
पटना। बिहार के प्रशासनिक गलियारों में एक बड़ी हलचल देखने को मिल रही है। राजस्व एवं भूमि सुधार विभाग ने एक ऐसा निर्णय लिया है जिसे राजनैतिक और प्रशासनिक हलकों में सरकार के ‘बैकफुट’ पर आने के तौर पर देखा जा रहा है। विभाग ने राज्य के सभी जिलाधिकारियों (समाहर्ताओं) को निर्देश दिया है कि वे अपनी मांगों को लेकर हड़ताल पर गए उन राजस्व कर्मियों का निलंबन तत्काल प्रभाव से रद्द करने की प्रक्रिया शुरू करें, जिन्हें पिछले दिनों अनुशासनात्मक कार्रवाई के नाम पर निलंबित कर दिया गया था। विभाग के अपर सचिव डॉ. महेन्द्र पाल द्वारा जारी इस पत्र ने साफ कर दिया है कि सरकार इस समय किसी भी प्रकार का प्रशासनिक गतिरोध मोल लेने की स्थिति में नहीं है। इस नरम रुख के पीछे की सबसे बड़ी वजह कोई राजनैतिक समझौता नहीं, बल्कि ‘जनगणना-2027’ का वह भारी-भरकम बोझ है, जिसका पूरा दारोमदार इन्हीं राजस्व कर्मियों के कंधों पर टिका है। सरकार को डर है कि अगर यह हड़ताल लंबी खिंची, तो राष्ट्रीय महत्व के इस कार्य में बिहार पिछड़ सकता है। हालांकि, दिलचस्प बात यह है कि सरकार के इस ‘ऑलिव ब्रांच’ (शांति प्रस्ताव) के बावजूद राजस्व कर्मी संघ अपनी हड़ताल खत्म करने को तैयार नहीं है।
फरवरी की कार्रवाई और अब का यू-टर्न: प्रशासनिक मजबूरी की दास्तां
बिहार में राजस्व कर्मियों की हड़ताल पिछले काफी समय से चर्चा का विषय बनी हुई है। अपनी विभिन्न मांगों, जिनमें वेतन विसंगति और कार्य की परिस्थितियों में सुधार शामिल है, को लेकर राजस्व कर्मी 11 फरवरी से सड़कों पर थे। उस दौरान सरकार ने कड़ा रुख अपनाते हुए हड़ताल को ‘अवैध’ घोषित करने की कोशिश की थी। इसी सख्ती के तहत 11 फरवरी से 19 फरवरी के बीच राज्य के विभिन्न जिलों में बड़ी संख्या में राजस्व कर्मियों को निलंबित कर दिया गया था। उस समय समाहर्ताओं को लगा था कि निलंबन के डर से कर्मी काम पर लौट आएंगे, लेकिन हुआ इसके उलट।
अब, लगभग दो महीने बाद विभाग ने अपनी रणनीति बदल ली है। अपर सचिव डॉ. महेन्द्र पाल की ओर से भेजे गए पत्र में स्पष्ट रूप से उल्लेख किया गया है कि जिला समाहर्ता, जो कि अनुशासनिक प्राधिकार (Disciplinary Authority) हैं, इन कर्मियों का निलंबन वापस लेने के लिए सक्षम हैं। विभाग की मंशा अब ‘दमन’ की जगह ‘समन्वय’ की दिख रही है। पत्र का लहजा बताता है कि सरकार अब उन फाइलों को बंद करना चाहती है जो हड़ताल के दौरान खोली गई थीं। लेकिन सवाल यह है कि जो सरकार फरवरी में झुकने को तैयार नहीं थी, वह अप्रैल के अंत में इतनी उदार कैसे हो गई?
जनगणना-2027: वह ‘ब्रह्मास्त्र’ जिसने सरकार को सोचने पर मजबूर किया
इस पूरे घटनाक्रम के केंद्र में ‘जनगणना-2027’ का काम है। भारत सरकार की इस महापरियोजना में राजस्व कर्मियों की भूमिका ‘रीढ़ की हड्डी’ जैसी होती है। प्रगणकों की नियुक्ति से लेकर वार्डवार सीमांकन और हाउस लिस्टिंग तक, हर स्तर पर इन कर्मियों की विशेषज्ञता की आवश्यकता होती है। बिहार में वैसे भी भूमि सुधार और सर्वे का काम अपने चुनौतीपूर्ण दौर से गुजर रहा है, ऐसे में जनगणना का अतिरिक्त बोझ बिना इन अनुभवी कर्मियों के उठाना नामुमकिन है।
विभाग ने अपने पत्र में स्वीकार किया है कि “जनगणना का काम सुचारू रूप से चलाना सरकार की प्राथमिकता है।” सरकार को इस बात का भलीभांति अहसास है कि यदि प्रशिक्षित राजस्व कर्मी निलंबित रहे या हड़ताल पर डटे रहे, तो डिजिटल जनगणना के आंकड़ों में बड़ी त्रुटियां हो सकती हैं। केंद्र सरकार की ओर से समय-समय पर होने वाली समीक्षाओं में बिहार की स्थिति खराब न हो, इसके लिए विभाग ने निलंबन वापसी का कार्ड खेला है। यह एक तरह का रणनीतिक समझौता है, जहाँ सरकार ने अपनी ‘ईगो’ (अहंकार) को राष्ट्रीय कर्तव्य के पीछे रखा है।
निलंबन वापसी की प्रक्रिया: अब पाला जिलाधिकारियों के पाले में
अपर सचिव के पत्र के बाद अब गेंद पूरी तरह से जिला समाहर्ताओं के पाले में है। पत्र में तकनीकी रूप से यह स्पष्ट किया गया है कि निलंबन रद्द करने की शक्ति समाहर्ताओं के पास सुरक्षित है। इसका अर्थ यह है कि अब हर जिले के डीएम को अपने स्तर पर समीक्षा करनी होगी और 11 से 19 फरवरी के बीच किए गए निलंबन आदेशों को वापस लेना होगा।
प्रशासनिक जानकारों का मानना है कि इस प्रक्रिया में एक से दो दिन का समय लग सकता है। भागलपुर, पटना, गया और मुजफ्फरपुर जैसे जिलों में जहाँ राजस्व कर्मियों की संख्या अधिक है और निलंबन भी ज्यादा हुए थे, वहां के समाहर्ताओं के लिए यह एक बड़ी कसरत होगी। विभाग चाहता है कि अगले 48 घंटों के भीतर ये कर्मी तकनीकी रूप से ‘निलंबन मुक्त’ हो जाएं ताकि उन्हें जनगणना के कार्यों में आधिकारिक रूप से नियोजित किया जा सके। लेकिन यहाँ एक पेंच फँसा हुआ है—निलंबन रद्द होने का मतलब यह कतई नहीं है कि कर्मी काम पर लौट ही आएंगे, क्योंकि उनकी मूल मांगें अभी भी अधूरी हैं।
संघ का अड़ियल रुख: बातचीत बेनतीजा, हड़ताल जारी
सरकार की इस ‘उदारता’ का राजस्व कर्मी संघ पर फिलहाल कोई विशेष असर होता नहीं दिख रहा है। विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों ने पिछले दिनों संघ के प्रतिनिधियों के साथ लंबी वार्ता की थी। उस बैठक में विभाग ने आश्वासन दिया था कि उनकी मांगों पर सकारात्मक विचार किया जा रहा है और इसी के तहत पहला कदम निलंबन वापसी के रूप में उठाया गया है। लेकिन संघ का तर्क है कि निलंबन तो सरकार की अपनी गलती थी, जिसे वह सुधार रही है; उनकी असली लड़ाई वेतनमान और सेवा शर्तों को लेकर है।
संघ के नेताओं का कहना है कि जब तक उनकी मांगों पर कोई लिखित और ठोस कैबिनेट निर्णय नहीं होता, तब तक वे काम पर नहीं लौटेंगे। यह स्थिति सरकार के लिए ‘सिरदर्द’ बनी हुई है। एक तरफ सरकार निलंबन रद्द कर उन्हें काम पर बुलाना चाहती है, वहीं दूसरी तरफ कर्मी इस मौके को अपनी मांगों को मनवाने के लिए ‘दबाव’ (Leverage) के रूप में इस्तेमाल कर रहे हैं। जनगणना जैसे महत्वपूर्ण कार्य के बीच कर्मियों का यह अड़ियल रुख प्रशासनिक मशीनरी को ठप कर सकता है।
राजस्व एवं भूमि सुधार: बिहार के विकास की अटकी हुई चाबी
राजस्व कर्मियों की इस खींचतान का सीधा असर बिहार के उन लाखों किसानों और आम नागरिकों पर पड़ रहा है जो जमीन के दाखिल-खारिज (Mutation), परिमार्जन और सर्वे के काम के लिए अंचल कार्यालयों के चक्कर काट रहे हैं। बिहार सरकार भूमि सुधारों को लेकर अपनी पीठ थपथपाती रही है, लेकिन हकीकत यह है कि जमीनी स्तर के कर्मियों के बिना यह पूरा ढांचा चरमरा गया है।
निलंबन रद्द करने का निर्देश यह भी दर्शाता है कि सरकार मान चुकी है कि वह इन कर्मियों का कोई विकल्प तैयार नहीं कर पाई है। संविदा पर या अन्य माध्यमों से काम चलाने की कोशिशें विफल रही हैं। अब जबकि जनगणना का काम सिर पर है, सरकार चाहती है कि कम से कम ‘सहमति’ का एक माहौल बने। लेकिन क्या केवल निलंबन वापसी से हड़ताल खत्म होगी? यह बड़ा सवाल है। यदि कर्मी वापस नहीं लौटते हैं, तो सरकार को मजबूरी में और भी सख्त कदम उठाने पड़ सकते हैं, जो स्थिति को और बिगाड़ देगा।
समाधान या केवल समय की खरीद?
21 अप्रैल 2026 को जारी यह निर्देश बिहार की प्रशासनिक कार्यशैली पर एक गहरी टिप्पणी है। यह दिखाता है कि कैसे एक बड़ी परियोजना (जनगणना) के दबाव में आकर सरकार को अपने पिछले निर्णयों को बदलना पड़ता है। डॉ. महेन्द्र पाल का पत्र एक प्रशासनिक ‘सर्कुलर’ से कहीं ज्यादा एक ‘मजबूरी का दस्तावेज’ नजर आता है।
अब सबकी नजरें राजस्व कर्मी संघ के अगले कदम पर टिकी हैं। क्या वे सरकार के इस लचीले रुख का सम्मान करते हुए काम पर लौटेंगे, या फिर वे इसे सरकार की कमजोरी मानकर अपनी मांगों को लेकर और भी उग्र होंगे? आने वाले कुछ दिन बिहार के राजस्व प्रशासन और जनगणना की भविष्य की दिशा तय करेंगे। फिलहाल, सड़कों पर बैठे कर्मियों के लिए यह एक छोटी नैतिक जीत जरूर है, लेकिन बिहार की जनता के लिए यह केवल एक उम्मीद है कि शायद अब अंचल कार्यालयों के ताले खुलेंगे और उनके रुके हुए काम फिर से शुरू हो पाएंगे। जनगणना सुचारू रूप से चले, इसके लिए सरकार ने अपना दांव चल दिया है; अब देखना है कि ‘मैदान’ में डटे कर्मचारी क्या फैसला लेते हैं।


