
पटना। देश के ग्रामीण आर्थिक ढांचे में पिछले दो दशकों से रीढ़ की हड्डी रही महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा) अब इतिहास के पन्नों में दर्ज होने जा रही है। भारत सरकार ने ग्रामीण श्रमशक्ति को अधिक सशक्त, डिजिटल और सुरक्षित बनाने के लिए एक युगांतरकारी निर्णय लिया है। 1 जुलाई 2026 से पूरे देश के साथ-साथ बिहार के गांवों में भी ‘विकसित भारत-रोजगार और आजीविका मिशन (ग्रामीण)’ यानी ‘वीबी-जी रामजी’ अधिनियम 2025 को आधिकारिक रूप से लागू कर दिया जाएगा। यह नया कानून न केवल पुरानी व्यवस्था की खामियों को दूर करेगा, बल्कि श्रमिकों को मिलने वाले रोजगार की गारंटी को भी 100 दिनों से बढ़ाकर 125 दिन कर देगा। इस बदलाव का सबसे क्रांतिकारी पहलू यह है कि अब मजदूरों को काम मांगने के लिए पंचायत कार्यालयों के चक्कर नहीं काटने होंगे, बल्कि वे अपने मोबाइल फोन से एक विशेष ऐप के जरिए सीधे रोजगार की मांग कर सकेंगे।
100 नहीं अब 125 दिन की गारंटी: ग्रामीण आय को मिलेगा नया संबल
वीबी-जी रामजी अधिनियम के केंद्र में ग्रामीण परिवारों की आय सुरक्षा है। पहले की मनरेगा व्यवस्था में एक वित्तीय वर्ष में केवल 100 दिनों के अकुशल श्रम की गारंटी थी, जिसे अब बढ़ाकर 125 दिन कर दिया गया है। यह 25 दिनों का अतिरिक्त रोजगार उन परिवारों के लिए संजीवनी साबित होगा जो पूरी तरह से मजदूरी पर निर्भर हैं।
मनरेगा आयुक्त अभिलाषा कुमारी शर्मा ने इस नए कानून की बारीकियों पर प्रकाश डालते हुए बताया कि इस विस्तार का उद्देश्य केवल संख्या बढ़ाना नहीं है, बल्कि ग्रामीण परिवारों को आर्थिक रूप से इतना सक्षम बनाना है कि वे विस्तारित रोजगार अवसरों के माध्यम से आत्मनिर्भर बन सकें। विकसित भारत के संकल्प को पूरा करने की दिशा में यह कानून ग्रामीण क्षेत्रों में तीव्र विकास की गति को समर्थन देगा। इससे न केवल पलायन रुकेगा, बल्कि गांवों के भीतर ही एक मजबूत लेबर मार्केट तैयार होगा जो स्थानीय स्तर पर टिकाऊ संपत्तियों का निर्माण करेगा।
डिजिटल सशक्तिकरण: ऐप के जरिए ‘काम’ और ‘बेरोजगारी भत्ता’ का कानूनी अधिकार
नए कानून की सबसे बड़ी विशेषता इसकी तकनीक-सक्षम प्रशासनिक व्यवस्था है। ‘वीबी-जी रामजी’ अधिनियम के तहत पहली बार श्रमिकों को ऑनलाइन आवेदन की सुविधा प्रदान की गई है। अकुशल श्रम कार्य के इच्छुक कोई भी ग्रामीण अब मौखिक या लिखित आवेदन की पारंपरिक पद्धति के अलावा डिजिटल प्लेटफॉर्म का उपयोग कर सकेंगे। सरकार ने इसके लिए एक विशेष ‘श्रमिक पोर्टल’ और मोबाइल ऐप तैयार किया है।
इस कानून की सबसे महत्वपूर्ण कानूनी सुरक्षा ‘बेरोजगारी भत्ता’ है। यदि कोई श्रमिक ऐप या लिखित माध्यम से काम की मांग करता है और उसे निर्धारित समय-सीमा (आमतौर पर 15 दिन) के भीतर रोजगार उपलब्ध नहीं कराया जाता है, तो राज्य सरकार को उसे नियमानुसार बेरोजगारी भत्ते का भुगतान करना होगा। यह प्रावधान अधिकारियों की जवाबदेही तय करेगा और यह सुनिश्चित करेगा कि काम का अधिकार केवल कागजों तक सीमित न रहे। डिजिटल आवेदन की वजह से अब बिचौलियों का हस्तक्षेप भी न्यूनतम हो जाएगा, क्योंकि काम की मांग सीधे सर्वर पर दर्ज होगी और उसकी ट्रैकिंग आसान होगी।
पारदर्शिता की नई मिसाल: डीबीटी और सामाजिक अंकेक्षण
भ्रष्टाचार और भुगतान में देरी मनरेगा की सबसे बड़ी चुनौतियों में से रही है। वीबी-जी रामजी अधिनियम में इन समस्याओं का ठोस समाधान निकाला गया है। मजदूरों के पारिश्रमिक का भुगतान अब पूरी तरह से प्रत्यक्ष लाभ अंतरण (DBT) के जरिए होगा। मजदूरी सीधे श्रमिक के आधार से जुड़े बैंक खाते में भेजी जाएगी। इससे न केवल फर्जी हाजिरी पर लगाम लगेगी, बल्कि भुगतान प्रक्रिया अधिक पारदर्शी और समयबद्ध होगी।
इसके साथ ही, कानून में ‘मजबूत सामाजिक अंकेक्षण’ (Social Audit) की व्यवस्था अनिवार्य की गई है। गांव में होने वाले हर काम का लेखा-जोखा और गुणवत्ता की जांच अब खुद ग्रामीण समुदाय करेगा। सामुदायिक भागीदारी को बढ़ावा देने के लिए ग्राम सभाओं को अधिक अधिकार दिए गए हैं। इससे योजनाओं के कार्यान्वयन में स्थानीय लोगों की राय को प्राथमिकता मिलेगी और ग्रामीण संपत्तियों के रखरखाव में भी लोग अधिक जिम्मेदारी महसूस करेंगे।
जलवायु अनुकूलता और परिसंपत्ति निर्माण पर विशेष ध्यान
पुराने मनरेगा और नए वीबी-जी रामजी अधिनियम के बीच एक बड़ा अंतर ‘परिसंपत्ति निर्माण’ (Asset Creation) की गुणवत्ता को लेकर है। इस नए मिशन के तहत केवल गड्ढे खोदना या मिट्टी का काम करना ही प्राथमिकता नहीं होगी। अधिनियम में उन कार्यों को वरीयता दी गई है जो भविष्य की चुनौतियों से निपटने में सहायक हों:
- जल संरक्षण और सिंचाई: वर्षा जल संचयन, चेक डैम का निर्माण और पारंपरिक जल निकायों का पुनरुद्धार।
- जलवायु अनुकूल विकास: वृक्षारोपण और मिट्टी के कटाव को रोकने वाले प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण।
- आजीविका संवर्धन: पशुपालन के लिए शेड निर्माण, मत्स्य पालन के लिए तालाबों का सौंदर्यीकरण और कृषि आधारित बुनियादी ढांचा।
- बुनियादी ढांचा: ग्रामीण सड़कों का ऐसा निर्माण जो लंबे समय तक टिकाऊ रहे और गांवों को मुख्य बाजारों से जोड़े।
ग्रामीण विकास का नया रोडमैप: 1 जुलाई से बदलेगी तस्वीर
1 जुलाई 2026 से लागू होने वाला यह कानून अभिसरण (Convergence) आधारित योजना पर आधारित है। इसका मतलब है कि ग्रामीण विकास के विभिन्न विभाग अब मिलकर काम करेंगे। उदाहरण के तौर पर, यदि कृषि विभाग को किसी विशेष क्षेत्र में नहर की जरूरत है, तो श्रम का बजट वीबी-जी रामजी कानून से आएगा और तकनीकी सहयोग कृषि विभाग देगा। इस तरह के ‘सिनर्जी’ से सरकारी धन का बेहतर उपयोग होगा और गांवों में स्थाई विकास के काम दिखेंगे।
अभिलाषा कुमारी शर्मा ने बताया कि इस कानून में ‘प्रौद्योगिकी सक्षम प्रशासन’ का उपयोग केवल आवेदन तक सीमित नहीं है, बल्कि काम की गुणवत्ता की जांच के लिए जियो-टैगिंग और ड्रोन सर्विलांस का भी प्रावधान किया जा सकता है। इससे यह सुनिश्चित होगा कि जो काम कागजों पर दिखाया जा रहा है, वह वास्तव में जमीन पर भी मौजूद है। ग्रामीण परिवारों के लिए यह केवल एक सरकारी योजना नहीं, बल्कि स्वाभिमान के साथ जीने का एक नया अवसर है।
विकसित भारत के विजन को ग्रामीण धरातल पर उतारने के लिए यह अधिनियम एक मील का पत्थर साबित होगा। 125 दिनों के सुनिश्चित रोजगार और ऑनलाइन व्यवस्था के आने से बिहार के उन लाखों मजदूरों को बड़ी राहत मिलेगी जो काम की तलाश में भटकते थे। अब राज्य सरकार की जिम्मेदारी होगी कि वह इस नए कानून के तहत मिलने वाले ‘बेरोजगारी भत्ते’ और ‘काम के अधिकार’ को हर ग्रामीण तक सुगमता से पहुँचाए। 1 जुलाई से शुरू होने वाला यह सफर ग्रामीण अर्थव्यवस्था के आधुनिकीकरण की दिशा में एक बड़ा प्रस्थान बिंदु बनेगा।


