
मध्य प्रदेश हाई कोर्ट की इंदौर खंडपीठ ने धार स्थित ऐतिहासिक और विवादित भोजशाला परिसर को लेकर शुक्रवार को एक युगांतकारी निर्णय सुनाया है। जस्टिस विजय कुमार शुक्ला और जस्टिस आलोक अवस्थी की डिवीजन बेंच ने विभिन्न पक्षों की याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए स्पष्ट शब्दों में घोषणा की है कि यह पूरा परिसर वाग्देवी मां सरस्वती का मंदिर है। अदालत ने भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) द्वारा वर्ष 2003 में जारी किए गए उस विवादित आदेश को पूरी तरह से रद्द कर दिया है, जिसके तहत परिसर में हिंदुओं को केवल मंगलवार को पूजा और मुस्लिम समुदाय को शुक्रवार को नमाज अदा करने की अनुमति दी गई थी। हाई कोर्ट ने हिंदुओं को परिसर में नियमित पूजा-अर्चना करने का पूर्ण अधिकार प्रदान किया है। इस आदेश के साथ ही पिछले कई दशकों से चले आ रहे इस धार्मिक और पुरातात्विक विवाद में एक बड़ा कानूनी मोड़ आ गया है, जिसने देश के राजनीतिक और सामाजिक क्षितिज पर नई बहस छेड़ दी है।
** can एएसआई के वैज्ञानिक सर्वे और पुरातात्विक साक्ष्यों पर अदालत का भरोसा**
हाई कोर्ट ने अपने फैसले को पूरी तरह से वैज्ञानिक और ऐतिहासिक प्रमाणों पर आधारित रखा है। बेंच ने कहा कि पुरातत्व एक विज्ञान है और इसके द्वारा किए गए वैज्ञानिक अध्ययनों और निष्कर्षों पर अदालत पूरी तरह भरोसा कर सकती है। वर्ष 2024 में हाई कोर्ट के ही आदेश पर भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ने भोजशाला परिसर का आधुनिक तकनीकों, जैसे ग्राउंड पेनिट्रेटिंग रडार (जीपीआर) और वैज्ञानिक उत्खनन के माध्यम से 98 दिनों तक सघन सर्वे किया था। एएसआई ने अदालत के समक्ष 2,000 से अधिक पन्नों की एक विस्तृत रिपोर्ट प्रस्तुत की थी, जिसे फैसले का मुख्य आधार बनाया गया है।
एएसआई की इस रिपोर्ट में साफ तौर पर यह उल्लेख किया गया था कि वर्तमान विवादित ढांचे के निर्माण से पहले वहां धार के परमार राजाओं के काल की एक विशाल संरचना मौजूद थी। रिपोर्ट के अनुसार, बाद के काल में मंदिर के मूल स्तंभों, पत्थरों और नक्काशीदार घटकों को हटाकर या उनके स्वरूप को बदलकर इस ढांचे का निर्माण किया गया था। हिंदू पक्ष ने सर्वे के दौरान मिले प्राचीन सिक्कों, देवी-देवताओं की खंडित मूर्तियों और दीवारों पर उत्कीर्ण संस्कृत व प्राकृत भाषा के शिलालेखों को अदालत के सामने मजबूत साक्ष्य के रूप में रखा था। कोर्ट ने माना कि ऐतिहासिक साहित्य और भौतिक साक्ष्य यह साबित करने के लिए पर्याप्त हैं कि यह स्थान राजा भोज से संबद्ध संस्कृत शिक्षा का एक बड़ा केंद्र और वाग्देवी का मंदिर था।
2003 की पुरानी व्यवस्था खत्म, मुस्लिम पक्ष के लिए वैकल्पिक भूमि का निर्देश
इस ऐतिहासिक फैसले के जरिए अदालत ने 23 साल पुरानी उस प्रशासनिक व्यवस्था को पूरी तरह से पलट दिया है, जो क्षेत्र में शांति बनाए रखने के नाम पर लागू की गई थी। वर्ष 2003 में एएसआई ने एक परिपत्र जारी कर भोजशाला परिसर में दोनों समुदायों के लिए दिन तय कर दिए थे। इसके तहत हिंदू समुदाय को केवल मंगलवार को और वसंत पंचमी के दिन पूजा करने की सीमित अनुमति थी, जबकि मुस्लिम समुदाय को शुक्रवार को जुमे की नमाज अदा करने का अधिकार मिला हुआ था। बाकी दिनों में यह परिसर आम पर्यटकों के लिए खुला रहता था। हाई कोर्ट ने इस व्यवस्था को पूरी तरह से अनुचित मानते हुए निरस्त कर दिया है और कहा है कि किसी ऐतिहासिक मंदिर के मूल धार्मिक स्वरूप को इस तरह विभाजित नहीं किया जा सकता।
अदालत ने जहां एक तरफ हिंदुओं के पूजा के अधिकार को बहाल किया है, वहीं दूसरी तरफ सामाजिक संतुलन और मुस्लिम समुदाय के धार्मिक अधिकारों को सुरक्षित रखने के लिए राज्य सरकार को एक महत्वपूर्ण निर्देश भी दिया है। कोर्ट ने कहा है कि यदि मुस्लिम समुदाय या मस्जिद कमेटी की ओर से धार जिले के भीतर किसी उपयुक्त स्थान पर नई मस्जिद के निर्माण या भूमि आवंटन के लिए राज्य सरकार के समक्ष आवेदन किया जाता है, तो सरकार कानून के दायरे में रहते हुए उस आवेदन पर सकारात्मक रूप से विचार कर सकती है। इसके साथ ही, एएसआई और केंद्र सरकार को निर्देश दिया गया है कि वे भोजशाला परिसर के भीतर संस्कृत शिक्षा और मंदिर के समग्र प्रबंधन व प्रशासन के लिए एक स्थाई कार्ययोजना तैयार करें। पूरे परिसर का प्रशासनिक नियंत्रण एएसआई के पास ही सुरक्षित रहेगा।
लंदन से वाग्देवी की मूल प्रतिमा वापस लाने का सुझाव
इस फैसले का एक और सबसे महत्वपूर्ण और भावुक पहलू राजा भोज द्वारा स्थापित मां सरस्वती (वाग्देवी) की मूल प्रतिमा से जुड़ा हुआ है। इतिहास के पन्नों के अनुसार, वर्ष 1875 में ब्रिटिश शासन के दौरान अंग्रेज अधिकारियों ने भोजशाला परिसर से मां सरस्वती की ऐतिहासिक और बेशकीमती संगमरमर की मूर्ति को हटा दिया था और उसे अपने साथ लंदन ले गए थे। वर्तमान में यह अनूठी प्रतिमा लंदन के ब्रिटिश म्यूजियम की शोभा बढ़ा रही है। हिंदू संगठन लंबे समय से इस प्रतिमा को वापस भारत लाने और उसे भोजशाला में पुनर्स्थापित करने की मांग करते रहे हैं।
इंदौर हाई कोर्ट ने इस जनभावना और ऐतिहासिक जुड़ाव का संज्ञान लेते हुए केंद्र सरकार को एक कूटनीतिक सुझाव दिया है। अदालत ने कहा कि चूंकि अब यह कानूनी रूप से प्रमाणित हो चुका है कि यह परिसर वाग्देवी का मंदिर है, इसलिए केंद्र सरकार को इंग्लैंड की सरकार और ब्रिटिश म्यूजियम प्रशासन से संपर्क कर इस ऐतिहासिक प्रतिमा को वापस भारत लाने के लिए आवश्यक राजनयिक और कानूनी प्रयास तेज करने चाहिए। कोर्ट ने कहा कि सरकार इन अनुरोधों पर विचार कर प्रतिमा की ससम्मान वापसी का मार्ग प्रशस्त कर सकती है, जिससे इस ऐतिहासिक धरोहर का गौरव पूरी तरह से बहाल हो सके।
तीनों पक्षों के दावों का वैधानिक संतुलन और मुस्लिम पक्ष का रुख
धार भोजशाला का यह मामला त्रिकोणीय कानूनी लड़ाई का केंद्र बना हुआ था, जिसमें हिंदू, मुस्लिम और जैन समुदायों की ओर से अलग-अलग दावे पेश किए गए थे। अदालत ने संतुलन बनाए रखने के लिए सभी पक्षों की दलीलों को विस्तार से सुना:
- हिंदू पक्ष (हिंदू फ्रंट फॉर जस्टिस): इनका मुख्य दावा था कि यह स्थान पूरी तरह से एक प्राचीन मंदिर है, जिसे मुगल आक्रांताओं के काल में क्षतिग्रस्त किया गया था। यहां मुसलमानों को नमाज पढ़ने का कोई ऐतिहासिक अधिकार नहीं है।
- मुस्लिम पक्ष (कमाल मौला मस्जिद कमेटी): मुस्लिम पक्ष की वरिष्ठ अधिवक्ता शोभा मेनन ने अदालत में दलील दी थी कि वर्ष 1935 में तत्कालीन धार रियासत की अदालत ने एक ‘ऐलान’ के जरिए इस विवादित परिसर को आधिकारिक तौर पर ‘मस्जिद’ घोषित किया था और वहां नमाज जारी रखने की व्यवस्था दी थी। उन्होंने एएसआई की सर्वे रिपोर्ट को पूर्वाग्रह से ग्रसित और एकतरफा बताते हुए खारिज करने की मांग की थी, हालांकि एएसआई ने कोर्ट को बताया कि इस सर्वे टीम में तीन मुस्लिम विशेषज्ञ भी शामिल थे।
- जैन पक्ष: इस मामले में एक तीसरे पक्ष के रूप में जैन समुदाय के एक याचिकाकर्ता ने भी हस्तक्षेप किया था। उनका दावा था कि यह विवादित परिसर मध्यकाल में एक जैन मंदिर और गुरुकुल के रूप में संचालित होता था, इसलिए पुरातात्विक साक्ष्यों की जांच में जैन धर्म से जुड़े प्रतीकों को भी ध्यान में रखा जाना चाहिए।
हाई कोर्ट के इस फैसले के बाद मुस्लिम पक्ष ने असंतोष व्यक्त किया है और इस आदेश के खिलाफ देश की सर्वोच्च अदालत (सुप्रीम कोर्ट) का दरवाजा खटखटाने की घोषणा की है। हैदराबाद के सांसद असदुद्दीन ओवैसी ने भी इस फैसले पर अपनी प्रतिक्रिया देते हुए उम्मीद जताई है कि सुप्रीम कोर्ट इस मामले की गहराई से समीक्षा करेगा और हाई कोर्ट के इस आदेश को रद्द कर न्याय सुनिश्चित करेगा। मस्जिद कमेटी के नेताओं का कहना है कि वे कानूनी विशेषज्ञों से सलाह मशविरा कर जल्द ही विशेष अनुमति याचिका (SLP) दायर करेंगे।
धार जिले और कोर्ट परिसर के बाहर सुरक्षा के कड़े इंतजाम
हाई कोर्ट द्वारा फैसला सुनाए जाने की तिथि निर्धारित होने के बाद से ही मध्य प्रदेश का गृह विभाग और धार जिला प्रशासन पूरी तरह से सतर्क था। शुक्रवार की सुबह जैसे ही कोर्ट की कार्यवाही शुरू हुई, धार शहर और इंदौर हाई कोर्ट परिसर के बाहर सुरक्षा का एक अभूतपूर्व चक्रव्यूह तैयार कर दिया गया था। किसी भी संभावित विरोध प्रदर्शन या सांप्रदायिक tension को रोकने के लिए रैपिड एक्शन फोर्स (आरएएफ) और मध्य प्रदेश पुलिस की अतिरिक्त कंपनियों को संवेदनशील इलाकों में तैनात किया गया था।
धार के जिला मजिस्ट्रेट और पुलिस अधीक्षक खुद स्थिति की मॉनिटरिंग कर रहे हैं। भोजशाला परिसर के आसपास के एक किलोमीटर के दायरे में बैरिकेडिंग कर दी गई है और आम लोगों की आवाजाही पर कड़ी निगरानी रखी जा रही है। सोशल मीडिया पर किसी भी प्रकार की भड़काऊ पोस्ट या अफवाहों को फैलने से रोकने के लिए साइबर सेल को एक्टिव मोड पर रखा गया है। स्थानीय प्रशासन ने दोनों ही समुदायों के धर्मगुरुओं और प्रबुद्ध नागरिकों के साथ बैठकें की हैं और उनसे शांति व आपसी सौहार्द बनाए रखने की अपील की है। फिलहाल पूरे क्षेत्र में स्थिति पूरी तरह से नियंत्रण में है और कानून-व्यवस्था लागू है।


