
पटना। बिहार के ग्रामीण और शहरी इलाकों में स्वास्थ्य और पोषण की जड़ों को मजबूत करने की दिशा में समाज कल्याण विभाग ने एक बड़ी उपलब्धि हासिल की है। राज्य में संचालित ‘पूरक पोषाहार योजना’ के तहत पिछले दो महीनों के भीतर एक ऐसा आंकड़ा सामने आया है जो न केवल उत्साहजनक है, बल्कि यह भी दर्शाता है कि तकनीक के इस्तेमाल से सरकारी योजनाओं की पहुँच कितनी पारदर्शी हो सकती है। शनिवार, 09 मई 2026 को विभाग द्वारा जारी ताजा रिपोर्ट के अनुसार, फरवरी और मार्च महीने के दौरान प्रदेश के 95 लाख 41 हजार 891 लाभुकों को ‘टेक होम राशन’ (THR) उपलब्ध कराया गया है। यह सफलता इसलिए भी विशेष है क्योंकि बिहार अब पारंपरिक कागजी खानापूर्ति से बाहर निकलकर चेहरा पहचान प्रणाली (Face Recognition System – FRS) के जरिए लाभार्थियों की पहचान कर रहा है। आंगनबाड़ी केंद्रों पर होने वाली राशन की बंदरबांट और फर्जीवाड़े को रोकने के लिए विभाग ने डिजिटल कवच तैयार किया है, जिसके सकारात्मक परिणाम अब धरातल पर दिखने लगे हैं। समस्तीपुर, मुजफ्फरपुर और पटना जैसे जिलों ने इस मुहिम में अग्रणी भूमिका निभाते हुए सबसे अधिक संख्या में जरूरतमंदों तक पोषण पहुँचाया है।
तकनीक का कमाल: चेहरा पहचान प्रणाली से हुआ ‘फर्जीवाड़े’ का अंत
बिहार के आंगनबाड़ी केंद्रों की छवि अक्सर विवादों और अनियमितताओं से घिरी रही है, लेकिन आईसीडीएस (ICDS) निदेशालय ने चेहरा पहचान प्रणाली (FRS) को लागू कर इस पूरी व्यवस्था को बदलने का प्रयास किया है। राज्य के विभिन्न जिलों में फैले 1 लाख 15 हजार 64 आंगनबाड़ी केंद्रों पर अब टीएचआर (THR) का वितरण किसी रजिस्टर पर अंगूठे का निशान लगाने मात्र से नहीं होता। सेविका और सहायिकाएं अब मोबाइल ऐप के माध्यम से लाभुक का चेहरा स्कैन करती हैं, जिससे यह सुनिश्चित होता है कि राशन प्राप्त करने वाला व्यक्ति वही है जिसका नाम रिकॉर्ड में दर्ज है।
आईसीडीएस निदेशालय के अधिकारियों का मानना है कि इस तकनीक ने वितरण प्रक्रिया में मानवीय हस्तक्षेप और गड़बड़ियों की गुंजाइश को लगभग खत्म कर दिया है। पूर्व में ऐसी शिकायतें आम थीं कि लाभुकों के नाम पर राशन का उठाव तो हो जाता था, लेकिन वह वास्तविक महिला या बच्चे तक नहीं पहुँचता था। अब एफआरएस के माध्यम से हर एक पैकेट का हिसाब रखा जा रहा है। यह प्रणाली राष्ट्रीय स्तर पर संचालित ‘पोषण ट्रैकर ऐप’ के साथ एकीकृत है, जिससे केंद्र सरकार भी बिहार के इन आंकड़ों की निगरानी रीयल-टाइम आधार पर कर पा रही है।
95 लाख लाभुकों का गणित: कौन-कौन हैं इस योजना के दायरे में?
पूरक पोषाहार योजना का मुख्य उद्देश्य समाज के उस वर्ग को पोषण देना है जो सबसे अधिक संवेदनशील है। फरवरी और मार्च 2026 के आंकड़ों के अनुसार, जिन 95.41 लाख लाभुकों को राशन दिया गया, उनमें तीन मुख्य श्रेणियां शामिल हैं:
- गर्भवती महिलाएं: गर्भस्थ शिशु के बेहतर मानसिक और शारीरिक विकास के लिए माताओं को अतिरिक्त पोषक तत्वों की आवश्यकता होती है।
- धात्री माताएं: स्तनपान कराने वाली माताओं को स्वस्थ रखने के लिए यह राशन जीवन रक्षक साबित हो रहा है।
- 6 महीने से 3 वर्ष तक के बच्चे: बच्चों के विकास के शुरुआती वर्षों में कुपोषण को रोकने के लिए विभाग विशेष पोषाहार किट उपलब्ध करा रहा है।
इन दो महीनों में विभाग ने जिस सक्रियता से काम किया है, उसका असर स्वास्थ्य सूचकांकों पर पड़ना तय माना जा रहा है। विशेष रूप से ग्रामीण इलाकों में जहाँ गरीबी और अज्ञानता के कारण कुपोषण एक बड़ी चुनौती है, वहां घर-घर पहुँचने वाला यह सूखा राशन (THR) एक बड़ा सहारा बन गया है।
जिलों की प्रदर्शन तालिका: समस्तीपुर ने मारी बाजी
बिहार के सभी 38 जिलों में इस योजना का क्रियान्वयन हो रहा है, लेकिन कुछ जिलों ने प्रबंधन और तकनीक के उपयोग में मिसाल पेश की है। समस्तीपुर जिले ने पूरे प्रदेश में प्रथम स्थान प्राप्त किया है, जहाँ 4.47 लाख से अधिक लाभुकों को डिजिटल पहचान के जरिए राशन दिया गया।
शीर्ष 5 जिलों का वितरण विवरण:
जिला | लाभुकों की कुल संख्या | वितरण का माध्यम |
|---|---|---|
समस्तीपुर | 4,47,152 | एफआरएस (FRS) |
मुजफ्फरपुर | 4,37,293 | एफआरएस (FRS) |
पटना | 4,35,801 | एफआरएस (FRS) |
पूर्वी चंपारण | 4,31,177 | एफआरएस (FRS) |
मधुबनी | 4,12,342 | एफआरएस (FRS) |
तालिका से स्पष्ट है कि उत्तर बिहार के जिलों में लाभुकों की संख्या काफी अधिक है। मुजफ्फरपुर और पूर्वी चंपारण जैसे जिलों में घनी आबादी और सक्रिय आंगनबाड़ी नेटवर्क के कारण वितरण का स्तर काफी ऊंचा रहा है। राजधानी पटना में भी शहरी स्लम क्षेत्रों और ग्रामीण अंचलों के आंगनबाड़ी केंद्रों ने तकनीक को अपनाकर इस लक्ष्य को प्राप्त करने में सफलता पाई है।
पोषण ट्रैकर और राष्ट्रीय सराहना: बिहार बना ‘मॉडल’
बिहार सरकार की यह डिजिटल पहल अब राष्ट्रीय स्तर पर भी चर्चा का विषय बनी हुई है। केंद्र सरकार द्वारा विकसित पोषण ट्रैकर ऐप के माध्यम से ऐसी तकनीक को बढ़ावा दिया जा रहा है जो पारदर्शिता सुनिश्चित करे। बिहार उन राज्यों में अग्रणी है जिसने एफआरएस यानी फेस रिकग्निशन सिस्टम को इतने बड़े पैमाने पर सफलतापूर्वक लागू किया है।
आईसीडीएस निदेशालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि एफआरएस से न केवल वितरण प्रक्रिया पारदर्शी हुई है, बल्कि उन ‘फर्जी लाभार्थियों’ की पहचान करना भी बहुत आसान हो गया है जो एक से अधिक केंद्रों पर अपना नाम दर्ज कराकर लाभ ले रहे थे या जिनके नाम केवल कागजों पर मौजूद थे। अब जब तक वास्तविक लाभुक का चेहरा कैमरे के सामने नहीं आता, तब तक राशन के वितरण की एंट्री ऐप में नहीं हो पाती। इससे सरकार के राजस्व की बचत हो रही है और योजना का लाभ उसी तक पहुँच रहा है जो वास्तव में इसका हकदार है।
आंगनबाड़ी सेविकाओं की भूमिका और जमीनी चुनौतियां
यद्यपि आंकड़े सुखद हैं, लेकिन इस सफलता के पीछे आंगनबाड़ी सेविकाओं का कठिन परिश्रम भी शामिल है। बिहार जैसे राज्य में जहाँ इंटरनेट कनेक्टिविटी की समस्या अक्सर बनी रहती है, वहां स्मार्टफोन के जरिए चेहरा पहचानना और डेटा अपलोड करना एक बड़ी चुनौती रही है। समाज कल्याण विभाग ने इन चुनौतियों से निपटने के लिए सेविकाओं को विशेष प्रशिक्षण दिया है।
1.15 लाख से अधिक केंद्रों पर हर महीने के एक निश्चित दिन टीएचआर (THR) वितरण दिवस मनाया जाता है। इस दिन केंद्र पर उत्सव जैसा माहौल होता है और गर्भवती महिलाओं को पोषण के प्रति जागरूक भी किया जाता है। एफआरएस सिस्टम के आने से सेविकाओं को भी अब रजिस्टर भरने के बोझिल काम से आजादी मिल रही है। हालांकि, तकनीकी खराबी या बुजुर्ग लाभुकों के चेहरे के मिलान में कभी-कभी समस्याएं आती हैं, लेकिन विभाग का आईटी सेल इन समस्याओं का तत्काल समाधान करने में जुटा रहता है।
भविष्य की राह: कुपोषण मुक्त बिहार का सपना
पूरक पोषाहार योजना के तहत 95 लाख से अधिक लाभुकों तक पहुँच बनाना एक पड़ाव मात्र है। सरकार का अंतिम लक्ष्य बिहार को कुपोषण के कलंक से मुक्त करना है। विशेषज्ञों का कहना है कि अगर इसी तरह अगले कुछ वर्षों तक बिना किसी लीकेज के सही पोषण जरूरतमंदों तक पहुँचता रहा, तो राज्य में मातृ मृत्यु दर (MMR) और शिशु मृत्यु दर (IMR) में भारी गिरावट दर्ज की जा सकती है।
राज्य सरकार अब इस योजना के दायरे को और अधिक विस्तृत करने पर विचार कर रही है। आने वाले समय में राशन की गुणवत्ता की जांच के लिए भी डिजिटल टूल्स का उपयोग किया जा सकता है। फिलहाल, फरवरी और मार्च महीने के ये आंकड़े यह बताने के लिए काफी हैं कि बिहार में ‘सुशासन’ अब केवल नारों में नहीं, बल्कि आंगनबाड़ी केंद्रों की उन कतारों में भी दिख रहा है जहाँ तकनीक के जरिए गरीब का हक सुरक्षित किया जा रहा है। समस्तीपुर से लेकर मधुबनी तक, जो बदलाव की लहर शुरू हुई है, वह विकसित बिहार की नींव को और अधिक मजबूत करेगी।


