
भागलपुर स्थित बिहार कृषि विश्वविद्यालय में आधुनिक कृषि तकनीकों को बढ़ावा देने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल के तहत आयोजित छह दिवसीय “ड्रोन एवं एआई टेक्नोलॉजी बूटकैंप” का सफल समापन शनिवार को हो गया। इस विशेष प्रशिक्षण कार्यक्रम का आयोजन विश्वविद्यालय के कृषि सूचना विज्ञान एवं कृत्रिम बुद्धिमत्ता अनुसंधान केंद्र (CAIR) द्वारा सेंटर फॉर डेवलपमेंट ऑफ एडवांस्ड कंप्यूटिंग (सी-डैक) के सहयोग से किया गया था। 18 मई से शुरू होकर 23 मई 2026 तक चले इस प्रशिक्षण शिविर में छात्रों को ड्रोन तकनीक, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और स्मार्ट फार्मिंग से जुड़ी अत्याधुनिक जानकारियां दी गईं।
इस बूटकैंप का मुख्य उद्देश्य कृषि शिक्षा को आधुनिक तकनीकों से जोड़ना और छात्रों को भविष्य की स्मार्ट खेती के लिए तैयार करना था। प्रशिक्षण के दौरान छात्रों को प्रिसिजन एग्रीकल्चर यानी सटीक कृषि प्रणाली की अवधारणा से परिचित कराया गया। विशेषज्ञों ने बताया कि आने वाले समय में कृषि क्षेत्र में ड्रोन, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और मशीन लर्निंग जैसी तकनीकों की भूमिका लगातार बढ़ने वाली है और इन्हीं तकनीकों के माध्यम से खेती को अधिक उत्पादक, वैज्ञानिक और लाभकारी बनाया जा सकता है।
छह दिनों तक चले इस गहन प्रशिक्षण कार्यक्रम में कुल 43 छात्रों ने भाग लिया। प्रतिभागियों को केवल सैद्धांतिक जानकारी ही नहीं दी गई, बल्कि व्यावहारिक प्रशिक्षण के माध्यम से उन्हें आधुनिक कृषि तकनीकों की वास्तविक कार्यप्रणाली को भी समझाया गया। छात्रों को ड्रोन संचालन, ड्रोन की संरचना, फ्लाइट कंट्रोल सिस्टम, सेंसर तकनीक, एरियल सर्वेक्षण, मैपिंग और मानवरहित विमान प्रणाली के कृषि उपयोग से संबंधित विस्तृत जानकारी प्रदान की गई।
विश्वविद्यालय प्रशासन के अनुसार यह प्रशिक्षण कार्यक्रम कुलपति डॉ. डी.आर. सिंह के मार्गदर्शन और दूरदर्शी सोच के कारण संभव हो सका। विश्वविद्यालय लंबे समय से कृषि शिक्षा में तकनीकी नवाचार को बढ़ावा देने की दिशा में कार्य कर रहा है। कुलपति ने लगातार इस बात पर जोर दिया है कि कृषि क्षेत्र को आधुनिक तकनीकों से जोड़ना समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है। उनका मानना है कि यदि छात्रों को पढ़ाई के दौरान ही एआई, मशीन लर्निंग और ड्रोन तकनीक का प्रशिक्षण दिया जाए, तो वे भविष्य में कृषि क्षेत्र में बड़े बदलाव ला सकते हैं।
कार्यक्रम का संचालन परियोजना निदेशक डॉ. अंशुमन कोहली के नेतृत्व में किया गया, जबकि परियोजना समन्वयक के रूप में डॉ. सी.के. पांडा ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। प्रशिक्षण सत्रों में सी-डैक के विशेषज्ञों और वैज्ञानिकों ने भाग लिया। इनमें राहुल कुमार, सिद्धांत, प्रदीप नंदन और नंदन कुमार जैसे तकनीकी विशेषज्ञ शामिल रहे, जिन्होंने छात्रों को आधुनिक तकनीकों का व्यावहारिक ज्ञान दिया।
प्रशिक्षण के दौरान छात्रों को ड्रोन उड़ाने की तकनीक सिखाई गई। उन्हें बताया गया कि किस प्रकार ड्रोन के माध्यम से खेतों की निगरानी की जा सकती है और कम समय में बड़े क्षेत्र का सर्वेक्षण संभव हो सकता है। विशेषज्ञों ने यह भी समझाया कि ड्रोन तकनीक का उपयोग करके किसानों को फसल की स्थिति, मिट्टी की गुणवत्ता और सिंचाई की जरूरतों की सटीक जानकारी दी जा सकती है।
बूटकैंप का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और मशीन लर्निंग आधारित कृषि समाधान रहे। छात्रों को बताया गया कि ड्रोन से प्राप्त आंकड़ों का विश्लेषण कर फसल स्वास्थ्य की निगरानी, रोगों की पहचान, पोषक तत्वों की कमी का पता लगाने और उत्पादन का पूर्वानुमान लगाने जैसे कार्य आसानी से किए जा सकते हैं। विशेषज्ञों ने बताया कि भविष्य में डेटा आधारित खेती किसानों के लिए बेहद उपयोगी साबित होगी।
प्रशिक्षण में खरपतवार पहचान, फसल रोग विश्लेषण और प्रिसिजन फार्मिंग जैसे विषयों पर भी विशेष सत्र आयोजित किए गए। छात्रों को यह जानकारी दी गई कि एआई आधारित तकनीकें खेती में लागत कम करने और उत्पादन बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं। इससे न केवल किसानों की आय बढ़ेगी, बल्कि पर्यावरण के अनुकूल खेती को भी बढ़ावा मिलेगा।
कार्यक्रम के दौरान कई इंटरएक्टिव डेमोंस्ट्रेशन और हैंड्स-ऑन प्रशिक्षण सत्र आयोजित किए गए। छात्रों ने स्वयं ड्रोन उड़ाकर उसके संचालन और तकनीकी प्रणाली को समझा। इस दौरान उन्हें सुरक्षा मानकों और ड्रोन रखरखाव से संबंधित जानकारी भी दी गई। प्रशिक्षण में भाग लेने वाले छात्रों ने कहा कि यह अनुभव उनके लिए बेहद उपयोगी रहा और इससे उन्हें कृषि तकनीक के नए आयामों को समझने का अवसर मिला।
छात्रों ने बताया कि अब तक उन्होंने केवल पुस्तकों में ड्रोन और एआई तकनीक के बारे में पढ़ा था, लेकिन इस बूटकैंप के माध्यम से उन्हें इन तकनीकों को वास्तविक रूप में देखने और समझने का अवसर मिला। कई छात्रों ने कहा कि भविष्य में वे एग्री-टेक और स्मार्ट फार्मिंग के क्षेत्र में करियर बनाने की दिशा में काम करना चाहते हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले समय में कृषि क्षेत्र पूरी तरह तकनीक आधारित होने जा रहा है। जलवायु परिवर्तन, बढ़ती आबादी और सीमित कृषि संसाधनों के बीच आधुनिक तकनीकों का उपयोग खेती को अधिक टिकाऊ और प्रभावी बना सकता है। ऐसे में विश्वविद्यालयों द्वारा आयोजित इस तरह के प्रशिक्षण कार्यक्रम छात्रों को भविष्य की चुनौतियों के लिए तैयार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं।
बिहार कृषि विश्वविद्यालय में आयोजित यह छह दिवसीय बूटकैंप तकनीक आधारित कृषि शिक्षा और नवाचार को बढ़ावा देने की दिशा में एक बड़ी उपलब्धि माना जा रहा है। विश्वविद्यालय की यह पहल इस बात का संकेत है कि अब कृषि शिक्षा केवल पारंपरिक पद्धतियों तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि डिजिटल और इंटेलिजेंट फार्मिंग की ओर तेजी से आगे बढ़ेगी।
भागलपुर में आयोजित इस प्रशिक्षण कार्यक्रम ने यह स्पष्ट कर दिया है कि बिहार में भी आधुनिक कृषि तकनीकों को लेकर तेजी से जागरूकता बढ़ रही है। आने वाले वर्षों में यदि इस तरह के कार्यक्रम लगातार आयोजित होते रहे, तो राज्य के छात्र और किसान दोनों ही तकनीक आधारित कृषि क्रांति का हिस्सा बन सकते हैं।


