
नई दिल्ली: केंद्रीय शिक्षा मंत्री पद से धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के बाद उनके पूरे कार्यकाल को लेकर चर्चा तेज हो गई है। करीब साढ़े पांच वर्षों तक शिक्षा मंत्रालय की कमान संभालने वाले धर्मेंद्र प्रधान ने नई शिक्षा नीति (NEP 2020) के क्रियान्वयन, डिजिटल शिक्षा, कौशल विकास और उच्च शिक्षा में कई बड़े सुधारों को आगे बढ़ाया। हालांकि उनके कार्यकाल के अंतिम दौर में NEET परीक्षा से जुड़े विवाद, NTA की कार्यप्रणाली, UGC के नियम, NCERT की पुस्तकों में बदलाव और केंद्र-राज्य टकराव जैसे कई मुद्दों ने सरकार को लगातार घेरा।
NEET और NTA विवाद बना सबसे बड़ी चुनौती
धर्मेंद्र प्रधान के कार्यकाल की सबसे बड़ी चुनौती मेडिकल प्रवेश परीक्षा NEET-UG से जुड़े विवाद रहे। परीक्षा प्रक्रिया की पारदर्शिता पर सवाल उठने के बाद देशभर में छात्रों और अभिभावकों के बीच असंतोष बढ़ा। परीक्षा संचालन और सुरक्षा व्यवस्था को लेकर नेशनल टेस्टिंग एजेंसी (NTA) भी लगातार सवालों के घेरे में रही।
इसी दौरान UGC-NET परीक्षा को भी रद्द करना पड़ा, जिसके बाद परीक्षा प्रणाली की विश्वसनीयता पर व्यापक बहस छिड़ गई। लगातार सामने आई तकनीकी और प्रशासनिक चुनौतियों ने शिक्षा मंत्रालय पर दबाव बढ़ाया।
NCERT और नई शिक्षा नीति पर भी मचा विवाद
धर्मेंद्र प्रधान के कार्यकाल में NCERT की पुस्तकों में किए गए बदलावों को लेकर भी राजनीतिक और शैक्षणिक विवाद सामने आए। सरकार ने इसे पाठ्यक्रम को सरल बनाने और छात्रों पर बोझ कम करने की पहल बताया, जबकि विपक्ष और कई शिक्षाविदों ने इतिहास और राजनीति से जुड़े कुछ अध्याय हटाने पर सवाल उठाए।
वहीं राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP 2020) के तहत तीन-भाषा फॉर्मूले को लेकर भी कई राज्यों, विशेषकर दक्षिण भारत में, असहमति देखने को मिली। भाषा नीति को लेकर केंद्र और कुछ राज्य सरकारों के बीच लंबे समय तक मतभेद बने रहे।
विश्वविद्यालयों की नियुक्तियों पर भी उठे सवाल
उच्च शिक्षा के क्षेत्र में UGC के नए मसौदा नियमों, कुलपतियों की नियुक्ति प्रक्रिया और विश्वविद्यालय प्रशासन में प्रस्तावित बदलावों को लेकर भी व्यापक चर्चा हुई। कई राज्यों और शिक्षाविदों ने इन प्रस्तावों पर आपत्ति दर्ज कराई।
इसके अलावा PM SHRI स्कूल योजना, CBSE की ऑन-स्क्रीन मूल्यांकन प्रणाली और डिजिटल परीक्षा सुधारों को लेकर भी समय-समय पर बहस होती रही।
सुधारों और विवादों दोनों के लिए याद रहेगा कार्यकाल
धर्मेंद्र प्रधान के कार्यकाल में एक ओर नई शिक्षा नीति को लागू करने, डिजिटल शिक्षा को बढ़ावा देने और कौशल विकास पर जोर जैसे कई महत्वपूर्ण कदम उठाए गए, वहीं दूसरी ओर प्रतियोगी परीक्षाओं की विश्वसनीयता, परीक्षा प्रबंधन, पाठ्यक्रम में बदलाव और शिक्षा प्रशासन से जुड़े विवाद लगातार सुर्खियों में रहे।
इन्हीं उपलब्धियों और चुनौतियों के बीच उनका कार्यकाल भारतीय शिक्षा व्यवस्था के हालिया इतिहास के सबसे चर्चित दौरों में से एक माना जा रहा है।


