बिहार में बच्चों की रचनात्मक प्रतिभाओं को मिलेगा नया मंच, आठ दिवसीय ग्रीष्मकालीन कला कार्यशाला का हुआ शुभारंभ

पटना। बिहार में कला और संस्कृति के क्षेत्र में बच्चों की प्रतिभाओं को नई दिशा देने की पहल के तहत बिहार ललित कला अकादमी द्वारा आयोजित आठ दिवसीय ग्रीष्मकालीन चाक्षुष कला कार्यशाला-2026 का विधिवत शुभारंभ कर दिया गया। कला एवं संस्कृति विभाग के सहयोग से आयोजित इस कार्यशाला का उद्घाटन विभाग के मंत्री डॉ. प्रमोद कुमार ने किया। इस अवसर पर उन्होंने बच्चों में छिपी रचनात्मक क्षमता को विकसित करने की आवश्यकता पर बल देते हुए कहा कि कला केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं, बल्कि व्यक्तित्व निर्माण और सामाजिक चेतना को मजबूत करने का भी प्रभावी साधन है।

कार्यशाला के उद्घाटन समारोह में कला एवं संस्कृति विभाग के कई वरिष्ठ अधिकारी, कलाकार, प्रशिक्षक, अभिभावक तथा बड़ी संख्या में बच्चे उपस्थित रहे। कार्यक्रम के दौरान बच्चों में कला के प्रति उत्साह और सीखने की जिज्ञासा स्पष्ट रूप से दिखाई दी। आयोजन स्थल पर विभिन्न कला गतिविधियों की झलक भी प्रस्तुत की गई, जिसने उपस्थित लोगों का ध्यान आकर्षित किया।

बच्चों की प्रतिभा को निखारने की दिशा में महत्वपूर्ण पहल

उद्घाटन समारोह को संबोधित करते हुए डॉ. प्रमोद कुमार ने कहा कि बिहार में प्रतिभाओं की कोई कमी नहीं है। राज्य के शहरों से लेकर ग्रामीण क्षेत्रों तक अनेक ऐसे बच्चे हैं, जिनमें कला के क्षेत्र में उत्कृष्ट प्रदर्शन करने की क्षमता मौजूद है। आवश्यकता केवल उन्हें सही मार्गदर्शन, प्रशिक्षण और मंच उपलब्ध कराने की है।

उन्होंने कहा कि राज्य सरकार कला और संस्कृति के संरक्षण के साथ-साथ नई पीढ़ी को इससे जोड़ने के लिए लगातार प्रयास कर रही है। बच्चों और युवाओं को रचनात्मक गतिविधियों से जोड़ना समय की आवश्यकता है, क्योंकि इससे उनकी सोच का दायरा बढ़ता है और उनमें आत्मविश्वास का विकास होता है।

एक माह की आवासीय कला कार्यशाला आयोजित करने का सुझाव

कार्यक्रम के दौरान मंत्री ने भविष्य की योजनाओं को लेकर भी महत्वपूर्ण सुझाव दिया। उन्होंने कहा कि आने वाले समय में कम से कम एक माह की अवधि वाली आवासीय कला कार्यशाला आयोजित करने पर विचार किया जाना चाहिए, जिसमें बिहार के सभी जिलों से चयनित बच्चे भाग ले सकें।

उन्होंने कहा कि यदि इस प्रकार का आयोजन किया जाता है तो दूर-दराज के क्षेत्रों में रहने वाले प्रतिभाशाली बच्चों को भी अपनी कला को विकसित करने का अवसर मिलेगा। ऐसे प्रतिभागियों के लिए आवास, भोजन और अन्य आवश्यक सुविधाओं की व्यवस्था विभाग की ओर से उपलब्ध कराने के प्रस्ताव पर भी विचार किया जा सकता है। उनका मानना है कि इससे राज्य के विभिन्न हिस्सों में छिपी प्रतिभाओं को एक समान अवसर मिलेगा और कला के क्षेत्र में नई ऊर्जा का संचार होगा।

कला से विकसित होती है कल्पनाशीलता और रचनात्मक सोच

कार्यक्रम में मौजूद सांस्कृतिक कार्य निदेशालय की निदेशक रूबी ने भी बच्चों के सर्वांगीण विकास में कला की भूमिका पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि कला संबंधी गतिविधियां बच्चों के मानसिक, भावनात्मक और बौद्धिक विकास में महत्वपूर्ण योगदान देती हैं।

उन्होंने बताया कि जब बच्चे किसी कलाकृति का निर्माण करते हैं, तो उनकी कल्पनाशीलता और सृजनात्मक क्षमता का विकास होता है। साथ ही वे समस्याओं को नए दृष्टिकोण से देखने और उनका समाधान खोजने की क्षमता भी विकसित करते हैं। कला बच्चों को अपनी भावनाओं और विचारों को अभिव्यक्त करने का अवसर देती है, जिससे उनमें आत्मविश्वास बढ़ता है और उनका व्यक्तित्व अधिक प्रभावशाली बनता है।

पेपर मेशी, वेस्ट मेटेरियल क्राफ्ट और टेराकोटा कला का मिलेगा प्रशिक्षण

03 जून से 10 जून तक चलने वाली इस कार्यशाला में 8 से 16 वर्ष आयु वर्ग के बच्चों और किशोरों को विभिन्न कला विधाओं का प्रशिक्षण दिया जाएगा। कार्यशाला के दौरान प्रतिभागियों को पेपर मेशी, वेस्ट मेटेरियल क्राफ्ट तथा टेराकोटा कला जैसी रचनात्मक विधाओं से परिचित कराया जाएगा।

पेपर मेशी कला में कागज और अन्य सामग्रियों के उपयोग से आकर्षक कलाकृतियां तैयार करना सिखाया जाएगा। वहीं वेस्ट मेटेरियल क्राफ्ट के माध्यम से बच्चों को अनुपयोगी वस्तुओं का रचनात्मक उपयोग करने की जानकारी दी जाएगी। टेराकोटा कला के अंतर्गत मिट्टी से विभिन्न कलात्मक वस्तुओं के निर्माण की तकनीकों का प्रशिक्षण दिया जाएगा।

विशेषज्ञ प्रशिक्षकों की देखरेख में बच्चों को व्यावहारिक अभ्यास भी कराया जाएगा ताकि वे केवल सैद्धांतिक जानकारी तक सीमित न रहें, बल्कि स्वयं कलाकृतियों का निर्माण कर सकें।

‘वेस्ट टू बेस्ट’ की अवधारणा को मिलेगा बढ़ावा

इस कार्यशाला की एक महत्वपूर्ण विशेषता पर्यावरण संरक्षण से जुड़ी जागरूकता भी है। आयोजकों के अनुसार बच्चों को यह बताया जाएगा कि घरों और आसपास उपलब्ध अनुपयोगी वस्तुओं को किस प्रकार उपयोगी और आकर्षक कलाकृतियों में बदला जा सकता है।

‘वेस्ट टू बेस्ट’ की अवधारणा के माध्यम से बच्चों को पुनर्चक्रण और पर्यावरण संरक्षण का संदेश दिया जाएगा। इससे उनमें पर्यावरण के प्रति जिम्मेदारी की भावना विकसित होगी और वे संसाधनों के बेहतर उपयोग को समझ सकेंगे। विशेषज्ञों का मानना है कि बचपन से ही इस प्रकार की सोच विकसित होने पर आने वाली पीढ़ियां पर्यावरण संरक्षण के प्रति अधिक जागरूक बन सकती हैं।

प्रतिदिन चार घंटे चलेगी कार्यशाला

बिहार ललित कला अकादमी के बहुद्देशीय सांस्कृतिक परिसर में आयोजित यह कार्यशाला प्रतिदिन सुबह 11 बजे से दोपहर 3 बजे तक संचालित की जाएगी। प्रशिक्षण अवधि के दौरान बच्चों को आवश्यक कला सामग्री उपलब्ध कराई जाएगी ताकि वे बिना किसी अतिरिक्त खर्च के सीखने की प्रक्रिया में भाग ले सकें।

इसके साथ ही प्रतिभागियों के लिए अल्पाहार की भी व्यवस्था की गई है। आयोजकों का कहना है कि बच्चों को बेहतर सीखने का वातावरण उपलब्ध कराने के लिए सभी आवश्यक सुविधाएं सुनिश्चित की गई हैं।

कला के माध्यम से आत्मविश्वास और नवाचार को मिलेगा बढ़ावा

विशेषज्ञों का मानना है कि इस प्रकार की कार्यशालाएं केवल कला सीखने का माध्यम नहीं होतीं, बल्कि बच्चों में नवाचार, नेतृत्व क्षमता, धैर्य और टीमवर्क जैसी महत्वपूर्ण विशेषताओं का भी विकास करती हैं। जब बच्चे अपनी कल्पना को वास्तविक रूप देते हैं, तो उनमें आत्मविश्वास बढ़ता है और वे नए प्रयोग करने के लिए प्रेरित होते हैं।

बिहार ललित कला अकादमी की यह पहल राज्य के बच्चों को रचनात्मक अवसर प्रदान करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है। उम्मीद की जा रही है कि कार्यशाला के माध्यम से बड़ी संख्या में बच्चे कला की नई विधाओं को सीखेंगे और भविष्य में अपनी प्रतिभा के दम पर राज्य तथा देश का नाम रोशन करेंगे।

कार्यक्रम के अंत में अकादमी की सचिव अमृता प्रीतम ने सभी अतिथियों, कलाकारों, प्रशिक्षकों, अभिभावकों और प्रतिभागियों के प्रति आभार व्यक्त किया। मंच संचालन सोमा चक्रवर्ती द्वारा किया गया। उद्घाटन समारोह उत्साहपूर्ण माहौल में संपन्न हुआ और बच्चों ने आने वाले दिनों में कला की नई-नई विधाएं सीखने को लेकर विशेष उत्सुकता दिखाई।

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