
हाजीपुर के रामभद्र मोहल्ला स्थित प्रसिद्ध रामचौरा मंदिर इन दिनों आध्यात्मिक ऊर्जा और जनआस्था का प्रमुख केंद्र बना हुआ है। रामनवमी के पावन अवसर पर यहाँ श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ रही है। मंदिर परिसर में भक्ति, श्रद्धा और उल्लास का अद्भुत संगम देखने को मिल रहा है।
प्राचीन मान्यताओं के अनुसार, त्रेतायुग में ताड़कासुर वध के बाद भगवान श्रीराम अपने भाई लक्ष्मण और गुरु विश्वामित्र के साथ नारायणी नदी के तट पर पहुँचे थे। लोकश्रुति है कि इसी स्थान पर उन्होंने अपने चरण-चिह्न अंकित किए, जो आज भी श्रद्धालुओं के लिए आस्था का प्रमुख प्रतीक हैं।
माना जाता है कि भगवान राम के आगमन के बाद ही इस क्षेत्र का नाम रामचौरा या रामभद्र पड़ा। जो स्थान कभी एक साधारण टीला था, आज वहीं लगभग 151 फीट ऊँचा भव्य मंदिर खड़ा है, जिसकी स्थापत्य शैली में अयोध्या के मंदिर की झलक दिखाई देती है।
रामनवमी के अवसर पर मंदिर को रंग-बिरंगी रोशनी से सजाया गया है। यहाँ अखंड रामायण पाठ, विशेष पूजा-अर्चना और विशाल भंडारे का आयोजन किया जा रहा है, जिसमें दूर-दराज़ से आए श्रद्धालु बड़ी संख्या में भाग ले रहे हैं।
पौराणिक कथाओं में भी इस स्थल का उल्लेख मिलता है कि जनकपुर में आयोजित सीता स्वयंवर के लिए जाते समय भगवान राम, लक्ष्मण और महर्षि विश्वामित्र ने गंगा पार कर इसी क्षेत्र में विश्राम किया था। वैशाली के राजा सुमति ने उनका स्वागत किया था।
आज रामचौरा मंदिर न केवल धार्मिक आस्था का केंद्र है, बल्कि इतिहास, संस्कृति और लोकविश्वास का अनूठा संगम भी प्रस्तुत करता है, जहाँ हर कदम पर राम कथा जीवंत प्रतीत होती है।


