​सड़क हादसे ने छीनी युवक की सांसे: 17 दिनों तक मौत से जंग लड़ता रहा गोड्डा का मुकेश, भागलपुर में तोड़ा दम

भागलपुर/गोड्डा। रफ़्तार का जुनून और सड़कों पर दौड़ती मौत की गाड़ियों ने एक बार फिर एक हंसते-खेलते परिवार को कभी न भरने वाला जख्म दे दिया है। झारखंड के गोड्डा जिले से इलाज के लिए भागलपुर लाए गए एक घायल युवक की मौत के साथ ही उम्मीदों का वो आखिरी दीया भी बुझ गया, जिसे बचाने के लिए परिजन पिछले 17 दिनों से रात-दिन एक किए हुए थे। पथरगामा थाना क्षेत्र के हरकट्टा निवासी मुकेश कुमार उर्फ मुकेश तांती (पिता स्व. कैलाश पासवान) ने बुधवार की देर रात भागलपुर के अस्पताल में इलाज के दौरान अंतिम सांस ली। 6 अप्रैल को हुए एक भीषण सड़क हादसे के बाद से ही मुकेश की स्थिति नाजुक बनी हुई थी। डॉक्टरों की तमाम कोशिशों और परिवार की प्रार्थनाओं के बावजूद, नियति को कुछ और ही मंजूर था। गुरुवार, 23 अप्रैल 2026 की सुबह जैसे ही मुकेश की मौत की खबर उसके पैतृक गांव पहुँची, पूरे इलाके में सन्नाटा पसर गया। पुलिस ने शव को अपने कब्जे में लेकर पोस्टमार्टम की प्रक्रिया शुरू कर दी है, लेकिन इस हादसे ने एक बार फिर सुरक्षित सफर और सड़कों पर बढ़ते ‘हिट एंड रन’ के मामलों पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

6 अप्रैल की वो मनहूस शाम: जब रफ़्तार बनी काल

​घटना की शुरुआत आज से करीब दो सप्ताह पहले 6 अप्रैल को हुई थी। जानकारी के अनुसार, मुकेश तांती उस दिन अपने मित्र कुंदन के साथ कुछ निजी काम से घर से बाहर निकला था। दोनों दोस्त अपनी बाइक पर सवार होकर घूमने और जरूरी सामान लेने निकले थे। दिन भर की भागदौड़ के बाद जब वे घर लौट रहे थे, तभी गांधीग्राम चौक के समीप एक अनियंत्रित और अज्ञात वाहन ने उनकी खुशियों को रौंद दिया।

​प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, अज्ञात वाहन की गति इतनी तेज थी कि बाइक सवार मुकेश और कुंदन को संभलने तक का अवसर नहीं मिला। जोरदार टक्कर मारने के बाद वाहन चालक मौके से फरार हो गया। इस टक्कर की आवाज इतनी भयावह थी कि आसपास के लोग सहम गए। सड़क किनारे लहूलुहान पड़े मुकेश को देखकर स्थानीय लोगों ने तुरंत पुलिस और परिजनों को सूचित किया। उस समय किसी ने नहीं सोचा था कि यह मामूली सा दिखने वाला सफर मुकेश के जीवन का आखिरी सफर साबित होगा।

जीवन और मृत्यु के बीच 17 दिनों का कड़ा संघर्ष

​हादसे के तुरंत बाद मुकेश को स्थानीय स्वास्थ्य केंद्र ले जाया गया था, लेकिन सिर और शरीर के अंदरूनी हिस्सों में गंभीर चोट होने के कारण उसे प्राथमिक उपचार के बाद बेहतर चिकित्सा के लिए भागलपुर रेफर कर दिया गया। भागलपुर के अस्पताल में पिछले 17 दिनों से मुकेश का इलाज चल रहा था। इस दौरान उसके परिवार ने अपनी जमा-पूंजी और उम्मीदें, सब कुछ दांव पर लगा दी थीं।

​परिजनों ने बताया कि मुकेश के पिता कैलाश पासवान का निधन पहले ही हो चुका था, जिसके बाद घर की जिम्मेदारी और भविष्य के सपने मुकेश के कंधों पर ही टिके थे। वह एक मेहनती युवक था जो अपने परिवार को एक बेहतर जिंदगी देना चाहता था। अस्पताल के बेड पर अचेत पड़े मुकेश को देखकर उसकी माँ और सगे-संबंधी हर दिन एक चमत्कार की उम्मीद करते थे। हालांकि, समय बीतने के साथ उसकी हालत में सुधार होने के बजाय गिरावट आती गई। बुधवार की देर रात मुकेश के शरीर ने साथ छोड़ दिया और डॉक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया।

पुलिस की कार्रवाई और पोस्टमार्टम की प्रक्रिया

​मुकेश की मौत के बाद अस्पताल प्रशासन ने इसकी जानकारी स्थानीय पुलिस को दी। गुरुवार सुबह भागलपुर पुलिस ने शव को अपने कब्जे में लेकर पोस्टमार्टम के लिए भेजा। पुलिस के अनुसार, यह मामला ‘हिट एंड रन’ का है, जहाँ एक अज्ञात वाहन ने लापरवाही से गाड़ी चलाते हुए युवक को टक्कर मारी।

पुलिस जांच के मुख्य बिंदु:

  1. अज्ञात वाहन की पहचान: पुलिस अब गांधीग्राम चौक और उसके आसपास लगे सीसीटीवी फुटेज खंगाल रही है ताकि उस अपराधी वाहन का पता लगाया जा सके जो टक्कर मारकर फरार हुआ था।
  2. कुंदन का बयान: हादसे के समय मुकेश के साथ मौजूद उसका दोस्त कुंदन भी घायल हुआ था। पुलिस उसके बयान के आधार पर वाहन के प्रकार और दिशा की पहचान करने की कोशिश कर रही है।
  3. कानूनी प्रक्रिया: पोस्टमार्टम रिपोर्ट आने के बाद मौत के सटीक कारणों का दस्तावेज तैयार होगा, जिसके आधार पर मामले में अग्रिम कार्रवाई की जाएगी।

एक मजदूर परिवार की कमर टूटी: पिता के बाद अब बेटे का साया भी उठा

​मुकेश तांती के परिवार की पृष्ठभूमि संघर्षों से भरी रही है। पिता कैलाश पासवान की मृत्यु के बाद मुकेश ही घर का इकलौता सहारा बनने की कोशिश कर रहा था। ग्रामीण परिवेश में एक विधवा माँ के लिए उसका बेटा ही सब कुछ होता है। मुकेश की मौत ने उस बूढ़ी माँ को पूरी तरह तोड़ दिया है। गांव वालों का कहना है कि मुकेश मिलनसार स्वभाव का था और हमेशा दूसरों की मदद के लिए तैयार रहता था।

​इस हादसे ने न केवल एक जान ली है, बल्कि एक पूरे परिवार को आर्थिक और मानसिक रूप से अपंग कर दिया है। 17 दिनों तक चले इलाज ने परिवार को कर्ज के बोझ तले दबा दिया है और अब घर चलाने वाला ही इस दुनिया में नहीं रहा। समाज और प्रशासन के लिए यह सोचने का विषय है कि ऐसे पीड़ित परिवारों को सामाजिक सुरक्षा योजनाओं के माध्यम से कैसे संबल प्रदान किया जाए।

सड़क सुरक्षा: गांधीग्राम चौक और बढ़ते ब्लैक स्पॉट

​गांधीग्राम चौक के समीप हुई यह दुर्घटना कोई पहली घटना नहीं है। स्थानीय लोगों के अनुसार, इस मार्ग पर तेज रफ़्तार वाहनों की आवाजाही अक्सर हादसों का सबब बनती है। सड़कों का चौड़ीकरण तो हुआ है, लेकिन यातायात नियमों के पालन और रफ़्तार पर लगाम लगाने के लिए कोई प्रभावी तंत्र विकसित नहीं किया गया है।

सड़क हादसों के कारण और चुनौतियां:

  • ओवरस्पीडिंग: ग्रामीण और अर्ध-शहरी इलाकों में रात के समय भारी वाहन बिना किसी नियंत्रण के दौड़ते हैं।
  • हेलमेट की अनदेखी: अक्सर युवा छोटी दूरी तय करने के चक्कर में हेलमेट नहीं पहनते, जिससे सिर की चोट जानलेवा बन जाती है।
  • लाइट की कमी: गांधीग्राम चौक जैसे महत्वपूर्ण मोड़ों पर पर्याप्त रोशनी न होना भी रात के समय होने वाले हादसों का एक प्रमुख कारण है।
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