर मस्जिद के बाहरी मुहाने पर बर्तनों की साफ-सफाई और धुलाई के कनिष्ठ कार्य में कड़ाई से उलझा दिया, ताकि आंतरिक कमरों की ओर किसी भी बाहरी पैर की प्रविष्टि को पूरी तरह से ब्लॉक किया जा सके।
जैसे ही भाई बाहरी विन्यास में व्यस्त होकर म्यूट हुआ, दोषी मौलाना मुंतजिर आलम ने अपनी हवस के खूनी ग्राफ को सक्रिय मोड पर लाते हुए 11 वर्षीय अबोध बालिका को जबरन दबोच लिया। वह उसे घसीटते हुए मस्जिद परिसर के भीतर अवस्थित एक अत्यंत एकांत और अंधेरे वाले आंतरिक कमरे के भीतर ले गया और वहां किवाड़ को पूरी कड़ाई से भीतर से लॉक कर दिया। कमरे के बंद सन्नाटे के बीच मौलाना ने बच्ची की विवशता, उसकी मासूम चीखों और रोने की आवाजों को पूरी तरह से दबाते हुए उसके साथ वीभत्स दुष्कर्म की वारदात को अंजाम दिया।
इस बर्बर कृत्य के दौरान पीड़िता लगातार उसके चंगुल से मुक्त होने और अपने भाई को पुकारने का कड़ा प्रयास करती रही, परंतु अपराधी की क्रूरता के आगे उसकी हर मानवीय अपील पूरी तरह से निष्प्रभावी संधारित रही। वारदात को अंजाम देने के बाद मौलाना ने पीड़िता को विधिक कानूनी कार्रवाई करने पर गंभीर दंडात्मक परिणाम भुगतने और जान से मारने का कड़ा मनोवैज्ञानिक खौफ भी दिखाया ताकि साक्ष्यों को म्यूट रखा जा सके।
पीड़िता के ताऊ ने दर्ज कराई थी प्राथमिकी, जासूसी विंग ने साक्ष्यों को किया कलेक्ट
अपराधियों के इस खौफनाक चक्रव्यूह से मुक्त होने के बाद, पीड़ित बच्ची जब बदहवास अवस्थिति में अपने आवासीय परिसर पहुंची, तो उसकी शारीरिक अस्वस्थता और चेहरे के मानसिक अवसाद को देख परिजनों के बीच कोहराम मच गया। संवेदनशीलता का परिचय देते हुए जब बच्ची को ढांढस बंधाया गया, तब उसने रोते हुए मस्जिद के भीतर घटित हुई पूरी अमानवीय दास्तान अपने परिजनों को हस्तगत कराई। इस जघन्य सामाजिक विसंगति की इनपुट मिलते ही पीड़िता के ताऊ ने बिना किसी लिपिकीय ढिलाई के तुरंत कुरारा थाना पुलिस के आला कप्तानों से संपर्क स्थापित किया और मौलाना मुंतजिर आलम के खिलाफ नामजद लिखित विलेख (प्राथमिकी) दर्ज कराई।
पुलिस की जासूसी विंग और फॉरेंसिक एक्सपर्ट्स ने तुरंत हरकत में आते ही घटना स्थल यानी मस्जिद के उस कमरे की विधिक घेराबंदी की और वैज्ञानिक साक्ष्यों का संकलन मुकम्मल किया। पुलिस ने त्वरित कार्रवाई करते हुए भागने की फिराक में मुस्तैद मौलाना को न्यूनतम समय-सीमा के भीतर गिरफ्तार कर सलाखों के पीछे भेज दिया था।
विशेष लोक अभियोजक रुद्रप्रताप सिंह की दलीलें: फॉरेंसिक साक्ष्यों से अभेद्य बनी केस डायरी
विधिक अदालत के भीतर चले लंबे ट्रायल के दौरान अभियोजन पक्ष की ओर से विशेष लोक अभियोजक (पॉक्सो एक्ट) रुद्रप्रताप सिंह ने मामले को तार्किक रूप से अभेद्य बनाने के लिए साक्ष्यों की सांख्यिकी को प्रखरता से पटल पर रखा। विशेष लोक अभियोजक रुद्रप्रताप सिंह ने पीड़िता के विधिक फर्दबयान, डॉक्टरों के पैनल द्वारा तैयार की गई प्रामाणिक मेडिकल रिपोर्ट और फॉरेंसिक साइंस लैबोरेट्री (FSL) के रासायनिक विलेखों को कोर्ट डायरी का मुख्य आधार विनिर्मित किया।
बचाव पक्ष के वकीलों द्वारा मामले को तकनीकी रूप से डाइवर्ट करने और मौलाना को निर्दोष सिद्ध करने के जितने भी कूटनीतिक प्रयास किए गए, उन्हें अभियोजन पक्ष ने कानून की कड़क नजीरों के बल पर पूरी तरह से नेस्तनाबूद और ब्लॉक कर दिया। अदालत के समक्ष यह अकाट्य रूप से प्रमाणित किया गया कि रक्षक की वर्दी और धार्मिक प्रचारक के विन्यास में छिपे इस भेड़िये ने एक अबोध बच्ची के मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य को जो गहरे जख्म दिए हैं, वह अक्षम्य और समाज के ताने-बाने को मलबे में तब्दील करने वाला कृत्य है।
विशेष न्यायाधीश अनिल कुमार खरवार का कड़ा रुख: मृत्युपर्यन्त कारावास का विधिक विन्यास
दोनों पक्षों की प्रखर दलीलों को सुनने, गवाहों के बयानों की स्क्रूटनी मुकम्मल करने और साक्ष्यों का फॉरेंसिक ऑडिट करने के उपरांत विशेष न्यायाधीश (पॉक्सो) अनिल कुमार खरवार ने मौलाना मुंतजिर आलम को भारतीय दंड संहिता और लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम (पॉक्सो एक्ट) की सुसंगत और कड़क धाराओं के तहत शत-प्रतिशत दोषी संधारित किया। सजा के विन्यास पर विधिक फैसला सुनाते हुए न्यायपीठ ने रेखांकित किया कि ऐसे अपराधियों को सामान्य कारावास की परिधि में रखना न्याय की मूल भावना के विपरीत होगा।
इसी के तहत अदालत ने मुंतजिर आलम को विधिक रूप से “मृत्युपर्यन्त कारावास” यानी जब तक उसके शरीर के भीतर जीवन की आखिरी सांस लाइव रहेगी, तब तक वह जेल की अभेद्य चहारदीवारी के भीतर ही लॉक रहेगा। इसके साथ ही विधारित किया गया 26 हजार रुपये का कुल आर्थिक जुर्माना यदि दोषी द्वारा ससमय जमा नहीं किया जाता है, तो उसके कारावास की समय सारणी को विधिक नियमों के अनुसार अतिरिक्त कठोर श्रम के विन्यास में और अधिक विस्तारित किया जाएगा। अदालत से सजा की प्रति निर्गत होने के उपरांत सुरक्षा बलों के सशस्त्र जवानों ने दोषी मौलाना को कड़े सुरक्षा घेरे में लेकर केंद्रीय कारागार की कोठरी में स्थानांतरित करने का प्रक्रम मुकम्मल कर दिया है।


