पटना | 26 फरवरी, 2026: बिहार में बांस अब केवल पारंपरिक टोकरी और छप्पर तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि इसे एक मजबूत औद्योगिक आधार देने की तैयारी शुरू हो गई है। बुधवार को राजधानी पटना के मीठापुर स्थित कृषि भवन में ‘बिहार बांस अर्थव्यवस्था शिखर सम्मेलन 2026’ का भव्य आयोजन किया गया। इस सम्मेलन के जरिए राज्य सरकार ने संदेश दिया है कि बांस की खेती से ग्रामीण अर्थव्यवस्था में रोजगार और आमदनी की नई लहर पैदा की जाएगी।
शिखर सम्मेलन की मुख्य बातें: रोजगार और निर्यात पर जोर
कृषि मंत्री राम कृपाल यादव ने सम्मेलन का उद्घाटन करते हुए कई महत्वपूर्ण घोषणाएं कीं:
- कच्चे माल से फिनिश्ड गुड्स तक: बिहार अब केवल कच्चा बांस बेचने वाला राज्य नहीं रहेगा, बल्कि यहाँ से सोफा, खिलौने और घरेलू सजावट की वस्तुओं का निर्यात किया जाएगा।
- प्रोत्साहन और बाजार: किसानों और कारीगरों को बेहतर मूल्य दिलाने के लिए प्रशिक्षण, आधुनिक उपकरण और मजबूत मार्केटिंग चैन उपलब्ध कराई जाएगी।
- सीखने का मंच: इस पहले बांस शिखर सम्मेलन में देश के विभिन्न राज्यों की सहकारी संस्थाओं और सफल मॉडलों को समझने का प्रयास किया गया है।
रणनीति: प्राथमिक जिलों का होगा चयन
कृषि विभाग ने बांस उत्पादन को वैज्ञानिक तरीके से बढ़ाने के लिए एक व्यवस्थित रोडमैप तैयार किया है:
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कार्ययोजना का हिस्सा |
विवरण |
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जिला चयन |
बांस उत्पादन के लिए राज्य के ‘प्राथमिक जिलों’ की पहचान की जाएगी। |
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बुनियादी ढांचा |
चयनित क्षेत्रों में नर्सरी, प्रसंस्करण (Processing) और मार्केटिंग की व्यवस्था होगी। |
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सांस्कृतिक जुड़ाव |
कृषि विभाग बांस के घटते प्रयोग को आधुनिक जरूरतों के अनुसार फिर से विकसित करेगा। |
बांस: किसानों के लिए ‘ATM’ की तरह
सम्मेलन में आए विशेषज्ञों ने बांस की खेती को आर्थिक सुरक्षा का बड़ा जरिया बताया:
- अतिरिक्त आमदनी: ICAR के उपनिदेशक डॉ. संजय कुमार सिंह ने बांस को ‘किसानों का ATM’ करार दिया।
- मेढ़ पर खेती: किसानों को प्रोत्साहित किया गया कि वे अपने खेत के मुख्य हिस्सों को छोड़े बिना, केवल मेढ़ (bunds) पर बांस उगाकर भी अच्छी कमाई कर सकते हैं।
- विविध उत्पाद: प्रदर्शनी में बांस से बने फर्नीचर, कलम स्टैंड, डलिया और सजावटी चीजों ने साबित किया कि इसमें मूल्य संवर्धन (Value Addition) की अपार संभावनाएं हैं।
VOB का नजरिया: क्या बिहार बन पाएगा ‘बैम्बू हब’?
बिहार की संस्कृति में बांस जन्म से लेकर मृत्यु तक रचा-बसा है। कृषि विभाग का इसे ‘इकोनॉमी’ से जोड़ना एक सराहनीय पहल है, क्योंकि उत्तर बिहार जैसे क्षेत्रों में बांस प्रचुर मात्रा में उपलब्ध है। अगर सरकार वास्तव में केरल जैसे मॉडलों को लागू कर स्थानीय कारीगरों को सोफा और फर्नीचर बनाने का प्रशिक्षण और ग्लोबल मार्केट दिला पाती है, तो यह पलायन रोकने की दिशा में एक बड़ा हथियार साबित होगा।
“बांस की खेती पर्यावरण के साथ-साथ जेब के लिए भी हरी-भरी है। बस जरूरत है इसे ‘पिछड़ा उत्पाद’ समझने की मानसिकता को बदलने की।”
ब्यूरो रिपोर्ट, द वॉयस ऑफ बिहार (VOB)।


