खबर के मुख्य बिंदु:
- बड़ा भरोसा: मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने साफ किया—जेडीयू का नेतृत्व वही करते रहेंगे।
- दिल्ली से पटना: राज्यसभा सांसद बनने के बाद भी बिहार में पूरा समय देंगे और विकास कार्यों की निगरानी करेंगे।
- इच्छा पूर्ति: चारों सदनों (लोकसभा, राज्यसभा, विधानसभा और विधान परिषद) का सदस्य बनने की ‘दिली इच्छा’ के कारण लिया नामांकन का फैसला।
- NDA का मार्गदर्शन: नई सरकार और गठबंधन के लिए नीतीश कुमार ‘गार्जियन’ की भूमिका में बने रहेंगे।
पटना: बिहार की राजनीति में मचे उथल-पुथल के बीच मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने अपनी चुप्पी तोड़ते हुए पार्टी के भीतर की बेचैनी को शांत कर दिया है। शुक्रवार को 1, अणे मार्ग (मुख्यमंत्री आवास) में आयोजित जेडीयू विधानमंडल दल और सांसदों की बैठक में ‘सुशासन बाबू’ ने दो टूक शब्दों में कह दिया— “चिंता मत करिए, मैं कहीं नहीं जा रहा हूँ।” राज्यसभा जाने के फैसले से मायूस समर्थकों को उन्होंने भरोसा दिलाया कि वे दिल्ली में जरूर रहेंगे, लेकिन उनकी नजर और नेतृत्व का साया हमेशा बिहार पर बना रहेगा।
“चारों सदनों का सदस्य बनना मेरा सपना था”
बैठक में नीतीश कुमार ने अपने इस ऐतिहासिक फैसले के पीछे की सबसे बड़ी वजह बताई। उन्होंने कहा कि उनके राजनीतिक जीवन की एक बड़ी साध अधूरी थी, जिसे वे अब पूरा कर रहे हैं।
नीतीश कुमार ने बताया कि वे:
- विधानसभा (MLA) रह चुके हैं।
- लोकसभा (MP) के सदस्य रह चुके हैं।
- विधान परिषद (MLC) के सदस्य वर्तमान में हैं।
- राज्यसभा (RS MP) ही एकमात्र ऐसा सदन था, जिसके वे सदस्य नहीं बन सके थे।
उन्होंने साफ किया कि यह पूरी तरह से उनका ‘व्यक्तिगत निर्णय’ था और वे अपने रिकॉर्ड में चारों सदनों की सदस्यता को जोड़ना चाहते थे।
बिहार का काम नहीं रुकेगा, मैं नजर रखूँगा
राज्यसभा नामांकन के बाद जेडीयू कार्यकर्ताओं में यह डर था कि नीतीश कुमार के हटने के बाद पार्टी और बिहार की योजनाओं का क्या होगा। इस पर मुख्यमंत्री ने कहा:
- सतत नेतृत्व: “हमारा नेतृत्व आपको मिलता रहेगा, कोई काम नहीं रुकेगा।”
- सुझाव और सलाह: वे एनडीए की नई सरकार को लगातार अपने सुझाव और नेतृत्व देते रहेंगे।
- समय का बंटवारा: उन्होंने स्पष्ट किया कि वे बिहार में पर्याप्त समय देंगे ताकि ‘विकसित बिहार’ का संकल्प अधूरा न रहे।
भावुक हुए कार्यकर्ता, नीतीश ने बढ़ाया हौसला
बैठक शुरू होने से पहले जेडीयू के कई विधायकों और सांसदों ने मुख्यमंत्री से अपील की थी कि वे उन्हें अपने नेतृत्व से वंचित न करें। कार्यकर्ताओं में इस बात को लेकर मायूसी थी कि उनके नेता अब सीधे तौर पर पटना में मौजूद नहीं रहेंगे। नीतीश कुमार ने हर एक नेता की बात सुनी और सबको आश्वस्त किया कि बिहार की नई प्रशासनिक और राजनीतिक व्यवस्था में भी उनकी भूमिका ‘निर्णायक’ बनी रहेगी।
VOB का नजरिया: ‘रिमोट कंट्रोल’ की राजनीति या सन्यास की ओर कदम?
नीतीश कुमार का यह बयान कि वे “कहीं नहीं जा रहे”, असल में जेडीयू को बिखरने से बचाने की एक कवायद है। राज्यसभा जाना उनकी निजी महत्वाकांक्षा हो सकती है, लेकिन बिहार की कमान छोड़ना उनके लिए भी आसान नहीं है। नीतीश जानते हैं कि उनके हटते ही जेडीयू के भीतर ‘उत्तराधिकार’ की जंग तेज हो सकती है, इसलिए उन्होंने ‘दिल्ली में शरीर और पटना में नजर’ वाला फॉर्मूला अपनाया है। अब देखना यह है कि नई सरकार में बीजेपी और जेडीयू का तालमेल बिना ‘फुलटाइम मुख्यमंत्री नीतीश’ के कैसा रहता है।


