बिहार में खत्म होगी शराबबंदी? नई सरकार के बीच उठी समीक्षा की मांग, NDA विधायक का बड़ा बयान

बिहार में नई राजनीतिक परिस्थितियों के बीच शराबबंदी कानून एक बार फिर चर्चा के केंद्र में आ गया है। राज्य में नेतृत्व परिवर्तन के बाद अब सत्तापक्ष के भीतर से ही इस कानून की समीक्षा की मांग उठने लगी है। राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) से जुड़े विधायक ने इस मुद्दे पर खुलकर अपनी राय रखते हुए सरकार से व्यापक समीक्षा की अपील की है।

उन्होंने साफ तौर पर कहा है कि शराबबंदी कानून को लागू हुए कई साल हो चुके हैं और अब समय आ गया है कि इसके प्रभाव, चुनौतियों और वास्तविक स्थिति का निष्पक्ष आकलन किया जाए। उनका मानना है कि यह सिर्फ एक कानून नहीं बल्कि सामाजिक, आर्थिक और प्रशासनिक स्तर पर असर डालने वाली नीति है, इसलिए इसकी समीक्षा बेहद जरूरी है।

माधव आनंद ने बताया कि उन्होंने यह मुद्दा पहले भी विधानसभा के अंदर उठाया था, जब राज्य की कमान के हाथों में थी। उस समय भी उन्होंने शराबबंदी के विभिन्न पहलुओं पर चर्चा की मांग की थी। हालांकि, उस दौरान इस मुद्दे पर विधायकों के बीच मतभेद देखने को मिला था—कुछ ने इसका समर्थन किया तो कुछ ने इसका विरोध किया।

अब जबकि राज्य में नई सरकार बनी है और नेतृत्व के हाथों में आया है, ऐसे में इस मुद्दे को लेकर उम्मीदें और बहस दोनों तेज हो गई हैं। विधायक का कहना है कि नई सरकार नई सोच और नई ऊर्जा के साथ काम कर रही है, इसलिए यह सही समय है कि इस विषय पर गंभीरता से विचार किया जाए।

उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि वे इस मुद्दे को लेकर केवल राजनीतिक बयानबाजी नहीं कर रहे हैं, बल्कि यह एक गंभीर जनहित का विषय है। उनका कहना है कि सदन के अंदर जिस गंभीरता के साथ उन्होंने इस मुद्दे को उठाया था, वही गंभीरता वे आज भी बनाए हुए हैं और चाहते हैं कि सरकार इसे प्राथमिकता के आधार पर देखे।

शराबबंदी कानून को लेकर सबसे बड़ा तर्क आर्थिक प्रभाव को लेकर सामने आया है। विधायक माधव आनंद का कहना है कि बिहार जैसे लैंड-लॉक राज्य में पूर्ण शराबबंदी व्यवहारिक रूप से सफल नहीं हो पा रही है। उन्होंने कहा कि इस नीति के कारण राज्य को राजस्व का भारी नुकसान उठाना पड़ रहा है।

उनके अनुसार, बिहार में शराबबंदी लागू होने के बाद पड़ोसी राज्यों—झारखंड, पश्चिम बंगाल और उत्तर प्रदेश—को इसका अप्रत्यक्ष लाभ मिल रहा है। साथ ही नेपाल जैसे सीमावर्ती क्षेत्रों में भी शराब की बिक्री बढ़ी है, जिससे बिहार के राजस्व को नुकसान हो रहा है।

उन्होंने यह भी कहा कि अवैध शराब का कारोबार पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है, बल्कि कई जगहों पर यह और जटिल रूप में सामने आया है। ऐसे में यह जरूरी हो जाता है कि सरकार इस पूरे तंत्र की समीक्षा करे और यह समझे कि नीति के वास्तविक परिणाम क्या हैं।

सामाजिक दृष्टिकोण से देखा जाए तो शराबबंदी का उद्देश्य समाज में सुधार लाना था, खासकर महिलाओं और गरीब वर्ग के हितों को ध्यान में रखते हुए इसे लागू किया गया था। कई क्षेत्रों में इसका सकारात्मक असर भी देखने को मिला, लेकिन साथ ही कई चुनौतियां भी सामने आई हैं, जिन्हें नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

राजनीतिक जानकारों का मानना है कि शराबबंदी बिहार की राजनीति का एक संवेदनशील मुद्दा रहा है। इस पर कोई भी बड़ा फैसला सीधे तौर पर जनता और राजनीतिक समीकरणों को प्रभावित कर सकता है। ऐसे में सरकार के सामने यह चुनौती होगी कि वह संतुलित और सोच-समझकर निर्णय ले।

माधव आनंद ने सरकार से अपील करते हुए कहा कि सभी पहलुओं—आर्थिक, सामाजिक और प्रशासनिक—को ध्यान में रखते हुए एक व्यापक समीक्षा की जानी चाहिए। उन्होंने उम्मीद जताई कि नई सरकार इस दिशा में ठोस कदम उठाएगी और जनहित में उचित निर्णय लेगी।

वहीं, इस बयान के बाद राजनीतिक गलियारों में चर्चाएं तेज हो गई हैं। विपक्ष भी इस मुद्दे पर अपनी प्रतिक्रिया दे सकता है और आने वाले दिनों में यह बहस और तेज होने की संभावना है।

फिलहाल यह स्पष्ट नहीं है कि सरकार इस मांग पर क्या रुख अपनाएगी, लेकिन इतना जरूर है कि शराबबंदी कानून एक बार फिर बिहार की राजनीति के केंद्र में आ गया है। आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि क्या सरकार इस कानून में बदलाव करती है, इसे और सख्त बनाती है या फिर यथावत रखती है।

इस पूरे घटनाक्रम ने यह संकेत जरूर दे दिया है कि बिहार में शराबबंदी अब केवल एक नीति नहीं बल्कि एक बड़ा राजनीतिक और सामाजिक मुद्दा बन चुका है, जिस पर फैसला लेना आसान नहीं होगा।

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