दिल्ली विधानसभा के बाहर लोकतंत्र सेनानियों का सांकेतिक उपवास, 10 हजार से अधिक हस्ताक्षरों वाला ज्ञापन सरकार को सौंपा

नई दिल्ली। आपातकाल की स्वर्ण जयंती वर्ष के अवसर पर लोकतंत्र सेनानी संघ (दिल्ली प्रदेश) की ओर से शुक्रवार को दिल्ली विधानसभा के समक्ष सांकेतिक उपवास और जन-जागरण कार्यक्रम आयोजित किया गया। इस कार्यक्रम में दिल्ली और हरियाणा से आए लोकतंत्र सेनानियों के साथ बड़ी संख्या में नागरिकों ने भाग लिया। आयोजन का मुख्य उद्देश्य आपातकाल के दौरान लोकतंत्र की रक्षा के लिए संघर्ष करने वाले लोगों के योगदान को नई पीढ़ी तक पहुंचाना, लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रति जागरूकता बढ़ाना तथा लोकतंत्र सेनानियों से जुड़ी विभिन्न मांगों को सरकार तक पहुंचाना था।

कार्यक्रम के दौरान लोकतंत्र सेनानी संघ के प्रतिनिधिमंडल ने 10,000 से अधिक नागरिकों के हस्ताक्षरों से समर्थित ज्ञापन दिल्ली के मुख्यमंत्री और विधानसभा अध्यक्ष को सौंपा। ज्ञापन में आपातकाल के इतिहास को शैक्षणिक पाठ्यक्रम में शामिल करने, लोकतंत्र सेनानियों के योगदान के संरक्षण और राष्ट्रीय राजधानी में लोकतंत्र सेनानी स्मारक एवं शोध केंद्र स्थापित करने सहित कई महत्वपूर्ण मांगें उठाई गईं।

बड़ी संख्या में जुटे लोकतंत्र सेनानी और नागरिक

दिल्ली विधानसभा के समक्ष आयोजित कार्यक्रम में दिल्ली प्रदेश के 74 लोकतंत्र सेनानियों ने भाग लिया। इसके अलावा हरियाणा से भी लोकतंत्र सेनानियों का एक प्रतिनिधिमंडल कार्यक्रम में शामिल हुआ। आयोजन स्थल पर बड़ी संख्या में सामाजिक कार्यकर्ता, शिक्षाविद, युवा और आम नागरिक भी उपस्थित रहे।

कार्यक्रम का माहौल पूरी तरह लोकतांत्रिक मूल्यों और ऐतिहासिक स्मृतियों को समर्पित रहा। प्रतिभागियों ने लोकतंत्र, संविधान और नागरिक अधिकारों के संरक्षण को लेकर अपने विचार व्यक्त किए तथा आपातकाल के दौर को याद करते हुए उस समय हुए संघर्षों का उल्लेख किया।

मुख्य वक्ता के रूप में शामिल हुए अश्विनी कुमार चौबे

कार्यक्रम में लोकतंत्र सेनानी संघ के राष्ट्रीय सह-संरक्षक और पूर्व केंद्रीय मंत्री अश्विनी कुमार चौबे मुख्य वक्ता के रूप में उपस्थित रहे। उनके साथ संघ के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष ओ. पी. बब्बर, वरिष्ठ लोकतंत्र सेनानी राजन धींगरा और राजकुमार सपरा सहित कई वरिष्ठ पदाधिकारी मौजूद रहे।

अपने संबोधन में अश्विनी कुमार चौबे ने कहा कि 5 जून भारतीय लोकतांत्रिक इतिहास की एक महत्वपूर्ण तिथि है। उन्होंने बताया कि इसी दिन वर्ष 1974 में लोकनायक जयप्रकाश नारायण ने पटना के गांधी मैदान से “संपूर्ण क्रांति” का आह्वान किया था।

उन्होंने कहा कि यह आंदोलन केवल राजनीतिक सत्ता परिवर्तन तक सीमित नहीं था, बल्कि इसका उद्देश्य समाज, प्रशासन, शिक्षा, राजनीति और सार्वजनिक जीवन में नैतिकता, पारदर्शिता और जवाबदेही स्थापित करना था।

संपूर्ण क्रांति आंदोलन को बताया ऐतिहासिक मोड़

अश्विनी कुमार चौबे ने कहा कि संपूर्ण क्रांति आंदोलन ने देशभर में लोकतांत्रिक चेतना को नई दिशा दी। इस आंदोलन ने नागरिकों को व्यवस्था परिवर्तन और लोकतांत्रिक अधिकारों के प्रति जागरूक किया।

उन्होंने कहा कि यह आंदोलन आगे चलकर आपातकाल के दौरान लोकतंत्र की रक्षा के लिए हुए संघर्षों की आधारभूमि बना। इसी जनचेतना ने नागरिकों को लोकतांत्रिक अधिकारों के संरक्षण के लिए संगठित किया और देश के राजनीतिक इतिहास में एक नया अध्याय लिखा।

चौबे ने कहा कि लोकतंत्र केवल चुनावों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह नागरिक अधिकारों, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और जवाबदेह शासन व्यवस्था से जुड़ा व्यापक विचार है।

आपातकाल को बताया लोकतांत्रिक इतिहास का महत्वपूर्ण अध्याय

अपने संबोधन के दौरान उन्होंने आपातकाल के दौर का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि उस समय नागरिक स्वतंत्रताओं पर प्रतिबंध लगाए गए, प्रेस की स्वतंत्रता प्रभावित हुई और बड़ी संख्या में लोकतंत्र समर्थक नागरिकों को जेलों में बंद किया गया।

उन्होंने कहा कि उस दौर में हजारों लोगों ने लोकतंत्र की रक्षा के लिए संघर्ष किया और कठिन परिस्थितियों का सामना किया। उनके त्याग और साहस को आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाना आवश्यक है।

उन्होंने यह भी कहा कि लोकतंत्र सेनानियों के योगदान को राष्ट्रीय स्मृति का हिस्सा बनाया जाना चाहिए ताकि भविष्य की पीढ़ियां लोकतांत्रिक मूल्यों के महत्व को समझ सकें।

लोकतंत्र और संविधान के प्रति जागरूकता पर जोर

कार्यक्रम को संबोधित करते हुए ओ. पी. बब्बर, राजन धींगरा और राजकुमार सपरा ने भी लोकतंत्र की रक्षा के लिए किए गए संघर्षों का उल्लेख किया।

उन्होंने कहा कि लोकतंत्र सेनानी संघ का उद्देश्य किसी राजनीतिक दल का समर्थन या विरोध करना नहीं है। संगठन का मुख्य उद्देश्य संविधान, लोकतांत्रिक संस्थाओं और नागरिक स्वतंत्रताओं के प्रति जागरूकता को मजबूत करना है।

वक्ताओं ने कहा कि लोकतंत्र की मजबूती तभी संभव है जब नागरिक अपने अधिकारों और कर्तव्यों दोनों के प्रति जागरूक हों। इसलिए जन-जागरण कार्यक्रमों की आवश्यकता पहले से अधिक बढ़ गई है।

10 हजार से अधिक हस्ताक्षरों वाला ज्ञापन सौंपा

कार्यक्रम के बाद लोकतंत्र सेनानी संघ के प्रतिनिधिमंडल ने दिल्ली विधानसभा अध्यक्ष और मुख्यमंत्री को ज्ञापन सौंपा। इस ज्ञापन को दिल्ली के विभिन्न सामाजिक, शैक्षणिक, सांस्कृतिक, व्यावसायिक और नागरिक संगठनों के साथ-साथ जागरूक नागरिकों का समर्थन प्राप्त था।

संघ के अनुसार ज्ञापन पर 10,000 से अधिक लोगों के हस्ताक्षर हैं, जो इन मांगों के प्रति जनसमर्थन को दर्शाते हैं।

मुख्यमंत्री की व्यस्तता के कारण उनका निजी सचिव ज्ञापन प्राप्त करने के लिए उपस्थित रहा। प्रतिनिधिमंडल को आश्वस्त किया गया कि जल्द ही मुख्यमंत्री से मुलाकात का समय निर्धारित कर इसकी सूचना दी जाएगी।

विधानसभा अध्यक्ष ने भी दिया सकारात्मक संकेत

लोकतंत्र सेनानी संघ के प्रतिनिधियों ने दिल्ली विधानसभा अध्यक्ष से भी मुलाकात की। अध्यक्ष की ओर से प्रतिनिधिमंडल को आश्वासन दिया गया कि वे लोकतंत्र सेनानियों से विस्तृत चर्चा करना चाहते हैं और इसके लिए शीघ्र ही समय निर्धारित किया जाएगा।

संघ के पदाधिकारियों ने कहा कि यह सकारात्मक पहल है और उन्हें उम्मीद है कि उनकी मांगों पर गंभीरतापूर्वक विचार किया जाएगा।

ज्ञापन में रखी गईं कई महत्वपूर्ण मांगें

लोकतंत्र सेनानी संघ द्वारा सौंपे गए ज्ञापन में कई प्रमुख मांगें शामिल थीं। इनमें सबसे महत्वपूर्ण मांग कक्षा 8 से 12 तक के पाठ्यक्रम में आपातकाल (1975-77) के इतिहास को अनिवार्य रूप से शामिल करने की थी।

इसके अलावा “संविधान हत्या दिवस” की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और आपातकाल के प्रभावों के अध्ययन के लिए उच्चस्तरीय तथ्यान्वेषण आयोग के गठन की मांग भी की गई।

संघ ने लोकतंत्र सेनानियों के संस्मरणों, दस्तावेजों और ऐतिहासिक अभिलेखों के व्यवस्थित प्रलेखन की आवश्यकता पर भी जोर दिया ताकि लोकतांत्रिक संघर्षों का इतिहास सुरक्षित रखा जा सके।

दिल्ली में स्मारक और शोध केंद्र बनाने की मांग

ज्ञापन में राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में लोकतंत्र सेनानी स्मारक, संग्रहालय और अध्ययन-शोध केंद्र स्थापित करने की मांग भी प्रमुख रूप से उठाई गई।

संघ का मानना है कि ऐसा केंद्र न केवल लोकतंत्र सेनानियों के योगदान को सम्मान देगा, बल्कि शोधकर्ताओं, विद्यार्थियों और आम नागरिकों को लोकतांत्रिक इतिहास को समझने का अवसर भी प्रदान करेगा।

इसके साथ ही हर वर्ष 25 जून को जन-जागरण कार्यक्रम आयोजित करने की भी मांग रखी गई, ताकि आपातकाल और लोकतंत्र से जुड़े ऐतिहासिक तथ्यों को लोगों तक पहुंचाया जा सके।

मांगें नहीं मानी गईं तो चरणबद्ध आंदोलन की चेतावनी

कार्यक्रम के अंत में लोकतंत्र सेनानियों ने सर्वसम्मति से एक महत्वपूर्ण निर्णय लिया। उन्होंने कहा कि यदि उनकी मांगों पर सकारात्मक विचार नहीं किया गया, तो आगामी दिल्ली विधानसभा सत्र के दौरान चरणबद्ध आंदोलन शुरू किया जाएगा।

निर्णय के अनुसार विधानसभा का सत्र जितने दिनों तक चलेगा, उतने दिनों तक लोकतंत्र सेनानी विधानसभा के बाहर शांतिपूर्ण और लोकतांत्रिक तरीके से उपवास एवं जन-जागरण कार्यक्रम आयोजित करेंगे।

संघ ने स्पष्ट किया कि उनका आंदोलन पूरी तरह शांतिपूर्ण, संवैधानिक और लोकतांत्रिक तरीके से संचालित होगा।

लोकतांत्रिक मूल्यों को संरक्षित करने का आह्वान

कार्यक्रम के समापन पर लोकतंत्र सेनानी संघ ने कहा कि उनका अभियान लोकतंत्र, संविधान, नागरिक स्वतंत्रताओं और लोकतंत्र सेनानियों के योगदान के प्रति राष्ट्रीय कृतज्ञता की भावना से प्रेरित है।

संघ के पदाधिकारियों ने विश्वास जताया कि सरकार और संबंधित संस्थाएं जनभावनाओं का सम्मान करते हुए इन मांगों पर गंभीरतापूर्वक विचार करेंगी। उन्होंने नागरिकों से भी लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा और संविधान के प्रति जागरूकता बढ़ाने में सक्रिय भूमिका निभाने की अपील की।

नई दिल्ली में आयोजित यह कार्यक्रम केवल एक सांकेतिक उपवास तक सीमित नहीं रहा, बल्कि लोकतांत्रिक इतिहास, नागरिक अधिकारों और लोकतंत्र सेनानियों के योगदान को नई पीढ़ी तक पहुंचाने के व्यापक प्रयास के रूप में सामने आया।

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