बिहार में सरकारी सेवकों की ‘डिजिटल आजादी’ पर लगाम: सोशल मीडिया पर निजी राय रखने पर अब होगा सीधा एक्शन

पटना। बिहार की प्रशासनिक व्यवस्था में अनुशासन और मर्यादा को बनाए रखने के लिए नीतीश सरकार ने एक बड़ा और कड़ा कानूनी कदम उठाया है। डिजिटल युग में सरकारी कर्मचारियों की सोशल मीडिया पर बढ़ती सक्रियता और कई बार सरकार की नीतियों के खिलाफ सार्वजनिक रूप से उठने वाली आवाजों को नियंत्रित करने के लिए ‘बिहार सरकारी सेवक आचार (संशोधन) नियमावली, 2026’ को पूरे राज्य में लागू कर दिया गया है। शनिवार, 11 अप्रैल 2026 को बिहार गजट में इस संशोधित नियमावली के प्रकाशन के साथ ही अब राज्य के लाखों सरकारी सेवकों के लिए फेसबुक, एक्स (पूर्व में ट्विटर) और इंस्टाग्राम जैसे डिजिटल प्लेटफॉर्म्स का उपयोग करना पहले जैसा नहीं रहेगा। नए नियमों के अनुसार, अब कोई भी सरकारी कर्मचारी बिना पूर्व अनुमति के सरकार की किसी भी नीति, योजना या अदालती फैसलों पर अपनी निजी राय सार्वजनिक नहीं कर सकेगा। यह आदेश न केवल सरकारी कामकाज की गोपनीयता को सुरक्षित रखने की दिशा में एक कदम है, बल्कि यह प्रशासनिक गलियारों में ‘डिजिटल अनुशासन’ की एक नई परिभाषा तय करने की कोशिश भी है।

अभिव्यक्ति की सीमा: क्या कहता है नया संशोधन?

​बिहार सरकार द्वारा लाए गए इस संशोधन का मुख्य उद्देश्य सरकारी सेवकों के आचरण को सोशल मीडिया के अनियंत्रित प्रभाव से बचाना है। नए प्रावधानों के तहत, अब किसी भी सरकारी सेवक के लिए सरकार की नीतियों—चाहे वे विकासात्मक हों या प्रशासनिक—उन पर किसी भी प्रकार की नकारात्मक या सकारात्मक निजी टिप्पणी करना मना है।

​अक्सर देखा गया है कि सरकारी कर्मचारी अपनी व्यक्तिगत आईडी से सरकार के किसी फैसले की आलोचना करते हैं या फिर किसी खास राजनीतिक विचाधारा का समर्थन करते हैं। नियमावली 2026 स्पष्ट करती है कि:

  • नीतियों पर मौन: सरकार की किसी भी योजना या नीति पर निजी राय रखना प्रतिबंधित है।
  • अदालती फैसलों का सम्मान: सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के फैसलों पर किसी भी प्रकार की निजी व्याख्या या टिप्पणी अब ‘कदाचार’ (Misconduct) की श्रेणी में आएगी।
  • अनुमति अनिवार्य: यदि कोई कर्मचारी किसी विषय पर तथ्य आधारित जानकारी साझा करना चाहता है, तो उसे संबंधित विभाग या विहित प्राधिकारी से लिखित अनुमति लेना अनिवार्य होगा।

प्रोफाइल पिक्चर और सांकेतिक विरोध पर भी पाबंदी

​इस नियमावली का एक सबसे चौंकाने वाला और कड़ा पहलू यह है कि अब कर्मचारी अपनी प्रोफाइल पिक्चर (DP) के माध्यम से भी कोई सांकेतिक विरोध दर्ज नहीं करा पाएंगे। डिजिटल विरोध के दौर में अक्सर देखा जाता है कि लोग किसी मांग या विरोध के समर्थन में अपनी डीपी बदल लेते हैं या काले रंग का प्रतीक लगाते हैं। बिहार सरकार ने अब इसे पूरी तरह प्रतिबंधित कर दिया है।

  • विरोध के प्रतीक: सरकारी कर्मचारी अपने किसी भी सोशल मीडिया हैंडल (निजी या सरकारी) पर सांकेतिक विरोध के प्रतीक का उपयोग नहीं करेंगे।
  • राजनीतिक जुड़ाव: किसी भी राजनीतिक दल या संगठन से संबंधित झंडे, प्रतीक या चिन्हों को अपनी प्रोफाइल या कवर फोटो में लगाना अब दंडनीय होगा।
  • न्यूट्रल डिजिटल पहचान: कर्मचारियों को अपनी डिजिटल पहचान को पूरी तरह से गैर-राजनीतिक और पेशेवर बनाए रखना होगा। सरकार का मानना है कि सरकारी कर्मचारी किसी एक दल का नहीं, बल्कि राज्य की जनता का सेवक होता है, और उसकी प्रोफाइल से किसी विशेष विचारधारा का झलकना प्रशासनिक निष्पक्षता के खिलाफ है।

ट्रोलिंग और बुलिंग के खिलाफ सख्त रुख

​सोशल मीडिया पर बढ़ती ‘ट्रोलिंग’ की संस्कृति से अब बिहार के सरकारी कर्मचारी भी अछूते नहीं रहेंगे। संशोधित नियमावली में स्पष्ट रूप से ‘ट्रोल’ और ‘बुली’ शब्दों का उल्लेख किया गया है।

​”कोई भी सरकारी सेवक सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर किसी व्यक्ति को ट्रोल नहीं करेगा, न ही उसे ऑनलाइन माध्यम से डराएगा या धमकाएगा (Bullying)।”

​यह प्रावधान उन स्थितियों के लिए है जहाँ अक्सर कर्मचारी अपनी पद की हनक में आम नागरिकों या सहकर्मियों के साथ ऑनलाइन बदतमीजी करते हैं। यदि कोई कर्मचारी किसी को अपमानित करने के इरादे से पोस्ट करता है या किसी विशेष व्यक्ति को लक्षित (Target) करता है, तो उसे सेवा आचार संहिता का उल्लंघन माना जाएगा। सरकार का उद्देश्य डिजिटल स्पेस को अधिक शालीन और पेशेवर बनाना है।

अपवाद: किसे मिली है छूट?

​नियमावली में सभी के लिए प्रतिबंध नहीं हैं। सरकार ने एक स्पष्ट ‘एग्जिट विंडो’ भी रखी है।

  1. प्राधिकृत अधिकारी: यदि किसी सरकारी सेवक को सरकार या किसी सक्षम प्राधिकारी द्वारा विशेष रूप से किसी योजना का प्रचार करने या सरकारी सूचनाएं साझा करने के लिए अधिकृत किया गया है, तो वह सोशल मीडिया का उपयोग कर सकता है।
  2. पीआर और संचार: सूचना एवं जनसंपर्क विभाग के अधिकारी या विभिन्न विभागों के सोशल मीडिया सेल के सदस्य, जो आधिकारिक सूचनाएं प्रसारित करते हैं, उन पर ये पाबंदियां लागू नहीं होंगी, बशर्ते वे अपनी ‘निजी राय’ न रखें।

कदाचार और विभागीय कार्रवाई का प्रावधान

​इस नियमावली के लागू होने के बाद, इसका उल्लंघन अब केवल एक गलती नहीं, बल्कि ‘कदाचार’ (Misconduct) माना जाएगा। इसका सीधा अर्थ है कि यदि कोई कर्मचारी नियम तोड़ता है, तो उसके खिलाफ ‘बिहार सरकारी सेवक (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियमावली’ के तहत अनुशासनात्मक कार्रवाई की जा सकती है।

​कार्रवाई के विभिन्न स्तर हो सकते हैं:

  • निंदा (Censure): छोटी गलती पर केवल चेतावनी।
  • वेतन वृद्धि पर रोक: गंभीर मामले में इंक्रीमेंट रोका जा सकता है।
  • निलंबन (Suspension): बार-बार उल्लंघन करने पर सस्पेंड किया जा सकता है।
  • सेवा से बर्खास्तगी: अत्यंत गंभीर मामलों में, जहाँ सरकार की प्रतिष्ठा को भारी नुकसान पहुँचा हो, वहां नौकरी से निकालने तक का प्रावधान है।

प्रशासनिक अनुशासन बनाम निजी स्वतंत्रता: एक विश्लेषण

​बिहार सरकार का यह कदम प्रशासनिक जगत में एक नई बहस को जन्म दे रहा है। एक तरफ सरकार का तर्क है कि सरकारी सेवक का आचरण 24 घंटे एक ‘लोक सेवक’ का होना चाहिए और उसे सार्वजनिक रूप से तटस्थ दिखना चाहिए। दूसरी तरफ, कर्मचारी संगठनों के भीतर इसे ‘अभिव्यक्ति की आजादी’ के संकुचन के रूप में देखा जा रहा है।

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