बिहार में शुरू हुआ ‘खेत बचाओ अभियान’, प्राकृतिक खेती को मिलेगा बढ़ावा; किसानों को 4 हजार रुपये प्रति एकड़ प्रोत्साहन

पटना। बिहार में मिट्टी की गिरती गुणवत्ता, रासायनिक उर्वरकों के बढ़ते उपयोग और खेती की बढ़ती लागत को देखते हुए राज्य सरकार ने एक बड़े जनजागरण अभियान की शुरुआत की है। कृषि विभाग द्वारा शुरू किए गए ‘खेत बचाओ अभियान’ का उद्देश्य किसानों को संतुलित उर्वरक उपयोग, प्राकृतिक खेती और आधुनिक कृषि तकनीकों के प्रति जागरूक करना है। यह अभियान पूरे राज्य में 30 जून तक चलाया जाएगा और इसके माध्यम से गांव-गांव तक किसानों को मिट्टी की सेहत बचाने तथा खेती को अधिक टिकाऊ बनाने का संदेश दिया जाएगा।

पटना के मीठापुर स्थित कृषि भवन से अभियान का शुभारंभ करते हुए कृषि मंत्री विजय कुमार सिन्हा ने किसानों से अपील की कि वे अपनी कुल कृषि भूमि के कम से कम एक चौथाई हिस्से पर प्राकृतिक खेती की शुरुआत करें। उन्होंने कहा कि यह केवल खेती की पद्धति में बदलाव नहीं है, बल्कि स्वास्थ्य, पर्यावरण और भविष्य की पीढ़ियों को सुरक्षित बनाने की दिशा में एक बड़ा कदम है।

प्राकृतिक खेती से बदलेगी खेतों की तस्वीर

अभियान के शुभारंभ अवसर पर बड़ी संख्या में उपस्थित किसानों को संबोधित करते हुए कृषि मंत्री ने कहा कि बिहार की धरती से एक नई कृषि क्रांति की शुरुआत हो रही है। उनका कहना था कि लंबे समय से रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों के अत्यधिक उपयोग ने मिट्टी की उर्वरता को प्रभावित किया है, जिससे उत्पादन लागत बढ़ने के साथ-साथ पर्यावरण और मानव स्वास्थ्य पर भी नकारात्मक असर पड़ा है।

उन्होंने कहा कि प्राकृतिक खेती के माध्यम से खेतों की उत्पादकता को सुरक्षित रखा जा सकता है। गोबर, गोमूत्र, जीवामृत, बीजामृत और अन्य जैविक संसाधनों के उपयोग से तैयार फसलें न केवल अधिक सुरक्षित होती हैं, बल्कि उनका प्रभाव मानव स्वास्थ्य पर भी सकारात्मक पड़ता है।

कृषि मंत्री ने कहा कि यदि किसान प्राकृतिक खेती को अपनाते हैं तो मिट्टी की गुणवत्ता में सुधार होगा, भूजल प्रदूषण कम होगा और खेती का खर्च भी घटेगा। इससे किसानों की आय बढ़ाने में भी मदद मिलेगी।

मिट्टी की बिगड़ती सेहत पर चिंता

कार्यक्रम के दौरान कृषि मंत्री ने मिट्टी परीक्षण रिपोर्टों का उल्लेख करते हुए कहा कि राज्य के कई हिस्सों में मिट्टी के पोषक तत्वों का संतुलन लगातार बिगड़ रहा है। उन्होंने बताया कि लगातार एक ही प्रकार की खेती और रासायनिक उर्वरकों के अनियंत्रित उपयोग से भूमि की प्राकृतिक उर्वरता प्रभावित हुई है।

विशेषज्ञों के अनुसार मिट्टी में जैविक कार्बन की मात्रा कम होने से उत्पादन क्षमता पर असर पड़ता है। ऐसे में किसानों को मृदा स्वास्थ्य कार्ड के आधार पर ही उर्वरकों का उपयोग करना चाहिए।

उन्होंने कहा कि ‘खेत बचाओ अभियान’ का मूल उद्देश्य किसानों को यह समझाना है कि अधिक उर्वरक डालना हमेशा अधिक उत्पादन की गारंटी नहीं देता। सही मात्रा और सही समय पर उर्वरकों का प्रयोग ही लाभकारी होता है।

‘सही खाद, सही सलाह’ होगा अभियान का मुख्य मंत्र

कृषि विभाग ने इस अभियान का मुख्य संदेश ‘कम खाद, सही खाद और सही सलाह’ रखा है। इसके तहत किसानों को वैज्ञानिक तरीके से खेती करने के लिए प्रेरित किया जाएगा।

अभियान के दौरान कृषि वैज्ञानिक और विभागीय अधिकारी किसानों को बताएंगे कि किस फसल के लिए कितनी मात्रा में उर्वरक आवश्यक है। साथ ही उन्हें मिट्टी परीक्षण के महत्व और मृदा स्वास्थ्य कार्ड के उपयोग के बारे में भी जानकारी दी जाएगी।

विशेषज्ञों का कहना है कि संतुलित उर्वरक उपयोग से न केवल उत्पादन लागत कम होती है बल्कि मिट्टी की गुणवत्ता भी लंबे समय तक बनी रहती है।

प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने के लिए विशेष योजना

राज्य सरकार प्राकृतिक खेती को प्रोत्साहित करने के लिए राष्ट्रीय प्राकृतिक कृषि मिशन के तहत कई योजनाएं संचालित कर रही है। कृषि मंत्री ने बताया कि राज्य के सभी 38 जिलों में क्लस्टर आधारित मॉडल पर प्राकृतिक खेती को बढ़ावा दिया जा रहा है।

इस योजना के अंतर्गत किसानों को तकनीकी सहायता, प्रशिक्षण और आर्थिक सहयोग प्रदान किया जाएगा। सरकार का लक्ष्य है कि आने वाले वर्षों में अधिक से अधिक किसान प्राकृतिक खेती से जुड़ें और रासायनिक खेती पर निर्भरता कम हो।

800 कृषि सखी निभाएंगी अहम भूमिका

प्राकृतिक खेती के विस्तार में महिलाओं की भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए राज्य सरकार ने 800 कृषि सखियों का चयन किया है। ये जीविका समूहों से जुड़ी महिलाएं हैं, जिन्हें विशेष प्रशिक्षण देकर गांवों में प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने की जिम्मेदारी सौंपी गई है।

इन कृषि सखियों को प्रति माह 5 हजार रुपये की प्रोत्साहन राशि भी दी जा रही है। उनका काम किसानों को प्राकृतिक खेती की तकनीकों की जानकारी देना, प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित करना और खेत स्तर पर मार्गदर्शन प्रदान करना होगा।

सरकार का मानना है कि महिला समूहों की सक्रिय भागीदारी से प्राकृतिक खेती आंदोलन को जमीनी स्तर पर मजबूत आधार मिलेगा।

किसानों को मिलेगा आर्थिक प्रोत्साहन

प्राकृतिक खेती अपनाने वाले किसानों को सरकार की ओर से आर्थिक सहायता भी प्रदान की जाएगी। कृषि मंत्री ने बताया कि योजना के तहत किसानों को प्रति एकड़ 4 हजार रुपये तक की प्रोत्साहन राशि दी जाएगी। यह सहायता अधिकतम एक एकड़ भूमि के लिए उपलब्ध होगी।

इसके अलावा जैव उत्पादन संसाधन केंद्र (बीआरसी) की स्थापना के लिए एक लाख रुपये तक की सहायता का प्रावधान किया गया है। इससे गांव स्तर पर प्राकृतिक खेती के लिए आवश्यक जैविक उत्पादों का उत्पादन बढ़ाया जा सकेगा।

सरकार का मानना है कि आर्थिक सहायता मिलने से किसानों का रुझान प्राकृतिक खेती की ओर तेजी से बढ़ेगा।

5700 हेक्टेयर क्षेत्र में होगा विस्तार

वित्तीय वर्ष 2026-27 के लिए राज्य सरकार ने प्राकृतिक खेती के विस्तार की महत्वाकांक्षी योजना तैयार की है। इसके तहत बिहार के विभिन्न जिलों में 114 नए क्लस्टर विकसित किए जाएंगे।

इन क्लस्टरों के माध्यम से लगभग 5700 हेक्टेयर क्षेत्र में प्राकृतिक खेती को बढ़ावा दिया जाएगा। कृषि विभाग का लक्ष्य है कि आने वाले वर्षों में इस क्षेत्र का और विस्तार किया जाए।

अधिकारियों के अनुसार क्लस्टर आधारित मॉडल से किसानों को प्रशिक्षण, तकनीकी सहायता और विपणन सुविधाएं बेहतर तरीके से उपलब्ध कराई जा सकेंगी।

प्रमाणीकरण के लिए भी मिलेगी सहायता

प्राकृतिक खेती करने वाले किसानों के लिए प्रमाणन प्रक्रिया को भी आसान बनाने का प्रयास किया जा रहा है। कृषि मंत्री ने बताया कि भारत सरकार द्वारा मान्यता प्राप्त क्षेत्रीय परिषदों के माध्यम से प्राकृतिक खेती का प्रमाणीकरण कराया जाएगा।

इस प्रक्रिया के लिए प्रति हेक्टेयर 2100 रुपये तक की सहायता प्रदान की जाएगी। प्रमाणित प्राकृतिक उत्पादों को बाजार में बेहतर पहचान और मूल्य मिलने की संभावना रहती है, जिससे किसानों को अतिरिक्त लाभ मिल सकता है।

हर गांव तक पहुंचेगा अभियान

कृषि विभाग ने इस अभियान को राज्य के प्रत्येक गांव और पंचायत तक पहुंचाने की तैयारी पूरी कर ली है। अभियान के दौरान खेतों में विशेष शिविर लगाए जाएंगे, जहां किसानों को मिट्टी परीक्षण, फसल विविधीकरण, जल संरक्षण और जलवायु अनुकूल खेती के बारे में जानकारी दी जाएगी।

कृषि वैज्ञानिक सीधे खेतों पर पहुंचकर किसानों को व्यावहारिक प्रशिक्षण देंगे। साथ ही कम पानी वाली फसलों, जोखिम प्रबंधन और आधुनिक कृषि तकनीकों पर भी मार्गदर्शन प्रदान किया जाएगा।

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि किसानों ने संतुलित उर्वरक उपयोग और प्राकृतिक खेती को व्यापक स्तर पर अपनाया, तो इससे न केवल मिट्टी की सेहत में सुधार होगा बल्कि पर्यावरण संरक्षण, मानव स्वास्थ्य और किसानों की आय वृद्धि के क्षेत्र में भी सकारात्मक परिणाम देखने को मिलेंगे। बिहार सरकार का यह अभियान इसी व्यापक बदलाव की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल माना जा रहा है।

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