​तेजस्वी परिवारवाद और आरक्षण का अंतर समझें: बिजेन्द्र यादव

पटना। बिहार की राजनैतिक फिजाओं में इन दिनों ‘आरक्षण’ और ‘सामाजिक न्याय’ के नारों के बीच एक नई वैचारिक जंग छिड़ गई है। सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच जुबानी तीर अब सिद्धांतों और परिभाषाओं पर आकर टिक गए हैं। सोमवार, 20 अप्रैल 2026 को बिहार के उपमुख्यमंत्री बिजेन्द्र यादव ने महिला आरक्षण विधेयक के बहाने नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव पर अब तक का सबसे तीखा हमला बोला है। बिजेन्द्र यादव ने न केवल तेजस्वी के बयानों को आड़े हाथों लिया, बल्कि उन्हें ‘आरक्षण’ और ‘परिवारवाद’ के बीच के उस बारीक लेकिन गहरे अंतर को समझने की सलाह दी, जिसे अक्सर क्षेत्रीय राजनीति के शोर में दबा दिया जाता है। उपमुख्यमंत्री का यह बयान ऐसे समय में आया है जब बिहार में आगामी चुनावी बिसात बिछाई जा रही है और महिला वोट बैंक को साधने के लिए हर दल अपनी-अपनी दलीलें पेश कर रहा है। बिजेन्द्र यादव ने साफ शब्दों में कहा कि आरक्षण का असली मकसद समाज के उस अंतिम व्यक्ति तक अवसर पहुँचाना है जो सदियों से हाशिये पर है, न कि सत्ता को एक ही परिवार के ड्राइंग रूम तक सीमित रखना।

आरक्षण बनाम परिवारवाद: बिजेन्द्र यादव का कड़ा प्रहार

​उपमुख्यमंत्री बिजेन्द्र यादव ने सोमवार को आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान मीडिया से मुखातिब होते हुए तेजस्वी के उन दावों को खारिज कर दिया जिनमें वे खुद को महिला आरक्षण का सबसे बड़ा पैरोकार बताने की कोशिश कर रहे थे। बिजेन्द्र यादव ने तंज कसते हुए कहा कि आरक्षण और परिवारवाद दो अलग-अलग ध्रुव हैं। उन्होंने कहा, “आरक्षण का उद्देश्य आम लोगों, पिछड़ों और वंचितों को मुख्यधारा में अवसर देना है। जब आप किसी संवैधानिक व्यवस्था का लाभ उठाकर केवल अपने ही घर की महिलाओं को कुर्सी पर बैठाते हैं, तो उसे महिला सशक्तिकरण या आरक्षण नहीं, बल्कि शुद्ध रूप से परिवारवाद कहा जाता है।”

​बिजेन्द्र यादव का यह हमला सीधे तौर पर लालू-राबड़ी युग की उन यादों को ताजा करने की कोशिश थी, जब बिहार की सत्ता की कमान राबड़ी देवी को सौंपी गई थी। उपमुख्यमंत्री ने बिना नाम लिए तेजस्वी को आइना दिखाया कि अगर कोई नेता अपनी पत्नी, बेटी या मां को विधायक, सांसद या मुख्यमंत्री बना देता है, तो वह समाज की अन्य करोड़ों महिलाओं का हक मार रहा होता है। उनके अनुसार, आरक्षण की सार्थकता तब है जब एक साधारण किसान की बेटी या एक मजदूर की पत्नी सदन तक पहुँचे, न कि पहले से ही सत्ता के केंद्र में बैठे परिवार की महिलाएं।

इंदिरा गांधी का उदाहरण और कांग्रेस की विरासत पर चर्चा

​अपने संबोधन के दौरान बिजेन्द्र यादव ने इतिहास के पन्नों को पलटते हुए देश की पहली महिला प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी का जिक्र किया। उन्होंने कहा कि भारत में महिलाओं को नेतृत्व का अवसर हमेशा से मिलता रहा है, लेकिन उसके पीछे एक संगठनात्मक सोच और राष्ट्रीय पहल होती थी। बिजेन्द्र यादव ने याद दिलाया कि जब इंदिरा गांधी को प्रधानमंत्री बनाया गया था, तब कांग्रेस ने एक बड़ी पहल की थी और उन्हें एक नेता के रूप में तैयार किया गया था।

​हालांकि, उन्होंने यह भी जोड़ा कि वर्तमान दौर में तेजस्वी जिस ‘सामाजिक न्याय’ की बात करते हैं, उसमें समाज के दूसरे प्रतिभाशाली लोगों के लिए कोई जगह नहीं दिखती। बिजेन्द्र यादव ने कहा, “तेजस्वी को यह समझना चाहिए कि नेतृत्व थोपा नहीं जाता, वह अर्जित किया जाता है। आरक्षण वह सीढ़ी है जो उन लोगों के लिए बनाई गई है जिनके पास कोई दूसरा सहारा नहीं है। लेकिन तेजस्वी ने इस सीढ़ी को अपने परिवार की निजी लिफ्ट बना लिया है।” उपमुख्यमंत्री ने इस बात पर जोर दिया कि असली आरक्षण वह है जो व्यापक समाज को लाभ पहुँचाए और सामाजिक ढांचे में आमूलचूल परिवर्तन लाए।

व्यापक समाज का हित या एक परिवार की सत्ता?

​बिजेन्द्र यादव ने विस्तार से इस बात को रेखांकित किया कि आरक्षण का लाभ जब तक समाज के निचले तबके तक नहीं पहुँचेगा, तब तक उसे सफल नहीं माना जा सकता। उन्होंने तेजस्वी पर आरोप लगाया कि उनके राजनीतिक दर्शन में ‘समाज’ का मतलब केवल उनका अपना कुनबा है। उपमुख्यमंत्री ने सवाल उठाया कि क्या तेजस्वी के पास अपने परिवार से बाहर कोई ऐसी महिला नेता नहीं है जिसे वे आगे बढ़ा सकें?

​उन्होंने कहा कि जब आप आरक्षण के नाम पर केवल अपने सगे-संबंधियों को टिकट बांटते हैं, तो आप उन हजारों महिला कार्यकर्ताओं का अपमान करते हैं जो धूप और धूल में अपनी पार्टी के लिए झंडा बुलंद करती हैं। बिजेन्द्र यादव के अनुसार, तेजस्वी को ‘परिवारवाद’ के चश्मे को उतारकर ‘आरक्षण’ के मूल सिद्धांतों को पढ़ने की जरूरत है। उन्होंने कहा कि बिहार की जनता अब जागरूक हो चुकी है और वह ‘परिवार के सशक्तिकरण’ और ‘महिलाओं के सशक्तिकरण’ के बीच का फर्क अच्छी तरह समझती है।

तेजस्वी के विजन पर सवाल: बिना रोडमैप की राजनीति

​उपमुख्यमंत्री ने तेजस्वी की राजनैतिक परिपक्वता पर भी सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि तेजस्वी अक्सर बिना किसी विजन और बिना किसी रोडमैप के बयानबाजी करते हैं। महिला आरक्षण पर उनके हालिया बयान इसी दिशाहीनता का प्रमाण हैं। बिजेन्द्र यादव ने कहा कि एनडीए सरकार महिलाओं को आर्थिक और सामाजिक रूप से स्वतंत्र बनाने के लिए धरातल पर काम कर रही है, चाहे वह जीविका दीदियों का मामला हो या पंचायत चुनावों में महिलाओं को दिया गया 50 फीसदी आरक्षण।

​बिजेन्द्र यादव ने दावा किया कि नीतीश कुमार के नेतृत्व में बिहार ने महिलाओं को वह सम्मान दिया है जो पहले कभी नहीं मिला था। उन्होंने तेजस्वी को चुनौती दी कि वे केवल नारों के बजाय यह बताएं कि उनके कार्यकाल में कितनी आम महिलाओं को राजनैतिक नेतृत्व का अवसर मिला। उपमुख्यमंत्री ने कहा कि तेजस्वी की राजनीति केवल ‘क्रेडिट लेने’ तक सीमित है, जबकि एनडीए सरकार ‘डिलीवरी’ यानी परिणाम देने में विश्वास रखती है।

बिहार की राजनीति में नया मोड़: 2026 का चुनावी नैरेटिव

​बिजेन्द्र यादव का यह बयान आने वाले समय में बिहार की राजनीति का रुख तय करने वाला माना जा रहा है। सत्ता पक्ष अब तेजस्वी को ‘आरक्षण विरोधी’ के बजाय ‘आरक्षण का निजीकरण करने वाला’ नेता साबित करने की कोशिश कर रहा है। यह एक रणनीतिक बदलाव है, क्योंकि बिहार में पिछड़ों और अतिपिछड़ों का एक बड़ा हिस्सा अब केवल जाति के नाम पर वोट देने के बजाय यह देख रहा है कि विकास और अवसर का लाभ उनके घर तक पहुँच रहा है या केवल नेता के परिवार तक।

​उपमुख्यमंत्री ने स्पष्ट कर दिया कि तेजस्वी को परिवारवाद और आरक्षण के बीच की विभाजक रेखा को समझना होगा। उन्होंने कहा कि आने वाले समय में जनता तेजस्वी से यह हिसाब मांगेगी कि उन्होंने सामाजिक न्याय के नाम पर कितने परिवारों को सत्ता में हिस्सेदारी दी। बिजेन्द्र यादव ने अंत में यह दोहराया कि एनडीए सरकार महिलाओं के लिए आरक्षण को उनके आत्म-सम्मान और स्वावलंबन का जरिया मानती है, न कि किसी परिवार की राजनैतिक विरासत को आगे बढ़ाने का हथियार।

परिभाषाओं की जंग में उलझा विपक्ष

​सोमवार की इस तीखी प्रतिक्रिया ने यह साफ कर दिया है कि बिहार सरकार अब तेजस्वी के हर हमले का जवाब उनके अपने ही इतिहास और कार्यशैली से देने के लिए तैयार है। बिजेन्द्र यादव द्वारा इंदिरा गांधी का उदाहरण देना और तेजस्वी को ‘फर्क समझने’ की सलाह देना, विपक्षी खेमे में हलचल पैदा कर चुका है।

​अब देखना यह होगा कि तेजस्वी यादव इस ‘परिवारवाद बनाम आरक्षण’ की बहस का क्या जवाब देते हैं। क्या वे अपने परिवार से बाहर के चेहरों को आगे लाकर बिजेन्द्र यादव के इन आरोपों को गलत साबित कर पाएंगे, या फिर वे एक बार फिर ‘साजिश’ का कार्ड खेलकर खुद को पीड़ित दिखाने की कोशिश करेंगे? फिलहाल, बिजेन्द्र यादव ने जो लकीर खींची है, उसने बिहार की महिलाओं और आम जनता के सामने एक बड़ा सवाल छोड़ दिया है कि असली सशक्तिकरण किसका हो रहा है—समाज का या एक परिवार का?

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