बिहार के इंजीनियरिंग और पॉलिटेक्निक संस्थानों में बढ़ा अभिभावकों का जुड़ाव, विद्यार्थियों के विकास पर सरकार का विशेष फोकस

पटना। बिहार सरकार तकनीकी शिक्षा व्यवस्था को अधिक प्रभावी और विद्यार्थी-केंद्रित बनाने की दिशा में लगातार नए कदम उठा रही है। इसी कड़ी में विज्ञान, प्रावैधिकी एवं तकनीकी शिक्षा विभाग ने राज्य के सभी सरकारी इंजीनियरिंग कॉलेजों और पॉलिटेक्निक संस्थानों में नियमित अभिभावक-शिक्षक बैठकों की व्यवस्था लागू की है। सरकार का मानना है कि अभिभावकों, शिक्षकों और संस्थानों के बीच मजबूत संवाद स्थापित होने से विद्यार्थियों के शैक्षणिक और व्यक्तिगत विकास में सकारात्मक बदलाव देखने को मिल रहा है।

विभाग के अनुसार राज्य के सभी 38 सरकारी इंजीनियरिंग कॉलेजों और 46 सरकारी पॉलिटेक्निक संस्थानों में प्रत्येक शैक्षणिक सत्र के दौरान वर्ष में दो बार अभिभावक-शिक्षक बैठक आयोजित की जा रही है। ये बैठकें अप्रैल और नवंबर महीने में आयोजित होती हैं। इन बैठकों का उद्देश्य केवल छात्रों के परीक्षा परिणामों की समीक्षा करना नहीं बल्कि उनके समग्र विकास, अनुशासन, व्यवहार और मानसिक स्थिति पर भी चर्चा करना है।

विज्ञान, प्रावैधिकी एवं तकनीकी शिक्षा मंत्री ने कहा कि तकनीकी शिक्षा केवल डिग्री प्राप्त करने तक सीमित नहीं होनी चाहिए, बल्कि विद्यार्थियों को आत्मविश्वासी, अनुशासित और रोजगार के लिए सक्षम बनाना भी उतना ही जरूरी है। उन्होंने कहा कि अभिभावक-शिक्षक बैठकें इस दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं क्योंकि इससे विद्यार्थियों के विकास को लेकर सभी पक्षों के बीच बेहतर समन्वय स्थापित हो रहा है।

मंत्री ने कहा कि कई बार छात्र अपनी समस्याओं या चुनौतियों को खुलकर व्यक्त नहीं कर पाते। ऐसे में जब अभिभावक और शिक्षक एक साथ बैठकर चर्चा करते हैं तो विद्यार्थियों की शैक्षणिक और व्यक्तिगत परेशानियों को समझना आसान हो जाता है। इससे समय रहते समाधान निकालने में मदद मिलती है और छात्रों का आत्मविश्वास भी बढ़ता है।

विभागीय अधिकारियों के अनुसार इन बैठकों में विद्यार्थियों की उपस्थिति, पढ़ाई में रुचि, व्यवहार, अनुशासन और संस्थान में उनकी सक्रियता जैसे पहलुओं पर विस्तार से चर्चा की जाती है। अभिभावकों को उनके बच्चों की प्रगति रिपोर्ट उपलब्ध कराई जाती है और जरूरत पड़ने पर व्यक्तिगत मार्गदर्शन भी दिया जाता है।

विशेषज्ञों का मानना है कि तकनीकी शिक्षा संस्थानों में इस प्रकार की बैठकों का महत्व लगातार बढ़ रहा है। इंजीनियरिंग और पॉलिटेक्निक जैसे संस्थानों में पढ़ाई का दबाव अधिक होता है और कई छात्र नए माहौल में खुद को ढालने में कठिनाई महसूस करते हैं। ऐसे में यदि अभिभावक और शिक्षक लगातार संपर्क में रहें तो छात्रों की समस्याओं को जल्दी पहचाना जा सकता है।

अधिकारियों ने बताया कि बैठकों के दौरान कई अभिभावक अपने सुझाव और अनुभव भी साझा करते हैं। इन सुझावों की गंभीरता से समीक्षा की जाती है और जहां जरूरी होता है वहां संस्थागत व्यवस्था में सुधार भी किए जाते हैं। विभाग का कहना है कि अभिभावकों की भागीदारी से तकनीकी शिक्षा संस्थानों में पारदर्शिता और जवाबदेही भी मजबूत होती है।

तकनीकी शिक्षा विभाग का मानना है कि शिक्षा व्यवस्था को केवल कक्षा और परीक्षा तक सीमित नहीं रखा जा सकता। विद्यार्थियों के मानसिक स्वास्थ्य, व्यवहारिक कौशल और व्यक्तित्व विकास पर भी बराबर ध्यान देना जरूरी है। इसी सोच के तहत अभिभावक-शिक्षक बैठकों को नियमित और व्यवस्थित रूप से आयोजित किया जा रहा है।

कई अभिभावकों ने भी इस पहल की सराहना की है। उनका कहना है कि पहले तकनीकी संस्थानों में बच्चों की पढ़ाई और गतिविधियों की जानकारी सीमित रूप से मिल पाती थी, लेकिन अब नियमित बैठकों के जरिए वे अपने बच्चों की प्रगति को बेहतर तरीके से समझ पा रहे हैं। इससे घर और संस्थान के बीच समन्वय मजबूत हुआ है।

शिक्षा विशेषज्ञों के अनुसार यदि किसी विद्यार्थी की उपस्थिति कम होती है, पढ़ाई में रुचि घटती है या व्यवहार में बदलाव आता है तो उसकी जानकारी अभिभावकों को समय पर मिलना बेहद जरूरी होता है। इससे समस्याओं का समाधान शुरुआती स्तर पर ही संभव हो जाता है। यही कारण है कि दुनिया के कई देशों में अभिभावक-शिक्षक संवाद को शिक्षा व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है।

विभाग ने यह भी स्पष्ट किया है कि बैठकों में प्राप्त फीडबैक को केवल औपचारिकता के तौर पर नहीं लिया जाता, बल्कि उन्हें नीति निर्माण और संस्थागत सुधार के लिए उपयोग में लाया जाता है। कई संस्थानों में छात्र सहायता प्रणाली, परामर्श सेवाओं और अनुशासन व्यवस्था में सुधार के लिए अभिभावकों के सुझावों को शामिल किया गया है।

सरकार का कहना है कि बिहार में तकनीकी शिक्षा के विस्तार के साथ-साथ उसकी गुणवत्ता में सुधार भी आवश्यक है। राज्य में पिछले कुछ वर्षों में इंजीनियरिंग और पॉलिटेक्निक संस्थानों की संख्या बढ़ी है, लेकिन अब फोकस विद्यार्थियों के समग्र विकास और रोजगार क्षमता बढ़ाने पर किया जा रहा है।

विशेषज्ञों का मानना है कि तकनीकी शिक्षा में केवल किताबों का ज्ञान पर्याप्त नहीं होता। विद्यार्थियों में व्यवहारिक कौशल, टीमवर्क, आत्मविश्वास और समस्या समाधान क्षमता भी विकसित करना जरूरी होता है। अभिभावक-शिक्षक बैठकें इस दिशा में सहायक साबित हो सकती हैं क्योंकि इससे छात्रों को एक सहयोगात्मक वातावरण मिलता है।

विभागीय अधिकारियों ने बताया कि आने वाले समय में इन बैठकों को और अधिक प्रभावी बनाने के लिए डिजिटल फीडबैक सिस्टम और ऑनलाइन संवाद व्यवस्था भी विकसित की जा सकती है। इससे दूरदराज के क्षेत्रों में रहने वाले अभिभावकों को भी अपने बच्चों की प्रगति से जुड़ने में आसानी होगी।

सरकार का मानना है कि तकनीकी संस्थानों में सकारात्मक और विद्यार्थी-अनुकूल माहौल तैयार करना समय की जरूरत है। यदि छात्र मानसिक रूप से स्वस्थ और प्रेरित रहेंगे तो उनके शैक्षणिक परिणाम भी बेहतर होंगे और वे रोजगार के क्षेत्र में अधिक सफल साबित होंगे।

तकनीकी शिक्षा विभाग की यह पहल बिहार में शिक्षा व्यवस्था को अधिक सहभागी और आधुनिक बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है। नियमित संवाद, अभिभावकों की भागीदारी और विद्यार्थियों पर विशेष ध्यान से आने वाले समय में राज्य की तकनीकी शिक्षा प्रणाली को नई मजबूती मिलने की उम्मीद जताई जा रही है।

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