
- बिहार की ज्ञानस्थली गया में कानून व्यवस्था को ठेंगा दिखाते हुए एक वार्ड पार्षद ने वर्दी की गरिमा को तार-तार कर दिया है, जहाँ गश्ती पर निकले पुलिस अधिकारियों के साथ सरेआम मारपीट की गई।
- रामपुर थाना क्षेत्र के गेवाल बीघा मोड़ पर हुई इस हिंसक झड़प में एएसआई विक्रम पासवान का हाथ टूट गया है और उनके शरीर पर कई गंभीर चोटें आई हैं, जिसके बाद उन्हें मगध मेडिकल कॉलेज में भर्ती कराया गया है।
- विवाद की जड़ एक ऐसी दुकान बनी जो सरकारी नोटिस के बावजूद देर रात 3 बजे तक खुलती थी और जहाँ असामाजिक तत्वों का जमावड़ा लगने से स्थानीय शांति भंग हो रही थी।
- पुलिस ने त्वरित कार्रवाई करते हुए हमले में शामिल दो उपद्रवी युवकों को गिरफ्तार कर लिया है, जबकि मुख्य आरोपी वार्ड पार्षद मोहम्मद कलाम गिरफ्तारी के डर से फरार चल रहा है।
- वरीय अधिकारियों ने इस घटना को पुलिस के इकबाल पर हमला करार दिया है और स्पष्ट किया है कि वर्दी पर हाथ उठाने वालों के खिलाफ ऐसी कार्रवाई होगी जो एक नजीर बनेगी।
गया (द वॉयस ऑफ बिहार)।
खाकी पर हमला और लोकतंत्र का ‘दबंग’ चेहरा: गया में प्रशासनिक मर्यादा का कत्ल
बिहार के गया जिले से एक ऐसी सनसनीखेज वारदात सामने आई है, जिसने शासन और सत्ता के बीच के संतुलन पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। गया के रामपुर थाना क्षेत्र में एक वार्ड पार्षद की दबंगई ने उस समय हिंसक रूप ले लिया जब उसने अपने समर्थकों के साथ मिलकर ड्यूटी पर तैनात एक पुलिस अधिकारी को बेरहमी से पीटा। यह घटना केवल एक मारपीट का मामला नहीं है, बल्कि यह उस मानसिकता का परिचायक है जहाँ जन प्रतिनिधि खुद को कानून से ऊपर समझने लगते हैं। रामपुर के गेवाल बीघा मोड़ पर हुई इस घटना ने पुलिस महकमे में आक्रोश पैदा कर दिया है, क्योंकि हमला किसी अपराधी ने नहीं बल्कि कानून की रक्षा की शपथ लेने वाले एक पार्षद और उसके गुर्गों ने किया है।
विवाद की जड़: आधी रात का जमावड़ा और अवैध रूप से खुली दुकान
घटना के पीछे का घटनाक्रम पिछले कई महीनों से सुलग रहा था। गेवाल बीघा मोड़ पर मेराज आलम की एक दुकान स्थित है, जो नियमों को ताक पर रखकर प्रतिदिन सुबह के 3 बजे तक खुली रहती थी। पुलिस के पास बार-बार शिकायतें पहुँच रही थीं कि इस दुकान पर देर रात को दूर-दूर से असामाजिक तत्वों का जमावड़ा लगता है। रात के अंधेरे में जुटने वाली यह भीड़ अक्सर शराबखोरी और मारपीट जैसी घटनाओं का कारण बनती थी। स्थानीय शांति बनाए रखने के लिए रामपुर थाना अध्यक्ष ने दुकानदार को कई बार चेतावनी दी थी। आधिकारिक रिकॉर्ड के अनुसार, पिछले साल 31 अक्टूबर 2025 को भी दुकानदार को औपचारिक नोटिस तामील कराया गया था कि वह देर रात दुकान न खोले, लेकिन सत्ता के संरक्षण और रसूख के कारण दुकानदार ने इन आदेशों को रद्दी की टोकरी में डाल दिया।
एएसआई विक्रम पासवान पर हमला: जब गश्ती दल को घेरा गया
सोमवार-मंगलवार की दरमियानी रात जब एएसआई विक्रम पासवान अपने पुलिस बल के साथ नियमित गश्ती पर निकले थे, तो उन्होंने देखा कि गेवाल बीघा मोड़ पर मेराज आलम की दुकान पर अभी भी भारी भीड़ जमा है। उन्होंने नियम के अनुसार दुकान बंद करने और जमा भीड़ को वहां से हटने का निर्देश दिया। इसी बीच वहां वार्ड पार्षद मोहम्मद कलाम अपने सहयोगियों के साथ पहुँच गया। पुलिस का आरोप है कि पार्षद ने पुलिस के काम में हस्तक्षेप करना शुरू किया और जब एएसआई ने उन्हें कानून का हवाला दिया, तो कलाम और उसके साथी आक्रोशित हो उठे। देखते ही देखते बात धक्का-मुक्की से शुरू होकर हिंसक हमले में बदल गई।
बेरहमी की इंतिहा: भीड़ ने किया पुलिस को लहूलुहान
प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, मोहम्मद कलाम और उसके साथ मौजूद युवाओं ने एएसआई विक्रम पासवान को चारों तरफ से घेर लिया। पुलिस बल के अन्य जवान जब बचाव के लिए आगे आए, तो उन पर भी हमला किया गया। उपद्रवियों ने एएसआई को जमीन पर पटक कर उनकी पिटाई की, जिससे उनका हाथ टूट गया। पुलिस की वर्दी फाड़ दी गई और गश्ती दल को जान बचाकर वहां से निकलना पड़ा। एएसआई विक्रम पासवान के शरीर पर गहरे जख्म के निशान हैं और उनकी स्थिति को देखते हुए उन्हें तत्काल अनुग्रह नारायण मगध मेडिकल कॉलेज अस्पताल के इमरजेंसी वार्ड में भर्ती कराया गया, जहाँ विशेषज्ञ डॉक्टरों की टीम उनकी देखरेख कर रही है।
पुलिस की कार्रवाई: दो गिरफ्तार, मुख्य आरोपी पार्षद फरार
घटना की सूचना मिलते ही रामपुर थाना पुलिस और वरीय अधिकारी सक्रिय हो गए। अस्पताल पहुँचकर घायल एएसआई का फर्द बयान दर्ज किया गया, जिसके आधार पर वार्ड पार्षद मोहम्मद कलाम, दुकानदार मेराज आलम और अन्य अज्ञात हमलावरों के खिलाफ हत्या के प्रयास, सरकारी कार्य में बाधा डालने और पुलिस पर हमले जैसी गंभीर धाराओं में प्राथमिकी दर्ज की गई है। पुलिस ने रात में ही छापेमारी कर इस हमले में शामिल दो युवकों को गिरफ्तार कर लिया है। हालांकि, मुख्य साजिशकर्ता वार्ड पार्षद मोहम्मद कलाम गिरफ्तारी के डर से भूमिगत हो गया है। पुलिस की विशेष टीमें उसके संभावित ठिकानों पर दबिश दे रही हैं और जिला प्रशासन उसके खिलाफ कुर्की-जब्ती जैसे कड़े कदम उठाने पर भी विचार कर रहा है।
दुकानदार की ढिठाई और प्रशासनिक लापरवाही?
इस पूरे मामले में मेराज आलम नामक दुकानदार की भूमिका भी जांच के घेरे में है। पुलिस का कहना है कि नोटिस देने के बावजूद उसने दुकान बंद क्यों नहीं की? क्या उसे वार्ड पार्षद का खुला संरक्षण प्राप्त था? रामपुर थाना अध्यक्ष ने मीडिया को बताया कि उक्त दुकान पर अपराधियों का गढ़ बनता जा रहा था। रात में रुकने वाले युवक कौन थे और उनका आपराधिक इतिहास क्या है, इसकी भी पड़ताल की जा रही है। पुलिस का मानना है कि दुकानदार और पार्षद के बीच का यह गठजोड़ ही इस हमले की मुख्य वजह बना, क्योंकि पुलिस की सख्ती से उनके गैर-कानूनी कारोबार और जमावड़े पर असर पड़ रहा था।
खाकी का मनोबल और जन प्रतिनिधियों की जवाबदेही
गया की यह घटना बिहार पुलिस के मनोबल पर चोट करने वाली है। जब ऑन-ड्यूटी पुलिस अधिकारी सुरक्षित नहीं हैं, तो आम जनता की सुरक्षा पर भरोसा कैसे कायम होगा? पुलिस एसोसिएशन ने इस घटना की कड़ी निंदा करते हुए मांग की है कि दोषियों को कड़ी सजा मिले ताकि भविष्य में कोई भी वर्दी पर हाथ उठाने की जुर्रत न करे। वहीं, स्थानीय लोगों में भी इस बात को लेकर चर्चा है कि क्या एक वार्ड पार्षद को कानून हाथ में लेने का अधिकार मिल जाता है? जन प्रतिनिधियों का काम समाज में शांति स्थापित करना होता है, न कि पुलिस कर्मियों को लहूलुहान करना।
न्याय की प्रतीक्षा और व्यवस्था का इम्तिहान
विक्रम पासवान आज अस्पताल के बिस्तर पर न्याय की प्रतीक्षा कर रहे हैं। उनका टूटा हुआ हाथ उस प्रशासनिक कमजोरी की गवाही दे रहा है जहाँ स्थानीय ‘दबंग’ व्यवस्था को अपने पैरों तले कुचलने की कोशिश करते हैं। गया पुलिस के लिए यह एक बड़ी चुनौती है कि वह मोहम्मद कलाम को कितनी जल्दी सलाखों के पीछे पहुँचाती है। इस मामले में कोई भी राजनीतिक हस्तक्षेप पुलिस की साख को नुकसान पहुँचाएगा। ‘द वॉयस ऑफ बिहार’ की टीम इस खबर पर निरंतर नजर बनाए हुए है और यह सुनिश्चित करेगी कि घायल एएसआई को न्याय मिले और दोषियों को उनके किए की सजा।


