
पटना। बदलते मौसम के मिजाज और गिरते भू-जल स्तर के बीच बिहार के किसानों के लिए खेती को लाभ का सौदा बनाना अब एक बड़ी चुनौती बन गया है। पारंपरिक सिंचाई पद्धतियों में पानी की बर्बादी और बढ़ती लागत ने किसानों की कमर तोड़ दी है। इसी समस्या के स्थाई समाधान के लिए बिहार कृषि विभाग ने एक महत्वाकांक्षी कदम उठाया है। प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना (सूक्ष्म) के माध्यम से अब राज्य के खेतों में आधुनिक तकनीक का समावेश किया जा रहा है। शनिवार, 09 मई 2026 को विभाग द्वारा जारी दिशा-निर्देशों के अनुसार, ड्रिप (टपकन) और स्प्रिंकलर (फुहारा) सिंचाई प्रणालियों को अपनाने वाले किसानों को 90 प्रतिशत तक का भारी अनुदान दिया जा रहा है। यह योजना न केवल जल संरक्षण की दिशा में एक बड़ा पड़ाव है, बल्कि यह किसानों की आय को दोगुना करने के संकल्प को धरातल पर उतारने का एक सशक्त माध्यम भी है। कृषि विभाग ने स्पष्ट किया है कि इस तकनीक को अपनाकर किसान न केवल 60 प्रतिशत तक पानी बचा सकते हैं, बल्कि अपनी फसल की पैदावार में भी 50 प्रतिशत तक की आशातीत वृद्धि कर सकते हैं।
आधुनिक सिंचाई प्रणालियों पर अनुदान का गणित
प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना (सूक्ष्म) के तहत सरकार ने अनुदान की व्यवस्था को अत्यंत लचीला और किसान हितैषी बनाया है। इसमें किसानों की श्रेणी और सिंचाई के प्रकार के आधार पर सहायता राशि तय की गई है। विभाग का मुख्य जोर लघु और सीमांत किसानों को अधिक से अधिक लाभ पहुँचाने पर है, ताकि वे भी आधुनिक खेती की मुख्यधारा से जुड़ सकें।
अनुदान विवरण तालिका:
सिंचाई पद्धति | लघु एवं सीमांत किसान | अन्य किसान | एफआरए (FRA) पट्टाधारक |
|---|---|---|---|
ड्रिप सिंचाई (Drip) | संभावित लागत का 80% | संभावित लागत का 70% | संभावित लागत का 90% |
पोर्टेबल स्प्रिंकलर | संभावित लागत का 55% | संभावित लागत का 45% | – |
मिनी स्प्रिंकलर | विभाग द्वारा निर्धारित | विभाग द्वारा निर्धारित | – |
योजना के तहत अनुदान की राशि डीबीटी (DBT) के माध्यम से सीधे किसानों के बैंक खाते में भेजी जाती है, जिससे बिचौलियों की भूमिका पूरी तरह समाप्त हो गई है। यह पारदर्शिता किसानों के बीच इस योजना के प्रति विश्वास को बढ़ा रही है। ड्रिप सिंचाई पद्धति के लिए अनुदान की सीमा न्यूनतम 0.5 एकड़ से लेकर अधिकतम 12.5 एकड़ तक निर्धारित की गई है, जबकि स्प्रिंकलर के लिए यह 1 एकड़ से 5 एकड़ तक है।
60% जल की बचत और 50% अधिक पैदावार: वैज्ञानिक पक्ष
कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि पारंपरिक रूप से खेतों को पानी से भर देने वाली ‘फ्लड इरिगेशन’ तकनीक अब बीते जमाने की बात हो गई है। सूक्ष्म सिंचाई प्रणाली एक ऐसी उन्नत व्यवस्था है जिसमें पौधों की जड़ों तक सीधे पाइपों के माध्यम से पानी पहुँचाया जाता है।
- जल संरक्षण: इस तकनीक से पानी की बर्बादी शून्य हो जाती है। वाष्पीकरण और रिसाव के कारण होने वाली हानि कम होने से लगभग 60 प्रतिशत जल की बचत होती है।
- फर्टिगेशन (Fertigation): ड्रिप सिंचाई के माध्यम से पानी के साथ-साथ उर्वरकों को भी सीधे पौधों की जड़ तक पहुँचाया जा सकता है। इससे उर्वरकों की खपत में 25 से 30 प्रतिशत की कमी आती है और वे अधिक प्रभावी ढंग से काम करते हैं।
- बंपर पैदावार: जब पौधों को सही मात्रा में, सही समय पर पानी और पोषक तत्व मिलते हैं, तो उनकी बढ़वार तेज होती है। इससे फसल की उत्पादकता में 40 से 50 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई है। साथ ही, उत्पाद की गुणवत्ता उच्च श्रेणी की होती है, जिससे बाजार में बेहतर दाम मिलते हैं।
- खरपतवार पर नियंत्रण: चूंकि पानी केवल पौधों की जड़ में जाता है, इसलिए बीच की खाली जमीन सूखी रहती है। इससे अनचाहे खरपतवार नहीं उगते और किसानों का निराई-गुड़ाई का खर्च भी बच जाता है।
आवेदन प्रक्रिया: बिहार कृषि ऐप और वेबसाइट से जुड़ना हुआ आसान
सरकार ने आवेदन की प्रक्रिया को पूरी तरह डिजिटल और सरल बना दिया है। इच्छुक किसान अब घर बैठे अपने स्मार्टफोन के जरिए आवेदन कर सकते हैं।
- बिहार कृषि ऐप: किसान गूगल प्ले स्टोर से विभाग का आधिकारिक ऐप डाउनलोड कर सकते हैं। वहां ‘सूक्ष्म सिंचाई योजना’ के विकल्प पर जाकर जरूरी दस्तावेज अपलोड करने होंगे।
- आधिकारिक वेबसाइट: विभाग की वेबसाइट के जरिए भी ऑनलाइन पंजीकरण कराया जा सकता है।
- दस्तावेज: आवेदन के लिए किसान का पंजीकरण नंबर (Registration ID), एलपीसी (LPC) या रसीद, आधार कार्ड और बैंक पासबुक की छायाप्रति अनिवार्य है।
- समूह लाभ: छोटे किसान, जिनके पास व्यक्तिगत रूप से न्यूनतम रकबा नहीं है, वे समूह बनाकर भी इस योजना का लाभ उठा सकते हैं।
एक बार अनुदान का लाभ लेने के बाद किसान को अगले 7 वर्षों तक पुनः उसी श्रेणी में लाभ नहीं मिलेगा। यह नियम इसलिए बनाया गया है ताकि राज्य के अधिक से अधिक नए किसानों को इस तकनीक का लाभ मिल सके।
जल स्रोतों का विकास: अन्य हस्तक्षेप की योजना
प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना केवल पाइप और फुहारों तक सीमित नहीं है। विभाग ने ‘अन्य हस्तक्षेप’ (Other Interventions) के माध्यम से जल स्रोतों के विकास पर भी ध्यान केंद्रित किया है। इसके अंतर्गत किसान अपने निजी खेतों में नलकूप, कुआं और तालाब जैसे जल स्रोतों के निर्माण के लिए भी सहायता प्राप्त कर सकते हैं। यह सुनिश्चित करने के लिए है कि सूक्ष्म सिंचाई प्रणाली के लिए पानी की निरंतर उपलब्धता बनी रहे। विशेष रूप से उन इलाकों में जहाँ नहरों का पानी नहीं पहुँच पाता, वहां निजी तालाब और कुएं खेती की तस्वीर बदल रहे हैं।
बदलते बिहार की नई कृषि कार्यशैली
बिहार की अर्थव्यवस्था का आधार कृषि है, और कृषि का आधार जल है। प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना (सूक्ष्म्) के तहत ड्रिप और स्प्रिंकलर को बढ़ावा देना राज्य के लिए एक ‘गेम चेंजर’ साबित हो सकता है। यह प्रणाली उन क्षेत्रों के लिए वरदान है जहाँ पानी की किल्लत है या जमीन ऊबड़-खाबड़ है। स्प्रिंकलर सिंचाई से ढलान वाली जमीनों पर भी समान रूप से पानी पहुँचाना संभव हो गया है।
कृषि विभाग के अधिकारियों का कहना है कि यह योजना केवल सब्सिडी देने के बारे में नहीं है, बल्कि यह किसानों को एक उद्यमी बनाने की दिशा में प्रयास है। जब लागत कम होगी और पैदावार बढ़ेगी, तो किसान आर्थिक रूप से सशक्त होंगे। विभाग अब प्रखंड स्तर पर कैंप लगाकर किसानों को इस तकनीक के संचालन और रखरखाव का प्रशिक्षण भी दे रहा है।
राज्य सरकार की यह पहल राष्ट्रीय स्तर पर भी सराही जा रही है। बिहार के किसान अब धीरे-धीरे अपनी पुरानी आदतों को छोड़कर वैज्ञानिक खेती की ओर बढ़ रहे हैं। कृषि विभाग ने अपील की है कि किसान अंतिम समय की भीड़ से बचने के लिए जल्द से जल्द आवेदन करें और इस भारी अनुदान का लाभ उठाकर अपनी खेती को आधुनिक और समृद्ध बनाएं। आने वाले समय में, ये छोटी-छोटी बूंदें बिहार के खेतों में समृद्धि की एक बड़ी लहर पैदा करने वाली हैं।


