​बिहार में ‘सीएम’ पर सस्पेंस! बीजेपी बैठक से सम्राट गायब? नीतीश से मुलाकात ने बढ़ाई हलचल..

पटना। बिहार की सियासत में इस समय जो कुछ भी घट रहा है, वह किसी सस्पेंस थ्रिलर फिल्म की पटकथा से कम नहीं है। 11 अप्रैल 2026 की शाम होते-होते पटना के 1 अणे मार्ग से लेकर बीजेपी कार्यालय तक की हवा में भारी राजनीतिक बेचैनी महसूस की जा सकती है। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के राज्यसभा सांसद के रूप में शपथ लेने के बाद से ही यह तय माना जा रहा था कि बिहार की कमान अब भारतीय जनता पार्टी के हाथों में जाने वाली है। लेकिन, शनिवार को जिस तरह के घटनाक्रम सामने आए, उन्होंने इस पूरी प्रक्रिया पर संशय के बादल मंडरा दिए हैं। चर्चा का केंद्र बिंदु राज्य के उपमुख्यमंत्री सम्राट चौधरी हैं, जिनका नाम मुख्यमंत्री की रेस में सबसे आगे चल रहा था, लेकिन पार्टी के ही एक महत्वपूर्ण कार्यक्रम से उनकी अनुपस्थिति ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं। क्या बिहार की सत्ता का हस्तांतरण उतना आसान होगा जितना इसे माना जा रहा था या परदे के पीछे किसी बड़े ‘खेल’ की तैयारी चल रही है?

बीजेपी दफ्तर की हलचल: मुख्य चेहरे की गैरमौजूदगी के मायने

​शनिवार को भारतीय जनता पार्टी के प्रदेश कार्यालय में एक महत्वपूर्ण कार्यक्रम का आयोजन किया गया था। इस कार्यक्रम में पार्टी के लगभग सभी कद्दावर नेताओं, मंत्रियों और विधायकों को आमंत्रित किया गया था। कयास लगाए जा रहे थे कि इस बैठक में भविष्य के सत्ता समीकरणों और नेतृत्व परिवर्तन की रूपरेखा पर चर्चा होगी। उपमुख्यमंत्री विजय सिन्हा सहित कई अन्य बड़े नेता इस बैठक में समय पर पहुँचे, लेकिन सबकी निगाहें सम्राट चौधरी को तलाश रही थीं।

​सम्राट चौधरी, जो न केवल उपमुख्यमंत्री हैं बल्कि बिहार भाजपा के सबसे प्रभावशाली चेहरों में से एक हैं, उनका अपनी ही पार्टी के दफ्तर में आयोजित इतने महत्वपूर्ण कार्यक्रम से नदारद रहना सामान्य बात नहीं मानी जा रही है। राजनीतिक गलियारों में इस बात की चर्चा जोरों पर है कि जब नेतृत्व परिवर्तन की घड़ी इतनी करीब हो, तब फ्रंट-रनर (मुख्य दावेदार) का बैठक से गायब होना किसी बड़े आंतरिक असंतोष या रणनीति में बदलाव का संकेत है।

विजय सिन्हा की चुप्पी और पत्रकारों के सवाल

​बीजेपी कार्यालय में मौजूद दूसरे उपमुख्यमंत्री विजय सिन्हा की शारीरिक भाषा और उनके संक्षिप्त जवाबों ने सस्पेंस को और गहरा कर दिया। जब कार्यक्रम के बाद पत्रकारों ने उनसे सम्राट चौधरी की अनुपस्थिति के बारे में पूछा, तो उन्होंने स्पष्ट जवाब देने के बजाय वहां से जाने में ही भलाई समझी। पत्रकारों के बार-बार पूछने पर उन्होंने केवल इतना कहा कि “उन्हें कहीं और जाना होगा।”

​विजय सिन्हा का यह टालमटोल वाला रवैया और चेहरे पर खिंची चिंता की लकीरें इस बात की तस्दीक कर रही थीं कि पार्टी के भीतर सब कुछ सामान्य नहीं है। अगर सम्राट चौधरी किसी पूर्व निर्धारित कार्यक्रम या निजी कारणों से अनुपस्थित होते, तो पार्टी के अन्य नेताओं की ओर से एक स्पष्ट स्पष्टीकरण सामने आता, लेकिन इस तरह की चुप्पी किसी बड़े संदेश की ओर इशारा करती है।

संघ का ‘वीटो’ और नाराज सम्राट की दूरी: क्या है सच्चाई?

​बिहार की राजनीति में पिछले 24 घंटों से एक और चर्चा ने जोर पकड़ लिया है। सूत्रों के हवाले से यह खबर आ रही है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) का एक धड़ा सम्राट चौधरी के नाम पर पूरी तरह सहमत नहीं है। चर्चा है कि संगठन के स्तर पर किसी ऐसे चेहरे की तलाश की जा रही है जो वैचारिक रूप से अधिक पुराना और कैडर आधारित हो। हालांकि, सम्राट चौधरी ने पिछले कुछ वर्षों में जिस तरह से नीतीश कुमार के खिलाफ मोर्चा खोला और पिछड़ा वर्ग के बड़े नेता के रूप में उभरे, उसे देखते हुए उन्हें सीएम पद का सबसे स्वाभाविक दावेदार माना जा रहा था।

​यदि संघ की नाराजगी की खबरों में सच्चाई है, तो सम्राट चौधरी का पार्टी कार्यक्रम से दूरी बनाना उनके विरोध का एक तरीका हो सकता है। यह भी माना जा रहा है कि दिल्ली से उन्हें कोई ऐसा संकेत मिला है जिसने उन्हें आहत किया है। सम्राट चौधरी के समर्थक भी इस समय शांत हैं, जिससे पार्टी के भीतर किसी बड़े मंथन या खींचतान की बू आ रही है।

नीतीश कुमार की वापसी और 5 बजे की अचानक मुलाकात

​इस पूरे राजनीतिक ड्रामे के बीच मुख्यमंत्री नीतीश कुमार दिल्ली से पटना लौट आए हैं। उन्होंने 10 अप्रैल को राज्यसभा सदस्य के रूप में शपथ ली है और सूत्रों का कहना है कि वे 14 अप्रैल तक अपना इस्तीफा सौंप सकते हैं। नीतीश कुमार ने पहले ही संकेत दे दिया था कि वे अब राष्ट्रीय राजनीति में सक्रिय होंगे और बिहार में नए लोगों को मौका मिलना चाहिए।

​लेकिन शनिवार शाम 5 बजे अचानक एक ऐसी खबर आई जिसने सबको चौंका दिया। उपमुख्यमंत्री सम्राट चौधरी, जो सुबह से बीजेपी की बैठक से गायब थे, अचानक 1 अणे मार्ग स्थित मुख्यमंत्री आवास पहुँचे। नीतीश कुमार और सम्राट चौधरी के बीच हुई यह मुलाकात लगभग 30-40 मिनट तक चली। इस मुलाकात के समय और संदर्भ ने कयासों को नया आधार दे दिया है। क्या सम्राट चौधरी नीतीश कुमार के साथ मिलकर अपनी स्थिति मजबूत करने की कोशिश कर रहे हैं? या यह केवल एक शिष्टाचार भेंट थी?

बीजेपी का ‘फर्स्ट सीएम’ मिशन: ऐतिहासिक मोड़ पर बिहार

​बिहार के इतिहास में यह पहली बार होने जा रहा है जब भारतीय जनता पार्टी अपना मुख्यमंत्री बनाने की स्थिति में है। दो दशकों से अधिक समय तक नीतीश कुमार के साथ कनिष्ठ सहयोगी (Junior Partner) रहने के बाद बीजेपी अब नेतृत्व करने के लिए तैयार है। लेकिन, सबसे बड़ी चुनौती ‘चेहरे’ को लेकर है। सम्राट चौधरी ने नीतीश को गद्दी से हटाने के लिए अपना ‘मुरेठा’ (पगड़ी) बांध रखा है, और यदि उन्हें ही मुख्यमंत्री नहीं बनाया गया, तो यह उनके लिए एक बड़ा राजनीतिक झटका होगा।

​14 और 15 अप्रैल को बिहार की राजनीति के लिए ‘क्रिटिकल’ माना जा रहा है। 14 अप्रैल को एनडीए विधायक दल की बैठक होने की संभावना है, जिसमें औपचारिक रूप से नए मुख्यमंत्री का नाम तय किया जाएगा। यदि सम्राट चौधरी और विजय सिन्हा के बीच संतुलन नहीं बैठा, या दिल्ली से किसी तीसरे नाम का ऐलान हुआ, तो बिहार एनडीए के भीतर एक नया संकट खड़ा हो सकता है।

निष्कर्ष: 48 घंटे और सस्पेंस का अंत

​बिहार की सियासत इस वक्त जिस मोड़ पर है, वहां एक-एक कदम फूंक-फूंक कर रखा जा रहा है। सम्राट चौधरी की नाराजगी, विजय सिन्हा की चुप्पी और नीतीश कुमार के साथ अचानक हुई उनकी मुलाकात—ये सभी कड़ियाँ किसी बड़ी तस्वीर की ओर इशारा कर रही हैं। क्या सम्राट चौधरी को उनकी मेहनत का फल मिलेगा या बीजेपी किसी ‘सरप्राइज’ चेहरे के साथ सबको चौंकाएगी?

​अगले 48 घंटे बिहार के लिए निर्णायक होने वाले हैं। पटना के सियासी गलियारों में यह सवाल हर जुबान पर है कि आखिर खेल किसके पक्ष में पलटेगा। फिलहाल, सम्राट चौधरी और नीतीश कुमार की मुलाकात ने यह तो साफ कर दिया है कि सम्राट इतनी आसानी से मैदान छोड़ने वाले नहीं हैं। ‘द वॉइस ऑफ बिहार’ की टीम इस पूरे घटनाक्रम और राजभवन की हलचल पर अपनी पैनी नजर बनाए रखेगी।

  • ये भी पढ़े..

    अंतरराष्ट्रीय योग दिवस पर भागलपुर वन विभाग में योग शिविर, वनकर्मियों ने अपनाया स्वस्थ जीवन का संकल्प

    Share Add as a preferred…