बिहार कैबिनेट का बड़ा फैसला: शाहपुर एनकाउंटर मामले की न्यायिक जांच को मंजूरी, रिटायर्ड हाईकोर्ट जज करेंगे जांच

बिहार में चर्चित शाहपुर एनकाउंटर मामले को लेकर राज्य सरकार ने बड़ा निर्णय लिया है। 24 जून 2026 को आयोजित बिहार कैबिनेट बैठक में भोजपुर जिले के शाहपुर थाना क्षेत्र के बिलौटी गांव में हुई पुलिस कार्रवाई की न्यायिक जांच को मंजूरी दे दी गई। मंत्रिपरिषद के इस फैसले के बाद अब पूरे मामले की स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच न्यायिक आयोग के माध्यम से कराई जाएगी। यह निर्णय ऐसे समय में आया है जब एनकाउंटर को लेकर राजनीतिक माहौल गरम है और विपक्ष लगातार निष्पक्ष जांच की मांग कर रहा है।

कैबिनेट बैठक में यह प्रस्ताव अन्य विषय (Miscellaneous) श्रेणी के अंतर्गत रखा गया था। विस्तृत चर्चा के बाद मंत्रिपरिषद ने इसे स्वीकृति प्रदान की। सरकार के इस निर्णय को शाहपुर एनकाउंटर विवाद में एक अहम प्रशासनिक कदम माना जा रहा है। लंबे समय से उठ रहे सवालों और जनदबाव के बीच सरकार ने न्यायिक जांच का रास्ता अपनाकर स्पष्ट संकेत दिया है कि मामले की तह तक पहुंचने की कोशिश की जाएगी।

इस मामले की जांच के लिए न्यायमूर्ति की अध्यक्षता में न्यायिक जांच आयोग गठित किया गया है। विनोद कुमार सिन्हा, के सेवानिवृत्त न्यायाधीश हैं और अब उन्हें पूरे घटनाक्रम की विस्तृत जांच की जिम्मेदारी सौंपी गई है। आयोग को स्वतंत्र रूप से तथ्यों की पड़ताल करने, संबंधित पक्षों के बयान दर्ज करने और परिस्थितियों का विश्लेषण कर रिपोर्ट तैयार करने का अधिकार दिया गया है।

सरकार द्वारा गठित यह आयोग केवल सतही तथ्यों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि पूरे घटनाक्रम की शुरुआत से अंत तक सभी परिस्थितियों की जांच करेगा। आयोग यह भी देखेगा कि पुलिस द्वारा अपनाई गई प्रक्रिया विधिसम्मत थी या नहीं तथा कार्रवाई के दौरान आवश्यक कानूनी मानकों का पालन हुआ या नहीं।

शाहपुर एनकाउंटर मामला 17 जून 2026 को सामने आया था, जब भोजपुर जिले के बिलौटी गांव में पुलिस कार्रवाई के दौरान भरत भूषण तिवारी गंभीर रूप से घायल हो गए थे। बाद में इलाज के दौरान उनकी मृत्यु हो गई। घटना के तुरंत बाद पुलिस ने दावा किया कि कार्रवाई आत्मरक्षा में की गई और हालात ऐसे थे कि बल प्रयोग आवश्यक हो गया था। हालांकि, घटना के बाद सामने आए वीडियो, स्थानीय लोगों के बयान और प्रत्यक्षदर्शियों के दावों ने पुलिस के इस पक्ष पर कई सवाल खड़े कर दिए।

भरत भूषण तिवारी के परिजनों ने शुरुआत से ही इस कार्रवाई को फर्जी एनकाउंटर बताया। परिवार का आरोप है कि पुलिस ने बिना पर्याप्त कारण बल प्रयोग किया और घटना को बाद में आत्मरक्षा का रूप देने की कोशिश की गई। परिजनों ने यह भी दावा किया कि कई महत्वपूर्ण तथ्यों को छिपाया गया। यही कारण है कि घटना के बाद से लगातार निष्पक्ष जांच की मांग तेज होती गई।

सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो ने इस मामले को और संवेदनशील बना दिया। वीडियो क्लिप्स और प्रत्यक्षदर्शियों की प्रतिक्रियाओं ने जनमानस में सवाल पैदा कर दिए कि क्या वास्तव में पुलिस के पास गोली चलाने के अलावा कोई विकल्प नहीं था। यही मुद्दा राजनीतिक बहस का केंद्र बन गया। कई सामाजिक संगठनों और विपक्षी दलों ने भी जांच की मांग करते हुए सरकार पर दबाव बनाया।

मामले में प्रशासनिक स्तर पर कार्रवाई भी शुरू हो चुकी है। अब तक पांच पुलिसकर्मियों को निलंबित किया जा चुका है। इनमें तत्कालीन शाहपुर थानाध्यक्ष सहित अन्य संबंधित अधिकारी शामिल हैं। प्रारंभिक विभागीय जांच के आधार पर इन अधिकारियों की भूमिका पर सवाल उठे थे, जिसके बाद निलंबन की कार्रवाई की गई। हालांकि आलोचकों का कहना है कि केवल निलंबन पर्याप्त नहीं है और वास्तविक जिम्मेदारी तय होना जरूरी है।

भरत तिवारी की मां द्वारा दिए गए आवेदन के आधार पर संबंधित पुलिसकर्मियों के खिलाफ प्राथमिकी भी दर्ज की जा चुकी है। एफआईआर दर्ज होने के बाद कानूनी प्रक्रिया तेज हुई और मामले की गंभीरता को देखते हुए सरकार पर व्यापक जांच कराने का दबाव बढ़ गया। कैबिनेट द्वारा न्यायिक जांच की मंजूरी इसी दबाव और संवेदनशीलता के बीच आई है।

कैबिनेट की स्वीकृति के बाद आयोग को औपचारिक रूप से जांच संबंधी अधिकार मिल चुके हैं। इसके साथ ही आयोग के लिए जांच की शर्तें और दायरा भी निर्धारित किया गया है। आयोग विशेष रूप से तीन प्रमुख बिंदुओं पर ध्यान केंद्रित करेगा। पहला, क्या पुलिस की कार्रवाई उस समय की परिस्थितियों के अनुरूप थी। दूसरा, क्या बल प्रयोग वास्तव में आवश्यक था। तीसरा, क्या किसी स्तर पर प्रक्रियागत चूक, आदेश में त्रुटि या जिम्मेदारी निर्धारण की आवश्यकता है।

इन तीन प्रमुख सवालों के जवाब इस पूरे मामले की दिशा तय करेंगे। यदि जांच में प्रक्रियागत लापरवाही या शक्ति के दुरुपयोग के संकेत मिलते हैं, तो संबंधित अधिकारियों पर कठोर कार्रवाई संभव है। वहीं यदि पुलिस कार्रवाई को परिस्थितिजन्य रूप से उचित पाया जाता है, तो सरकार के पक्ष को मजबूती मिल सकती है।

राजनीतिक दृष्टि से भी यह मामला बेहद महत्वपूर्ण बन चुका है। विपक्ष लगातार सरकार को घेर रहा है और इसे कानून-व्यवस्था तथा पुलिस जवाबदेही का बड़ा मुद्दा बना रहा है। दूसरी ओर सरकार यह संदेश देने की कोशिश कर रही है कि वह पारदर्शी जांच और निष्पक्ष कार्रवाई के पक्ष में है। न्यायिक आयोग का गठन इसी रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है।

विश्लेषकों का मानना है कि शाहपुर एनकाउंटर की जांच रिपोर्ट आने तक यह मुद्दा बिहार की राजनीति में प्रमुख बना रहेगा। आयोग की रिपोर्ट न केवल इस मामले की सच्चाई सामने लाएगी, बल्कि पुलिस कार्रवाई और प्रशासनिक जवाबदेही पर भी व्यापक प्रभाव डाल सकती है।

फिलहाल पूरे बिहार की नजर न्यायिक आयोग की जांच पर टिकी हुई है। आम जनता, राजनीतिक दल, सामाजिक संगठन और भरत भूषण तिवारी का परिवार सभी इस रिपोर्ट का इंतजार कर रहे हैं। यह जांच तय करेगी कि 17 जून की घटना के पीछे वास्तविक परिस्थितियां क्या थीं, किस स्तर पर निर्णय लिए गए और अंतिम जिम्मेदारी किसकी बनती है। आने वाले दिनों में आयोग की कार्यवाही और उसकी रिपोर्ट इस बहुचर्चित मामले की दिशा और भविष्य दोनों तय करेगी।

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