यूजीसी के नए एंटी-डिस्क्रिमिनेशन नियमों को लेकर देशभर में बढ़ते विरोध के बीच केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने सरकार का रुख स्पष्ट किया है। दिल्ली के विभिन्न कॉलेजों में हो रहे प्रदर्शनों और ‘रिवर्स डिस्क्रिमिनेशन’ के आरोपों पर प्रतिक्रिया देते हुए उन्होंने कहा कि इन नियमों का उद्देश्य किसी को परेशान करना नहीं, बल्कि न्याय सुनिश्चित करना है।
धर्मेंद्र प्रधान ने कहा कि भेदभाव के नाम पर किसी को भी कानून के दुरुपयोग की अनुमति नहीं दी जाएगी। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि पूरी व्यवस्था भारतीय संविधान के दायरे में है और सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में तैयार की गई है, इसलिए किसी को घबराने की आवश्यकता नहीं है।
क्या है यूजीसी का नया नियम
यूजीसी ने 13 जनवरी को ‘प्रमोशन ऑफ इक्विटी इन हायर एजुकेशन इंस्टीट्यूशन रेगुलेशन 2026’ लागू किया है। इसका मकसद उच्च शिक्षण संस्थानों में एससी, एसटी, ओबीसी, महिलाओं और दिव्यांगों के साथ होने वाले भेदभाव को समाप्त करना है।
नियमों के तहत हर कॉलेज और विश्वविद्यालय में 9 सदस्यीय ‘समानता समिति’ (Equity Committee) का गठन अनिवार्य किया गया है। इस समिति में संस्थान प्रमुख, प्रोफेसर और बाहरी नागरिक शामिल होंगे। समिति की कम से कम पांच सीटें आरक्षित वर्गों और महिलाओं के लिए तय की गई हैं, ताकि पीड़ित पक्ष की बात प्रभावी ढंग से सुनी जा सके और समय रहते कार्रवाई हो।
सवर्ण समाज की नाराजगी की वजह
नए नियमों को लेकर सवर्ण समाज और सामान्य वर्ग के छात्रों में गहरी नाराजगी देखी जा रही है। विरोध कर रहे संगठनों का कहना है कि समिति में आरक्षित वर्गों के लिए अनिवार्य सीटें तय की गई हैं, लेकिन सामान्य वर्ग के प्रतिनिधित्व के लिए कोई स्पष्ट प्रावधान नहीं रखा गया है।
आलोचकों का आरोप है कि यह नियम इस धारणा पर आधारित है कि एक वर्ग हमेशा शोषक और दूसरा हमेशा शोषित होता है। उन्हें आशंका है कि संतुलित प्रतिनिधित्व के अभाव में समिति की कार्रवाई एकतरफा हो सकती है और झूठी शिकायतों के जरिए निर्दोष छात्रों या शिक्षकों को फंसाया जा सकता है।
कैंपस में अविश्वास का माहौल
विरोध कर रहे छात्रों का कहना है कि इन नियमों से शिक्षा परिसरों में आपसी सौहार्द के बजाय अविश्वास और तनाव का माहौल बन सकता है। उनका तर्क है कि दुर्भावनापूर्ण शिकायतों से बचाव के लिए नियमों में पर्याप्त सुरक्षा व्यवस्था नहीं है।
वहीं सरकार का कहना है कि ऐतिहासिक रूप से पिछड़े वर्गों को संरक्षण देना जरूरी है और यह नियम उसी दिशा में उठाया गया कदम है। सवर्ण समाज के संगठनों ने साफ कर दिया है कि जब तक उनकी चिंताओं का समाधान नहीं किया जाता, आंदोलन जारी रहेगा। ऐसे में आने वाले दिनों में यह विवाद और गहराने की संभावना है।


