
पटना में योजना एवं विकास विभाग, बिहार सरकार द्वारा आयोजित एक दिवसीय कार्यशाला में सीमावर्ती क्षेत्रों के विकास को लेकर महत्वपूर्ण चर्चा की गई। “वाइब्रेंट विलेज प्रोग्राम–II (VVP-II)” के प्रभावी क्रियान्वयन, विभागीय समन्वय और मजबूत मॉनिटरिंग तंत्र को लेकर आयोजित इस कार्यक्रम में राज्य और केंद्र स्तर के कई वरिष्ठ अधिकारियों ने भाग लिया। इस कार्यशाला का मुख्य उद्देश्य सीमावर्ती गांवों में योजनाओं के बेहतर कार्यान्वयन के लिए रणनीति तैयार करना और जमीनी स्तर पर निगरानी को सुदृढ़ बनाना था, ताकि विकास कार्य समयबद्ध और प्रभावी तरीके से पूरे किए जा सकें।
कार्यक्रम की अध्यक्षता ने की, जो योजना एवं विकास विभाग में अपर मुख्य सचिव के पद पर कार्यरत हैं। अपने संबोधन में उन्होंने कहा कि वाइब्रेंट विलेज प्रोग्राम–II सीमावर्ती क्षेत्रों के समग्र और सतत विकास की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल है। उन्होंने अधिकारियों को स्पष्ट निर्देश दिए कि इस योजना के तहत सभी विभाग मिलकर काम करें और डेटा आधारित मॉनिटरिंग सिस्टम को अपनाएं, ताकि हर परियोजना की प्रगति पर नजर रखी जा सके। उन्होंने यह भी जोर दिया कि फील्ड स्तर पर नियमित निगरानी सुनिश्चित की जाए, जिससे योजनाओं का लाभ सीधे आम लोगों तक पहुंच सके।
इस अवसर पर गृह विभाग की विशेष सचिव ने सीमावर्ती क्षेत्रों के विकास में विभागीय समन्वय की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने कहा कि इन क्षेत्रों में विकास कार्यों को प्रभावी बनाने के लिए सुरक्षा और विकास के बीच संतुलन बनाना बेहद जरूरी है। उनका मानना था कि यदि विभिन्न विभाग एक साथ मिलकर काम करें, तो सीमावर्ती क्षेत्रों में तेजी से बदलाव लाया जा सकता है।
कार्यशाला में , जो सशस्त्र सीमा बल में डीआईजी के पद पर कार्यरत हैं, ने भी अपने विचार साझा किए। उन्होंने कहा कि सीमावर्ती इलाकों में विकासात्मक गतिविधियों का सीधा असर वहां के लोगों के विश्वास पर पड़ता है। यदि इन क्षेत्रों में बुनियादी सुविधाएं और रोजगार के अवसर बढ़ाए जाते हैं, तो स्थानीय समुदाय का जुड़ाव मजबूत होता है और वे विकास प्रक्रिया में सक्रिय भागीदारी निभाते हैं।
भारत सरकार के गृह मंत्रालय से जुड़े निदेशक ने इस कार्यक्रम के राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य पर प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि वाइब्रेंट विलेज प्रोग्राम–II के माध्यम से सीमावर्ती गांवों में बुनियादी ढांचे, आजीविका और कनेक्टिविटी को बेहतर बनाने का लक्ष्य रखा गया है। उन्होंने राज्यों की सक्रिय भागीदारी को इस योजना की सफलता के लिए अत्यंत आवश्यक बताया और कहा कि केंद्र और राज्य के बीच बेहतर तालमेल से ही इस योजना के उद्देश्यों को हासिल किया जा सकता है।
तकनीकी पहलुओं पर चर्चा करते हुए राष्ट्रीय सूचना विज्ञान केंद्र के वरिष्ठ तकनीकी निदेशक ने डेटा प्रबंधन और डिजिटल मॉनिटरिंग की भूमिका को रेखांकित किया। उन्होंने बताया कि आधुनिक तकनीक और आईटी आधारित समाधानों के माध्यम से योजनाओं की निगरानी को अधिक पारदर्शी और प्रभावी बनाया जा सकता है। इससे न केवल कार्यों की प्रगति का सही आकलन होगा, बल्कि समय पर सुधारात्मक कदम भी उठाए जा सकेंगे।
कार्यशाला में बिहार के सीमावर्ती जिलों—पश्चिम चंपारण, पूर्वी चंपारण, सीतामढ़ी, मधुबनी, सुपौल, अररिया, किशनगंज, कटिहार, पूर्णिया और सहरसा—के जिला पदाधिकारियों ने वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से भाग लिया। इसके अलावा इन जिलों के जिला योजना पदाधिकारी और प्रखंड विकास पदाधिकारी भी इस कार्यक्रम से जुड़े। सभी प्रतिभागियों ने अपने-अपने क्षेत्रों के अनुभव साझा किए और योजना के बेहतर क्रियान्वयन के लिए सुझाव प्रस्तुत किए।
इस दौरान योजना एवं विकास विभाग के प्रधान सचिव , मूल्यांकन निदेशालय के निदेशक और वाइब्रेंट विलेज प्रोग्राम–II की सहायक नोडल पदाधिकारी सहित अन्य संबंधित अधिकारी भी मौजूद रहे। इन सभी ने कार्यक्रम को सफल बनाने में अपनी सक्रिय भूमिका निभाई और विभिन्न मुद्दों पर अपने विचार रखे।
कार्यशाला के दौरान कई तकनीकी सत्र आयोजित किए गए, जिनमें योजना के क्रियान्वयन, मॉनिटरिंग और मूल्यांकन से जुड़े विभिन्न पहलुओं पर विस्तार से चर्चा हुई। इन सत्रों में प्रतिभागियों ने सक्रिय भागीदारी दिखाई और अपने अनुभवों के आधार पर सुझाव दिए। इससे यह स्पष्ट हुआ कि यदि जमीनी स्तर पर बेहतर समन्वय और तकनीकी सहयोग मिले, तो इस योजना को और अधिक प्रभावी बनाया जा सकता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि वाइब्रेंट विलेज प्रोग्राम–II सीमावर्ती क्षेत्रों के लिए एक महत्वपूर्ण पहल है, जो न केवल बुनियादी सुविधाओं को बेहतर बनाएगी, बल्कि वहां के लोगों के जीवन स्तर में भी सुधार लाएगी। इससे रोजगार के अवसर बढ़ेंगे और क्षेत्रीय असमानता को कम करने में भी मदद मिलेगी।
इस कार्यशाला के माध्यम से यह संदेश दिया गया कि राज्य सरकार सीमावर्ती क्षेत्रों के विकास को लेकर गंभीर है और इसके लिए ठोस कदम उठा रही है। यदि योजनाओं का सही तरीके से क्रियान्वयन किया जाता है, तो आने वाले समय में इन क्षेत्रों में व्यापक बदलाव देखने को मिल सकता है। फिलहाल, सभी की नजर इस बात पर टिकी है कि इस कार्यशाला में लिए गए निर्णयों को जमीनी स्तर पर किस तरह लागू किया जाता है और इससे सीमावर्ती गांवों को कितना लाभ मिल पाता है।


