
पटना। बिहार के कृषि प्रधान समाज में गन्ने की खेती केवल एक फसल नहीं, बल्कि हजारों ग्रामीण परिवारों की जीविका का मुख्य आधार है। पेराई सत्र 2025-26 के दौरान गन्ना किसानों के लिए एक बड़ी और राहत भरी खबर सामने आई है। गन्ना उद्योग विभाग की निरंतर निगरानी और प्रशासनिक सख्ती का सकारात्मक परिणाम यह रहा है कि राज्य की चीनी मिलों ने किसानों से खरीदे गए गन्ने के मूल्य का 96 प्रतिशत हिस्सा उनके बैंक खातों में हस्तांतरित कर दिया है। 17 अप्रैल 2026 तक की आधिकारिक रिपोर्ट यह प्रमाणित करती है कि विभाग ने भुगतान प्रक्रिया को अपनी प्राथमिकता सूची में सबसे ऊपर रखा है, ताकि किसानों को उनकी मेहनत का फल समय पर मिल सके और वे अगली फसल के लिए आर्थिक रूप से सशक्त हो सकें। भुगतान की यह रफ़्तार न केवल गन्ना उद्योग के प्रति सरकार की संवेदनशीलता को दर्शाती है, बल्कि उन पुरानी शिकायतों को भी दूर करने का प्रयास है जिनमें किसानों को अपने पैसे के लिए चीनी मिलों के चक्कर काटने पड़ते थे।
आंकड़ों के दर्पण में गन्ना पेराई और भुगतान की स्थिति
पेराई सत्र 2025-26 के दौरान बिहार की दस प्रमुख चीनी मिलों ने जिस रफ़्तार से कार्य किया है, वह आंकड़ों में स्पष्ट रूप से परिलक्षित होता है। 9 अप्रैल 2026 तक की गणना के अनुसार, इन मिलों ने राज्य के किसानों से कुल 572.66 लाख क्विंटल गन्ने की रिकॉर्ड खरीद की। इतनी बड़ी मात्रा में गन्ने की आपूर्ति यह दर्शाती है कि राज्य में गन्ने का उत्पादन न केवल बढ़ा है, बल्कि किसानों का झुकाव इस नकदी फसल की ओर निरंतर बना हुआ है। इस खरीद के एवज में किसानों को दी जाने वाली कुल देय राशि 2137.83 करोड़ रुपये निर्धारित की गई थी।
गन्ना उद्योग विभाग द्वारा साझा की गई जानकारी के अनुसार, इस विशालकाय देय राशि के विरुद्ध अब तक 2054.01 करोड़ रुपये का भुगतान सफलतापूर्वक सुनिश्चित कर लिया गया है। यह राशि कुल भुगतान योग्य मूल्य का 96 प्रतिशत है। यह एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है क्योंकि अप्रैल के महीने में ही भुगतान का इतना बड़ा प्रतिशत पूरा हो जाना यह संकेत देता है कि मिलों की वित्तीय स्थिति और विभाग का समन्वय इस बार काफी बेहतर रहा है। अब केवल 4 प्रतिशत राशि शेष बची है, जिसे लेकर भी विभाग ने अपनी रणनीति स्पष्ट कर दी है। यह भुगतान सीधे तौर पर ग्रामीण अर्थव्यवस्था में नकदी के प्रवाह को बढ़ा रहा है, जिससे स्थानीय व्यापार और किसानों की क्रय शक्ति को बल मिल रहा है।
निगरानी का ‘डिजिटल हंटर’ और समयबद्ध भुगतान की रणनीति
भुगतान के इस सफल मॉडल के पीछे गन्ना उद्योग विभाग की वह सख्त रणनीति रही है जिसे ‘डिजिटल हंटर’ के रूप में देखा जा रहा है। पेराई सत्र शुरू होने से पहले ही विभाग ने सभी चीनी मिल संचालकों और प्रबंधन समितियों को यह स्पष्ट संदेश दे दिया था कि गन्ना खरीद के साथ-साथ भुगतान की रफ़्तार भी तेज रहनी चाहिए। विभाग का मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना था कि किसान को फसल देने के बाद भुगतान के लिए लंबा इंतजार न करना पड़े। इसके लिए एक आधुनिक मॉनिटरिंग सिस्टम विकसित किया गया था, जो प्रतिदिन प्रत्येक चीनी मिल द्वारा की जा रही पेराई और किए जा रहे भुगतान का डेटा मुख्यालय को भेजता रहा है।
ईख आयुक्त और विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों ने स्वयं इस प्रक्रिया की कमान संभाली। विभाग द्वारा लगातार गन्ना किसानों को होने वाले भुगतान की निगरानी की जाती रही, जिससे मिल संचालकों पर एक नैतिक और कानूनी दबाव बना रहा। अधिकारियों का तर्क है कि जब भुगतान समय पर होता है, तो किसानों का भरोसा मिलों पर बढ़ता है और वे बेहतर गुणवत्ता वाले गन्ने का उत्पादन करने के लिए प्रेरित होते हैं। इस बार चीनी मिल संचालकों ने भी तत्परता दिखाते हुए सरकार के निर्देशों का पालन किया है। विभाग ने यह स्पष्ट किया है कि भुगतान की प्रक्रिया में किसी भी प्रकार की शिथिलता को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा, और यही कारण है कि आज 96 फीसदी किसान अपने भुगतान को लेकर संतुष्ट नजर आ रहे हैं।
चीनी मिलों की सक्रियता और ग्रामीण समृद्धि का नया दौर
बिहार में वर्तमान में संचालित दस चीनी मिलों—जिनमें नरकटियागंज, हरिनगर, मझौलिया, सासामुसा और अन्य शामिल हैं—ने इस सत्र में अनुशासित कार्यसंस्कृति का परिचय दिया है। मिलों ने न केवल पेराई क्षमता का बेहतर उपयोग किया, बल्कि किसानों के खातों में पैसे भेजने की तकनीकी प्रक्रियाओं को भी सुव्यवस्थित किया। गन्ना मूल्य का भुगतान समय पर होने से ग्रामीण क्षेत्रों में एक नया उत्साह देखा जा रहा है। आमतौर पर गन्ना किसानों को यह चिंता रहती थी कि उनकी पूंजी मिलों के पास महीनों तक फंसी रहेगी, लेकिन इस बार 96 प्रतिशत भुगतान ने उस धारणा को बदल दिया है।
समय पर मिले इस पैसे का उपयोग किसान अपनी अगली बुआई, बच्चों की शिक्षा और सामाजिक दायित्वों को पूरा करने में कर पा रहे हैं। गन्ने की खेती में बढ़ती लागत को देखते हुए, समय पर भुगतान मिलना किसानों के लिए किसी संजीवनी से कम नहीं है। इससे किसानों की साहूकारों पर निर्भरता कम हुई है और वे अब खेती के लिए आधुनिक उपकरणों और उन्नत उर्वरकों में निवेश करने में सक्षम हो रहे हैं। यह स्थिति दर्शाती है कि कृषि आधारित उद्योगों में अगर प्रबंधन और सरकार का सहयोग मिले, तो ग्रामीण समृद्धि का सपना हकीकत बन सकता है।
शेष 4 प्रतिशत बकाया की वसूली हेतु विभागीय कड़ाई
भले ही भुगतान का आंकड़ा 96 प्रतिशत तक पहुँच चुका है, लेकिन गन्ना उद्योग विभाग शेष 4 प्रतिशत यानी लगभग 83.82 करोड़ रुपये की राशि को लेकर भी पूरी तरह सतर्क है। यह शेष राशि उन मिलों पर बकाया है जहाँ तकनीकी मिलान या अंतिम पेराई सत्र के कागजी कार्यों के कारण कुछ देरी हुई है। विभाग ने उन सभी मिलों को नोटिस जारी कर दिया है जहाँ भुगतान का प्रतिशत औसत से कम है। ईख आयुक्त ने स्पष्ट रूप से निर्देशित किया है कि बकाया राशि का भुगतान करने की कार्रवाई में तेजी लाई जाए।
विभाग का लक्ष्य है कि आने वाले कुछ ही हफ्तों में 100 प्रतिशत भुगतान का लक्ष्य हासिल कर लिया जाए। इसके लिए साप्ताहिक समीक्षा बैठकें आयोजित की जा रही हैं। किसानों को यह आश्वासन दिया गया है कि उनके पसीने की एक-एक बूंद की कीमत उन्हें मिलेगी। विभाग उन मिलों पर विशेष नजर रख रहा है जिन्होंने अब तक भुगतान में सुस्ती दिखाई है। प्रशासन का कहना है कि जब तक आखिरी किसान के खाते में उसकी देय राशि नहीं पहुँच जाती, तब तक मॉनिटरिंग की यह प्रक्रिया बंद नहीं होगी। यह कड़ाई उन मिल संचालकों के लिए एक चेतावनी है जो भुगतान को अनावश्यक रूप से विलंबित करते रहे हैं।
भविष्य का विजन: गन्ना उद्योग को नई ऊंचाइयों पर ले जाने का संकल्प
पेराई सत्र 2025-26 की यह सफलता भविष्य के लिए एक मजबूत आधार तैयार कर रही है। सरकार और विभाग अब केवल भुगतान तक सीमित नहीं हैं, बल्कि वे गन्ने से इथेनॉल उत्पादन और चीनी मिलों के आधुनिकीकरण पर भी ध्यान केंद्रित कर रहे हैं। गन्ना उद्योग विभाग का मानना है कि यदि भुगतान की यह व्यवस्था स्थायी रूप से सुचारू रहती है, तो आने वाले वर्षों में बिहार गन्ने और चीनी के उत्पादन में देश के अग्रणी राज्यों की श्रेणी में फिर से अपना स्थान बना पाएगा।
किसानों को नई प्रजाति के गन्ने के बीज उपलब्ध कराना और पेराई के साथ-साथ उनके तकनीकी ज्ञान को बढ़ाना विभाग की अगली प्राथमिकता है। 572.66 लाख क्विंटल गन्ने की खरीद यह साबित करती है कि बिहार में इस उद्योग की अपार संभावनाएं हैं। 9 अप्रैल 2026 तक की यह रिपोर्ट यह भी रेखांकित करती है कि सरकारी तंत्र अगर मुस्तैदी से काम करे, तो ‘किसान कल्याण’ केवल नारा नहीं बल्कि एक वास्तविकता बन जाता है। अब नजरें शेष 4 प्रतिशत भुगतान पर टिकी हैं, जिसे जल्द पूरा करने के लिए प्रशासन पूरी शक्ति के साथ जुटा हुआ है।


