​बिहार में गेहूं खरीद का लक्ष्य 10 गुना बढ़ा: अब 1.80 लाख मीट्रिक टन होगी खरीदारी; किसानों के लिए बड़ी राहत

पटना। बिहार के कृषि क्षेत्र और ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए शनिवार, 25 अप्रैल 2026 की सुबह एक अत्यंत उत्साहजनक खबर लेकर आई है। केंद्र और राज्य सरकार ने एक संयुक्त और दूरगामी निर्णय लेते हुए रबी विपणन मौसम 2026-27 के लिए गेहूं की अधिप्राप्ति (Procurement) के लक्ष्य में भारी बढ़ोतरी कर दी है। बिहार में अब न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) पर गेहूं खरीद का लक्ष्य बढ़ाकर एक लाख 80 हजार मीट्रिक टन कर दिया गया है। यह फैसला इसलिए भी ऐतिहासिक है क्योंकि यह पिछले लक्ष्य (18,000 मीट्रिक टन) की तुलना में सीधे 10 गुना अधिक है। सरकार के इस कदम का सीधा उद्देश्य राज्य के उन लाखों किसानों को बिचौलियों के जाल से बचाना है जो अक्सर अपनी फसल को खुले बाजार में कम कीमतों पर बेचने को मजबूर हो जाते हैं। लक्ष्य में इस भारी विस्तार के साथ ही अब राज्य के गोदामों और पैक्स केंद्रों पर हलचल बढ़ गई है, क्योंकि 15 जून तक चलने वाले इस महाभियान के लिए प्रशासन ने अपनी पूरी ताकत झोंक दी है।

10 गुना बढ़ा लक्ष्य: कृषि आय में वृद्धि का ‘गेमचेंजर’

​बिहार में गेहूं की खेती का रकबा काफी बड़ा है, लेकिन पिछले कुछ वर्षों से सरकारी खरीद के लक्ष्य सीमित होने के कारण किसानों को एमएसपी का पूरा लाभ नहीं मिल पा रहा था। इस वर्ष केंद्र सरकार की ओर से मिली विशेष स्वीकृति के बाद बिहार सरकार ने अपनी अधिप्राप्ति नीति में बड़ा बदलाव किया है। 18 हजार मीट्रिक टन से बढ़ाकर 1.80 लाख मीट्रिक टन का यह नया लक्ष्य न केवल एक संख्या है, बल्कि यह राज्य सरकार की उस प्रतिबद्धता को दर्शाता है जिसमें किसानों की आय को दोगुना करने का संकल्प लिया गया है।

​संशोधित लक्ष्य के अनुसार, खरीद की पूरी प्रक्रिया को दो प्रमुख हिस्सों में विभाजित किया गया है:

  • पैक्स एवं व्यापार मंडल: कुल लक्ष्य में से 1,30,000 मीट्रिक टन गेहूं की खरीद प्राथमिक कृषि साख समितियों (PACS) और प्रखंड स्तरीय व्यापार मंडलों के माध्यम से की जाएगी। यह व्यवस्था इसलिए की गई है ताकि गांव के छोटे से छोटे किसान को लंबी दूरी तय न करनी पड़े।
  • भारतीय खाद्य निगम (FCI): शेष 50,000 मीट्रिक टन गेहूं की खरीद सीधे एफसीआई के केंद्रों के माध्यम से की जाएगी।

​इस विकेंद्रीकृत व्यवस्था से यह सुनिश्चित होगा कि खरीद प्रक्रिया में कोई ‘हॉटस्पॉट’ न बने और किसानों को अपनी बारी के लिए हफ्तों तक इंतजार न करना पड़े।

एमएसपी का गणित: ₹2,585 प्रति क्विंटल की दर से होगा भुगतान

​रबी विपणन मौसम 2026-27 के लिए सरकार ने गेहूं का न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) 2,585 रुपये प्रति क्विंटल निर्धारित किया है। खुले बाजार की कीमतों और उत्पादन लागत के बीच के अंतर को देखते हुए यह मूल्य काफी प्रतिस्पर्धी माना जा रहा है। 1 अप्रैल से शुरू हुई यह खरीद प्रक्रिया आगामी 15 जून 2026 तक निरंतर जारी रहेगी।

​सरकार का प्रयास है कि खरीद के तुरंत बाद किसानों के बैंक खातों में ‘डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर’ (DBT) के माध्यम से भुगतान सुनिश्चित किया जाए। इससे न केवल पारदर्शिता बढ़ेगी, बल्कि किसानों को अपनी अगली फसल (खरीफ) की तैयारी के लिए नकदी की समस्या भी नहीं होगी। खाद्य एवं उपभोक्ता संरक्षण विभाग ने स्पष्ट निर्देश दिए हैं कि खरीद के दौरान गुणवत्ता मानकों (Fair Average Quality) का पूरा ध्यान रखा जाए ताकि बाद में भंडारण के समय कोई समस्या न आए।

प्रशासनिक मुस्तैदी: जिलाधिकारियों को ‘एक्शन मोड’ में रहने के निर्देश

​लक्ष्य में हुई इस अप्रत्याशित वृद्धि के बाद राज्य का प्रशासनिक तंत्र भी ‘अलर्ट’ हो गया है। खाद्य एवं उपभोक्ता संरक्षण विभाग ने कृषि विभाग से मिले जिलावार उत्पादन अनुमानों (District-wise Production Estimate) का बारीकी से विश्लेषण किया है। इसी आधार पर अब पैक्स और व्यापार मंडलों के लिए पुनर्गठित जिलावार लक्ष्य जारी कर दिए गए हैं।

​बिहार के सभी जिलाधिकारियों (DM) को निर्देशित किया गया है कि वे अधिप्राप्ति कार्य को ‘प्राथमिकता’ के आधार पर संचालित करें। जिलाधिकारियों को निम्नलिखित जिम्मेदारियां सौंपी गई हैं:

  1. केंद्रों का भौतिक सत्यापन: यह सुनिश्चित करना कि सभी पैक्स केंद्रों पर नमी मापने वाली मशीनें (Moisture Meters) और वजन करने के कांटे सुचारू रूप से कार्य कर रहे हैं।
  2. भंडारण क्षमता का विस्तार: चूँकि खरीद का लक्ष्य 10 गुना बढ़ा है, इसलिए गोदामों में जगह की उपलब्धता को पहले ही सुनिश्चित करना अनिवार्य है।
  3. निगरानी और समन्वय: प्रखंडों में प्रतिनियुक्त अधिकारियों के साथ नियमित समीक्षा करना ताकि खरीद के दौरान किसानों को किसी भी प्रकार की राजनैतिक या प्रशासनिक अड़चन का सामना न करना पड़े।

दाल और तिलहन की भी होगी ‘सरकारी’ खरीदारी

​बिहार सरकार केवल गेहूं तक ही सीमित नहीं है, बल्कि दलहन और तिलहन फसलों की खेती करने वाले किसानों के लिए भी खजाना खोल दिया गया है। राज्य में पहली बार इतनी व्यापक स्तर पर मसूर, चना और सरसों की खरीदारी की योजना बनाई गई है:

  • मसूर की अधिप्राप्ति: सरकार ने 32,000 मीट्रिक टन मसूर खरीदने का लक्ष्य रखा है। इसके लिए एमएसपी 7,000 रुपये प्रति क्विंटल निर्धारित किया गया है। मसूर की खरीद 10 अप्रैल से शुरू हो चुकी है और यह 31 मई 2026 तक चलेगी। 7 हजार रुपये की यह कीमत किसानों के लिए किसी जैकपॉट से कम नहीं है।
  • चना और सरसों: रबी सीजन में चने की खेती करने वाले किसानों से 16,750 मीट्रिक टन और सरसों उगाने वाले किसानों से 28,000 मीट्रिक टन की खरीदारी एमएसपी पर की जाएगी।

​दालों और तिलहन की खरीद से राज्य में फसल विविधीकरण (Crop Diversification) को बढ़ावा मिलेगा। जब किसानों को पता होगा कि धान और गेहूं के अलावा अन्य फसलों के लिए भी सरकारी मंडियां खुली हैं, तो वे अपनी जमीन पर नई प्रयोगवादी खेती करने के लिए प्रोत्साहित होंगे।

किसानों के लिए क्या हैं चुनौतियां और सावधानियां?

​सरकारी खरीद का लक्ष्य बढ़ाना एक सकारात्मक कदम है, लेकिन इसकी सफलता पूरी तरह से क्रियान्वयन पर निर्भर करती है। किसानों को सलाह दी गई है कि वे पैक्स केंद्रों पर अपना गेहूं ले जाने से पहले कुछ बुनियादी बातों का ध्यान रखें:

  • पंजीकरण अनिवार्य: गेहूं बेचने के लिए किसानों का पोर्टल पर पंजीकरण होना अनिवार्य है। जिन किसानों ने अब तक निबंधन नहीं कराया है, वे अपने नजदीकी ‘वसुधा केंद्र’ या स्वयं के मोबाइल से आवेदन कर सकते हैं।
  • नमी की मात्रा: गेहूं में नमी की मात्रा निर्धारित मानकों के भीतर होनी चाहिए। अधिक नमी होने पर खरीद में देरी हो सकती है, इसलिए फसल को अच्छे से सुखाकर ही केंद्रों पर लाएं।
  • दस्तावेजों की तैयारी: भूमि संबंधी दस्तावेज और बैंक खाते की जानकारी अपडेट रखें ताकि भुगतान की प्रक्रिया में कोई तकनीकी बाधा न आए।

सुशासन और किसान समृद्धि की नई इबारत

​अंततः, 25 अप्रैल 2026 की यह घोषणा बिहार के कृषि परिदृश्य में एक नए युग का सूत्रपात है। गेहूं खरीद के लक्ष्य को 18 हजार से बढ़ाकर 1.80 लाख मीट्रिक टन करना सरकार के उस ‘प्रो-फार्मर’ (किसान समर्थक) दृष्टिकोण को बयां करता है, जहाँ विकास का लाभ सीधे खेत और खलिहान तक पहुँचाने की कोशिश है। मसूर, चना और सरसों की एमएसपी पर खरीद इस मुहिम को और अधिक व्यापक बनाती है।

​वॉयस ऑफ बिहार (VOB) का मानना है कि यदि प्रशासन जिलावार लक्ष्यों को प्राप्त करने में सफल रहता है, तो यह बिहार की ग्रामीण अर्थव्यवस्था में नकदी के प्रवाह (Cash Flow) को बढ़ाएगा, जिससे बाजार में भी रौनक आएगी। 15 जून तक चलने वाला यह अधिप्राप्ति अभियान बिहार के किसानों के स्वाभिमान और समृद्धि की कसौटी होगा। अब समय आ गया है कि किसान जागरूक होकर इस योजना का लाभ उठाएं और अपनी मेहनत का उचित फल प्राप्त करें।

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