​बिहार में तेजाब हमलों के जख्मों पर मरहम: नई पहल से 160 सर्वाइवर्स की जिंदगी में आएगी रोशनी

पटना। समाज के माथे पर कलंक की तरह चिपके तेजाब हमलों (एसिड अटैक) के दंश को झेल रही महिलाओं और बच्चों के लिए बिहार की राजधानी पटना से एक नई और उम्मीद भरी सुबह की शुरुआत हुई है। तेजाब का एक कतरा न केवल शरीर को झुलसाता है, बल्कि व्यक्ति के आत्मविश्वास, सामाजिक गरिमा और भविष्य के सपनों को भी राख कर देता है। इस गहरे सन्नाटे और अंधेरे को चीरते हुए बिहार सरकार के महिला एवं बाल विकास निगम ने एक ऐसी संवेदनशील पहल की है, जो इन ‘सर्वाइवर्स’ को केवल सहानुभूति नहीं, बल्कि समाज में सिर उठाकर जीने का अधिकार और अवसर प्रदान करेगी। दिल्ली के प्रसिद्ध ‘छांव फाउंडेशन’ के साथ मिलकर शुरू किया गया यह पुनर्वास कार्यक्रम राज्य के उन लगभग 160 लोगों के लिए एक सुरक्षा कवच की तरह है, जिन्होंने नफरत की आग को अपने चेहरे और रूह पर झेला है।

​गुरुवार, 23 अप्रैल 2026 को इस कार्यक्रम की विस्तृत रूपरेखा साझा करते हुए विभाग ने स्पष्ट किया कि अब सर्वाइवर्स को अकेले अपनी जंग नहीं लड़नी होगी। सरकार और विशेषज्ञ संस्थाएं मिलकर उनके स्वास्थ्य, शिक्षा, कौशल और रोजगार की जिम्मेदारी उठाएंगी।

साझेदारी का आधार: सरकारी तंत्र और विशेषज्ञता का संगम

​बिहार सरकार की महिला एवं बाल विकास निगम ने इस बेहद जटिल और संवेदनशील मुद्दे पर दिल्ली स्थित छांव फाउंडेशन के साथ हाथ मिलाया है। छांव फाउंडेशन देश भर में एसिड अटैक पीड़ितों के हक की लड़ाई लड़ने और उनके पुनर्वास के क्षेत्र में एक विश्वसनीय नाम रहा है। इस साझेदारी का मुख्य उद्देश्य राज्य के अलग-अलग जिलों में रह रहे 160 चिन्हित सर्वाइवर्स को एक मंच पर लाना और उनकी विशिष्ट जरूरतों के अनुसार सहायता प्रदान करना है।

​प्रायः देखा जाता है कि एसिड अटैक के बाद पीड़ित कानूनी उलझनों और शारीरिक उपचार में ही इतना उलझ जाता है कि उसकी शिक्षा और करियर पूरी तरह छूट जाते हैं। इस कार्यक्रम के माध्यम से सरकार एक ‘सिंगल विंडो’ सिस्टम विकसित करने की कोशिश कर रही है, जहाँ एक ही छत के नीचे चिकित्सा परामर्श, मनोवैज्ञानिक सहायता और भविष्य के लिए कौशल प्रशिक्षण की व्यवस्था हो। यह पार्टनरशिप केवल कागजों तक सीमित नहीं है, बल्कि धरातल पर व्यक्तिगत संपर्क के माध्यम से काम कर रही है।

पटना में 20 दिवसीय विशेष शिविर: उम्मीदों का नया पता

​पुनर्वास की इस प्रक्रिया को गति देने के लिए पटना के फ्रेजर रोड स्थित यूथ हॉस्टल में 15 अप्रैल से 5 मई तक एक विशेष 20 दिवसीय कार्यक्रम संचालित किया जा रहा है। इस शिविर में राज्य के विभिन्न हिस्सों से आए सर्वाइवर्स हिस्सा ले रहे हैं। छांव फाउंडेशन की एक विशेषज्ञ टीम, जिसमें मनोवैज्ञानिक, चिकित्सक और सामाजिक कार्यकर्ता शामिल हैं, हर सर्वाइवर से व्यक्तिगत रूप से मुलाकात कर रही है।

​इस शिविर की कार्यप्रणाली अन्य सरकारी कार्यक्रमों से अलग है। यहाँ केवल फॉर्म नहीं भरवाए जा रहे, बल्कि सर्वाइवर्स के साथ बैठकर उनकी मानसिक स्थिति को समझने की कोशिश की जा रही है। तेजाब हमले के बाद होने वाला मानसिक आघात (Trauma) शारीरिक जख्मों से कहीं अधिक गहरा होता है। कई सर्वाइवर्स वर्षों तक अवसाद और सामाजिक अलगाव में रहते हैं। शिविर में चल रहे काउंसलिंग सत्रों का उद्देश्य इसी डर को बाहर निकालना है। इसके साथ ही उनकी शारीरिक अक्षमताओं का आकलन किया जा रहा है ताकि उन्हें प्लास्टिक सर्जरी या अन्य आवश्यक चिकित्सा उपचार के लिए सही अस्पताल और विशेषज्ञों से जोड़ा जा सके।

समग्र पुनर्वास: चिकित्सा से लेकर स्थायी आजीविका तक

​इस पहल का सबसे महत्वपूर्ण पहलू इसका ‘समग्र दृष्टिकोण’ (Holistic Approach) है। पुनर्वास को चार मुख्य स्तंभों पर खड़ा किया गया है:

  1. चिकित्सा और सर्जरी: अधिकांश सर्वाइवर्स को बहु-चरणीय (Multi-stage) सर्जरी की आवश्यकता होती है। सरकार यह सुनिश्चित कर रही है कि उन्हें गुणवत्तापूर्ण और निशुल्क उपचार मिल सके।
  2. शिक्षा का निरंतरता: जो बच्चे या युवतियां हमले के कारण अपनी पढ़ाई छोड़ चुकी हैं, उन्हें दोबारा स्कूल या कॉलेज भेजने के लिए आवश्यक वित्तीय और प्रशासनिक सहायता दी जाएगी।
  3. कौशल विकास: सर्वाइवर्स की रुचि और क्षमता के अनुसार उन्हें कंप्यूटर, हैंडीक्राफ्ट, ब्यूटीशियन या अन्य पेशेवर कोर्स कराए जाएंगे।
  4. स्थायी आजीविका: प्रशिक्षण के बाद उन्हें रोजगार के अवसरों से जोड़ना या अपना छोटा व्यवसाय शुरू करने के लिए ऋण और बाजार उपलब्ध कराना इस कार्यक्रम का अंतिम और सबसे महत्वपूर्ण लक्ष्य है।

​जब एक सर्वाइवर आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर होता है, तो समाज का उसे देखने का नजरिया अपने आप बदलने लगता है। आत्मनिर्भरता ही वह हथियार है जिससे सामाजिक बहिष्कार की बेड़ियों को काटा जा सकता है।

प्रबंध निदेशक बंदना प्रेयषी का विजन: गरिमापूर्ण जीवन का संकल्प

​महिला एवं बाल विकास निगम की प्रबंध निदेशक बंदना प्रेयषी ने इस कार्यक्रम की आवश्यकता और इसके पीछे की सोच को बहुत ही स्पष्ट तरीके से रखा है। उनके अनुसार, तेजाब हमले के शिकार लोग अक्सर समाज के उन वर्गों से आते हैं जहाँ आर्थिक संसाधनों की कमी होती है। ऐसे में एक हमला पूरे परिवार को गरीबी और मानसिक प्रताड़ना के दुष्चक्र में धकेल देता है।

​बंदना प्रेयषी ने कहा कि राज्य सरकार का प्राथमिक उद्देश्य इन सर्वाइवर्स को केवल मदद देना नहीं, बल्कि उन्हें ‘मुख्यधारा’ का हिस्सा बनाना है। उन्होंने जोर दिया कि गरिमापूर्ण जीवन केवल बातों से नहीं मिलता, इसके लिए विधिक सहायता (Legal Aid) से लेकर मनोसामाजिक परामर्श तक एक समन्वित प्रयास की जरूरत होती है। सरकार यह सुनिश्चित करना चाहती है कि बिहार का कोई भी सर्वाइवर खुद को लाचार न समझे। उनके लिए एक ऐसी समर्थन प्रणाली (Support System) विकसित की जा रही है जो समावेशी और संवेदनशील हो। उनके बयान से यह स्पष्ट है कि प्रशासन अब इस मुद्दे पर केवल ‘राहत’ देने के बजाय ‘सशक्तिकरण’ पर ध्यान केंद्रित कर रहा है।

सामाजिक चुनौतियां और मनोवैज्ञानिक बाधाएं

​एसिड अटैक सर्वाइवर्स के सामने सबसे बड़ी चुनौती समाज का व्यवहार होता है। अक्सर लोग उन्हें दया की दृष्टि से देखते हैं या उनसे दूरी बना लेते हैं। सार्वजनिक स्थानों पर उनके चेहरों को घूरना या उनसे सवाल पूछना उन्हें बार-बार उस भयानक घटना की याद दिलाता है। पटना के यूथ हॉस्टल में चल रहे इस शिविर में इसी सामाजिक कलंक (Stigma) से लड़ने की ट्रेनिंग भी दी जा रही है।

​छांव फाउंडेशन के विशेषज्ञों का मानना है कि जब सर्वाइवर्स एक समूह में मिलते हैं, तो उन्हें यह अहसास होता है कि वे अकेले नहीं हैं। एक-दूसरे की कहानियाँ सुनकर उनमें लड़ने का जज्बा पैदा होता है। कार्यक्रम में उनके सामाजिक पुनर्वास पर भी काम किया जा रहा है, जिससे वे बिना किसी हिचकिचाहट के बाजार, सिनेमाघर या दफ्तर जा सकें। यह लड़ाई केवल एक चेहरे की बनावट बदलने की नहीं है, बल्कि समाज की उस सोच को बदलने की है जो सुंदरता को केवल त्वचा की गहराई तक सीमित मानती है।

एक आत्मनिर्भर भविष्य की ओर बढ़ते कदम

​बिहार सरकार और छांव फाउंडेशन की यह संयुक्त पहल राज्य के इतिहास में एसिड अटैक सर्वाइवर्स के लिए सबसे व्यवस्थित प्रयास मानी जा सकती है। 160 जिंदगियों को संवारने का यह लक्ष्य केवल एक सरकारी आंकड़ा नहीं है, बल्कि 160 परिवारों की खुशहाली का रोडमैप है। कौशल विकास और शिक्षा से जुड़कर जब ये सर्वाइवर्स आत्मनिर्भर बनेंगे, तो वे न केवल अपने परिवार का बोझ उठाएंगे, बल्कि समाज के लिए प्रेरणा का स्रोत भी बनेंगे।

​पटना के यूथ हॉस्टल से शुरू हुई यह ‘आशा की किरण’ आने वाले समय में बिहार के हर उस कोने तक पहुँचनी चाहिए जहाँ कोई सर्वाइवर अंधेरे में न्याय और अवसर की प्रतीक्षा कर रहा है। विधिक सहायता और बेहतर चिकित्सा उपचार के साथ-साथ अब आर्थिक स्वावलंबन का जो मार्ग प्रशस्त हुआ है, वह निश्चित रूप से इन जांबाज महिलाओं और बच्चों को समाज में सम्मानपूर्वक स्थान दिलाएगा। वॉयस ऑफ बिहार (VOB) इस सराहनीय पहल का स्वागत करता है और उम्मीद करता है कि 5 मई को समाप्त होने वाला यह शिविर एक नई और स्थायी व्यवस्था की बुनियाद बनेगा।

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