​बिहार बनेगा बीज हब: बाहरी राज्यों पर निर्भरता होगी खत्म, 300 नर्सरियों में शुरू होगा पौध उत्पादन

पटना। बिहार की कृषि अर्थव्यवस्था में एक ऐतिहासिक अध्याय जुड़ने जा रहा है। अब तक दूसरे राज्यों से बीज और पौध मंगाने वाला बिहार अब खुद ‘उत्पादक राज्य’ की श्रेणी में खड़ा होने के लिए तैयार है। राजधानी पटना के मीठापुर स्थित कृषि भवन में 17 अप्रैल 2026 को आयोजित एक उच्चस्तरीय बैठक ने इस बदलाव की नींव रख दी है। कृषि विभाग के प्रधान सचिव नर्मदेश्वर लाल की अध्यक्षता में आयोजित इस बैठक का मुख्य केंद्र ‘उद्यानिकी रोपण-सामग्री उत्पादन हेतु PPP मॉडल’ रहा। इस बैठक का संदेश साफ है—बिहार अब केवल उपभोक्ता बनकर नहीं रहेगा, बल्कि देश के बड़े बीज उत्पादक संस्थानों के साथ मिलकर अपनी माटी में ही उच्च गुणवत्ता वाले बीज और पौधों का सृजन करेगा। बिहार की भौगोलिक स्थिति और उपजाऊ भूमि को देखते हुए यह कदम न केवल राज्य की आत्मनिर्भरता की ओर एक बड़ा प्रयास है, बल्कि किसानों की आय को दोगुना करने के संकल्प की दिशा में एक ‘गेम चेंजर’ साबित होने वाला है।

बाहरी राज्यों पर 80% निर्भरता: एक बड़ी चुनौती और आर्थिक बोझ

​बिहार के उद्यान निदेशालय के आंकड़े चौंकाने वाले हैं। निदेशक उद्यान अभिषेक कुमार ने बैठक में यह तथ्य रखा कि वर्तमान में बिहार में इस्तेमाल होने वाली उद्यानिकी रोपण सामग्री (Planting Material) का 80 प्रतिशत से भी अधिक हिस्सा अन्य राज्यों से मंगाया जाता है। पश्चिम बंगाल, आंध्र प्रदेश और महाराष्ट्र जैसे राज्यों से आने वाले इन पौधों और बीजों पर परिवहन का भारी खर्च आता है। यह अतिरिक्त बोझ अंततः बिहार के गरीब किसानों की जेब पर पड़ता है।

​परिवहन के दौरान पौधों की गुणवत्ता प्रभावित होने का भी बड़ा जोखिम रहता है। कई बार किसान ऊंचे दाम चुकाकर भी वह गुणवत्ता प्राप्त नहीं कर पाते, जिसकी उन्हें उम्मीद होती है। प्रधान सचिव नर्मदेश्वर लाल ने इसी समस्या पर चोट करते हुए कहा कि गुणवत्तापूर्ण सामग्री की समय पर उपलब्धता ही फसलों की उत्पादकता और किसानों की खुशहाली की आधारशिला है। उन्होंने स्पष्ट किया कि जब तक बिहार बाहरी राज्यों पर निर्भर रहेगा, तब तक उत्पादन लागत कम करना और स्थिरता (Stability) लाना कठिन होगा। इसीलिए अब राज्य में एक सुदृढ़, पारदर्शी और टिकाऊ उत्पादन प्रणाली विकसित करने का समय आ गया है।

PPP मॉडल और ‘हब-एंड-स्पोक’ रणनीति: विकास का नया खाका

​बिहार सरकार अब निजी क्षेत्र के साथ हाथ मिलाकर कृषि क्षेत्र में निवेश और तकनीक को बढ़ावा देने जा रही है। बैठक में पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप (PPP) मॉडल पर आधारित एक विस्तृत कार्ययोजना पर चर्चा की गई। इसमें सबसे महत्वपूर्ण रहा ‘हब-एंड-स्पोक’ (Hub-and-Spoke) मॉडल। इस मॉडल के तहत राज्य में कुछ केंद्रीय ‘हब’ (मुख्य केंद्र) बनाए जाएंगे, जहाँ उच्च तकनीक और विशेषज्ञता के साथ बीज और रोपण सामग्री तैयार की जाएगी। इन हब्स से जुड़े छोटे-छोटे ‘स्पोक्स’ (वितरण और स्थानीय उत्पादन केंद्र) जिले और प्रखंड स्तर पर फैले होंगे।

​विशेष सचिव बीरेन्द्र प्रसाद यादव ने बताया कि इस बैठक में प्राप्त सुझावों को संकलित कर एक व्यावहारिक कार्ययोजना तैयार की जाएगी। इस मॉडल का उद्देश्य यह है कि निजी बीज उत्पादक कंपनियां अपनी तकनीक और विशेषज्ञता लेकर आएं, जबकि बिहार सरकार अपनी आधारभूत संरचना प्रदान करेगी। इससे न केवल गुणवत्ता मानकों (Quality Standards) का पालन सुनिश्चित होगा, बल्कि डिजिटल ट्रैकिंग के माध्यम से बीज की शुद्धता और ‘ट्रेसिबिलिटी’ (Traceability) का अभाव भी खत्म होगा। किसान अब जान पाएंगे कि जो बीज वे खरीद रहे हैं, उसका मूल स्रोत क्या है और उसकी गुणवत्ता की गारंटी क्या है।

300 नर्सरियां और 60 फार्म: निष्क्रिय पड़ी संपत्तियों का होगा कायाकल्प

​अभिषेक कुमार ने एक महत्वपूर्ण जानकारी साझा करते हुए बताया कि कृषि विभाग के पास पहले से ही एक विशाल नेटवर्क मौजूद है। राज्य भर में 300 से अधिक नर्सरियां और 60 से ज्यादा कृषि फार्म बुनियादी ढांचे के साथ तैयार हैं। अब तक इनमें से कई इकाइयां अपनी पूरी क्षमता से काम नहीं कर पा रही थीं। PPP मॉडल के तहत इन नर्सरियों को निजी क्षेत्र के प्रतिष्ठित संस्थानों को सौंपा जा सकता है, जो आधुनिक तकनीक का उपयोग कर वहां सब्जी बीज, फलों के पौधे और मसालों की रोपण सामग्री तैयार करेंगे।

​यह कदम इसलिए भी क्रांतिकारी है क्योंकि इससे स्थानीय स्तर पर रोजगार के अवसर पैदा होंगे। जब 300 नर्सरियां पूरी तरह सक्रिय होंगी, तो वहां हजारों की संख्या में स्थानीय युवाओं और महिला स्वयं सहायता समूहों को काम मिलेगा। इसके साथ ही, ‘बीज ग्राम’ (Seed Village) की अवधारणा पर भी जोर दिया जा रहा है, जहाँ पूरा का पूरा गांव एक विशिष्ट फसल के बीज उत्पादन के लिए प्रशिक्षित किया जाएगा। इससे बिहार के गांवों की पहचान ‘सीड प्रोडक्शन यूनिट’ के रूप में होने लगेगी।

विशेषज्ञों और संस्थानों का महामंथन: गुणवत्ता ही प्राथमिकता

​मीठापुर के ऑडिटोरियम में आयोजित इस बैठक में केवल सरकारी अधिकारी ही नहीं, बल्कि भारतीय सब्जी अनुसंधान संस्थान, वाराणसी के वैज्ञानिक, बिहार कृषि विश्वविद्यालय और डॉ. राजेंद्र प्रसाद केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय (RPCAU) के विशेषज्ञ भी शामिल हुए। चर्चा का मुख्य बिंदु यह रहा कि कैसे बिहार की जलवायु के अनुकूल हाइब्रिड और उच्च पैदावार वाले बीजों का विकास किया जाए।

​कृषि निदेशक सौरभ सुमन यादव और बिहार राज्य बीज निगम के प्रबंध निदेशक स्पर्श गुप्ता ने इस बात पर जोर दिया कि किसानों के हितों की सुरक्षा सबसे ऊपर होनी चाहिए। समयबद्ध आपूर्ति और गुणवत्ता का आश्वासन ही इस पूरे मॉडल की सफलता तय करेगा। निदेशक बसोका (BASOCA) संतोष कुमार उत्तम ने गुणवत्ता मानकों के कड़ाई से पालन की बात कही, ताकि बिहार का ब्रांड नेम राष्ट्रीय स्तर पर स्थापित हो सके। निजी बीज कंपनियों के प्रतिनिधियों ने भी बिहार सरकार की इस पहल का स्वागत किया और राज्य में निवेश करने की इच्छा जताई।

भविष्य की राह: आत्मनिर्भर बिहार और उन्नत किसान

​इस बैठक का निष्कर्ष यह रहा कि बिहार को अब ‘कंज्यूमर स्टेट’ से बदलकर ‘प्रोड्यूसर स्टेट’ बनाया जाएगा। यदि बिहार अपनी जरूरतों का 80 प्रतिशत हिस्सा खुद उत्पादित करने में सफल होता है, तो इससे न केवल करोड़ों रुपये के परिवहन खर्च की बचत होगी, बल्कि पौधों की मृत्यु दर (Mortality Rate) भी कम होगी। स्थानीय स्तर पर तैयार पौधे बिहार की मिट्टी और पानी के लिए अधिक अनुकूल होंगे, जिससे फसल की बर्बादी कम होगी।

​बीरेन्द्र प्रसाद यादव ने आश्वस्त किया कि प्राप्त सुझावों के आधार पर एक प्रभावी कार्ययोजना बहुत जल्द धरातल पर उतरेगी। आने वाले समय में सब्जी, मसाला और अन्य उद्यानिकी फसलों के लिए बिहार को किसी दूसरे राज्य की ओर ताकने की जरूरत नहीं पड़ेगी। 17 अप्रैल की यह बैठक बिहार के कृषि इतिहास में एक टर्निंग पॉइंट के रूप में याद रखी जाएगी, जहाँ सरकारी इच्छाशक्ति और निजी क्षेत्र की विशेषज्ञता ने मिलकर किसानों के लिए खुशहाली का एक नया रास्ता चुना है।

​इस अवसर पर बिहार कृषि विश्वविद्यालय और भारतीय सब्जी अनुसंधान संस्थान के वैज्ञानिकों ने तकनीकी बारीकियों पर अपनी प्रस्तुति दी और यह सुनिश्चित किया कि तकनीक का हस्तांतरण (Technology Transfer) सीधे खेतों तक हो सके। बिहार अब बीज उत्पादन के क्षेत्र में एक नई क्रांति की ओर अग्रसर है, जहाँ ‘PPP’ का मतलब केवल साझेदारी नहीं, बल्कि ‘प्रगति, समृद्धि और पूर्णता’ होगा।

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