
पटना। बिहार के आधारभूत ढांचे (Infrastructure) को नई ऊंचाइयों पर ले जाने का दावा करने वाली अरबों रुपये की महत्वाकांक्षी योजनाएं वर्तमान में केंद्र सरकार की फाइलों के गलियारों में भटक रही हैं। सोमवार, 20 अप्रैल 2026 की ताजा रिपोर्ट के अनुसार, राज्य की छह प्रमुख राष्ट्रीय राजमार्ग (NH) परियोजनाएं, जिनकी कुल अनुमानित लागत 51 हजार करोड़ रुपये से भी अधिक है, दिल्ली से ‘अंतिम हरी झंडी’ मिलने की बाट जोह रही हैं। इन परियोजनाओं को तकनीकी और वित्तीय स्तर पर तो प्रारंभिक सहमति मिल चुकी है, लेकिन जब तक केंद्रीय कैबिनेट इन पर अपनी मुहर नहीं लगा देता, तब तक जमीन पर एक इंच भी काम शुरू होना मुमकिन नहीं दिख रहा है। विडंबना यह है कि इनमें बिहार का पहला ‘पटना-पूर्णिया एक्सप्रेस-वे’ भी शामिल है, जिसे प्रदेश की तकदीर बदलने वाला प्रोजेक्ट माना जा रहा है। प्रशासनिक उदासीनता का आलम यह है कि महत्वपूर्ण समीक्षा बैठकों में भी इन परियोजनाओं की प्रगति पर कोई गंभीर चर्चा नहीं हो रही है, जिससे विकास की रफ्तार पर ‘लालफीताशाही’ का ग्रहण लगता नजर आ रहा है।
पटना-पूर्णिया एक्सप्रेस-वे: तीन घंटे का सपना अभी मीलों दूर
इस पूरी सूची में सबसे महत्वपूर्ण परियोजना पटना से पूर्णिया के बीच बनने वाला एक्सप्रेस-वे है। यह बिहार का पहला ऐसा एक्सप्रेस-वे होगा जो राज्य के पूर्वी हिस्से को राजधानी से सीधा और सुगम संपर्क प्रदान करेगा।
- परियोजना का स्वरूप: चार लेन वाले इस एक्सप्रेस-वे की कुल लंबाई 244.961 किलोमीटर निर्धारित की गई है।
- बजट और प्रभाव: इसके निर्माण पर लगभग 31987.11 करोड़ रुपये खर्च होने का अनुमान है।
- लाभ: वर्तमान में पटना से पूर्णिया जाने में लगने वाला समय इस एक्सप्रेस-वे के बनने के बाद घटकर मात्र तीन घंटे रह जाएगा। यह न केवल आम यात्रियों के लिए राहत भरा होगा, बल्कि कोसी और सीमांचल क्षेत्र की व्यापारिक गतिविधियों के लिए ‘लाइफलाइन’ साबित होगा। लेकिन कैबिनेट की मंजूरी न मिलने से फिलहाल यह केवल कागजी नक्शों तक ही सीमित है।
अनीसाबाद-दीदारगंज एलिवेटेड रोड: पटना को जाम से मुक्ति की तलाश
राजधानी पटना की सबसे बड़ी समस्या ‘ट्रैफिक जाम’ है, और इस समस्या का समाधान अनीसाबाद से दीदारगंज के बीच बनने वाली छह लेन की एलिवेटेड रोड में छिपा है।
- लागत और लंबाई: महज 13.41 किलोमीटर लंबी इस सड़क के निर्माण पर 8455.86 करोड़ रुपये की भारी-भरकम राशि खर्च होनी है।
- महत्व: यह सड़क शहर के ऊपर से गुजरेगी, जिससे शहरी ट्रैफिक को बिना छुए बाहरी वाहन आसानी से निकल सकेंगे। कई राष्ट्रीय राजमार्गों (NH) का इससे जुड़ाव होने के कारण पटना में प्रवेश करने और बाहर निकलने की प्रक्रिया बेहद आसान हो जाएगी। वित्तीय मंजूरी मिलने के बावजूद केंद्रीय कैबिनेट में फाइल दबी होने के कारण पटनावासियों का यह ‘स्मार्ट सफर’ का इंतजार खत्म नहीं हो रहा है।
वाराणसी-कोलकाता कॉरिडोर: हल्दिया बंदरगाह तक आसान पहुँच
तीसरी बड़ी परियोजना वाराणसी-रांची-कोलकाता छह लेन सड़क से जुड़ी है। इसके दो पैकेजों को एक में मिलाते हुए वित्तीय मंजूरी दी गई है।
- सोन नदी पर पुल: 41.955 किलोमीटर लंबे इस हिस्से के निर्माण पर 2897.16 करोड़ रुपये खर्च होंगे, जिसमें सोन नदी पर एक भव्य पुल का निर्माण भी शामिल है।
- आर्थिक लाभ: इसके पूर्ण होने पर वाराणसी से कोलकाता की दूरी मात्र सात घंटे में तय की जा सकेगी। सबसे बड़ा लाभ यह होगा कि बिहार के उद्योगों को हल्दिया बंदरगाह तक सीधी और सुगम पहुँच मिलेगी, जिससे निर्यात और आयात का खर्च काफी कम हो जाएगा।
क्या है ‘HAM’ मोड और मंजूरी का तकनीकी पेच?
केंद्रीय वित्त मंत्रालय के आर्थिक कार्य विभाग की ‘पीपीपीएसी’ (लोक निजी भागीदारी अनुशंसा समिति) ने इन सभी छह परियोजनाओं को ‘हैम’ (Hybrid Annuity Model) मोड में बनाने की सिफारिश की है।
हैम मोड का गणित:
- इस मॉडल में निर्माण करने वाली एजेंसी को कुल लागत का 60 प्रतिशत हिस्सा खुद वहन करना पड़ता है।
- शेष 40 प्रतिशत राशि सरकार द्वारा दी जाती है।
- निर्माण एजेंसी अपनी लागत की वसूली भविष्य में टोल टैक्स (Toll) के माध्यम से करती है।
तकनीकी पेच यह है कि जब तक केंद्रीय कैबिनेट इस पर अंतिम मुहर नहीं लगाता, तब तक ‘3D’ (जमीन अधिग्रहण की अंतिम प्रक्रिया) शुरू नहीं की जा सकती। बिना कैबिनेट मंजूरी के जमीन अधिग्रहण के लिए अधिसूचना जारी नहीं होती और न ही संबंधित अधिकारी इस पर गंभीरता से काम करते हैं। यही कारण है कि वित्तीय सहमति मिलने के बाद भी ये प्रोजेक्ट्स ‘स्टैंडबाय’ मोड पर हैं।
अधिकारियों की चुप्पी और बैठकों की उदासीनता
रिपोर्ट में सबसे चौंकाने वाला खुलासा प्रशासनिक स्तर पर व्याप्त उदासीनता को लेकर हुआ है। चाहे केंद्र सरकार की बैठकें हों या राज्य सरकार के स्तर पर होने वाली समीक्षाएं, इन छह बड़ी परियोजनाओं की प्रगति पर अब चर्चा होना लगभग बंद हो गया है।
संबंधित विभागों के अधिकारी इस मामले पर टालमटोल का रवैया अपना रहे हैं। जब भी केंद्र या राज्य की ओर से कोई पत्राचार होता है, तो फाइलों को एक विभाग से दूसरे विभाग में घुमाया जाता है। कैबिनेट मंजूरी में देरी का फायदा उठाकर अधिकारी जमीन अधिग्रहण जैसे कठिन कार्यों से बच रहे हैं। नियम यह है कि कैबिनेट मंजूरी मिलते ही परियोजना को समय पर पूरा करने का दबाव बढ़ जाता है, शायद इसीलिए अधिकारी इस दिशा में सक्रियता नहीं दिखा रहे हैं। यदि इन परियोजनाओं पर जल्द फैसला नहीं लिया गया, तो निर्माण सामग्री की बढ़ती कीमतों के कारण लागत में और अधिक इजाफा हो सकता है, जिसका सीधा बोझ जनता की जेब पर पड़ेगा।
निष्कर्ष: बिहार के विकास के लिए ‘पॉलिटिकल पुश’ की जरूरत
20 अप्रैल 2026 की यह स्थिति बिहार के राजनैतिक और प्रशासनिक नेतृत्व के लिए एक बड़ी चुनौती है। 51 हजार करोड़ रुपये की ये सड़क योजनाएं केवल कंक्रीट के ढांचे नहीं हैं, बल्कि बिहार की नई पीढ़ी के लिए रोजगार, व्यापार और बेहतर भविष्य का आधार हैं। जब तक पटना से पूर्णिया तक का एक्सप्रेस-वे और वाराणसी-कोलकाता कॉरिडोर धरातल पर नहीं उतरते, तब तक बिहार को ‘औद्योगिक हब’ बनाने का सपना अधूरा ही रहेगा।
अब जरूरत है कि केंद्र और राज्य सरकार के बीच बेहतर समन्वय स्थापित कर इन छह फाइलों को कैबिनेट की मेज से निकालकर जमीन तक पहुँचाया जाए। मुख्यमंत्री और संबंधित मंत्रियों को इस मामले में निजी हस्तक्षेप करना होगा ताकि दिल्ली में रुकी हुई मंजूरी का रास्ता साफ हो सके। बिहार की जनता अब फाइलों की दौड़ नहीं, बल्कि सड़कों पर दौड़ते वाहनों और अपनी यात्रा को सुगम बनते देखना चाहती है। यदि यह सुस्ती बरकरार रही, तो विकास के ये ‘महाप्रोजेक्ट’ समय की धूल में दबकर अपनी सार्थकता खो सकते हैं।


