बिहार के 9 पुलों पर मंडरा रहा खतरा, IIT पटना की रिपोर्ट के बाद पथ निर्माण विभाग अलर्ट मोड में

पटना। बिहार में पुलों की सुरक्षा को लेकर बड़ा खुलासा सामने आया है। राज्य के कई महत्वपूर्ण पुलों की स्थिति चिंताजनक पाई गई है, जिसके बाद पथ निर्माण विभाग पूरी तरह अलर्ट मोड में आ गया है। आईआईटी पटना द्वारा किए जा रहे स्ट्रक्चरल ऑडिट की प्रारंभिक रिपोर्ट में नौ पुलों को तत्काल मरम्मत और मजबूतीकरण की जरूरत बताई गई है। रिपोर्ट सामने आने के बाद सरकार ने संबंधित अधिकारियों को जल्द कार्रवाई के निर्देश दिए हैं।

यह पूरा मामला उस व्यापक स्ट्रक्चरल ऑडिट अभियान से जुड़ा है, जिसकी शुरुआत अगवानी घाट पुल हादसे के बाद की गई थी। राज्य सरकार ने उस घटना के बाद सभी प्रमुख पुलों की तकनीकी जांच कराने का फैसला लिया था ताकि भविष्य में किसी बड़े हादसे को रोका जा सके। इसी क्रम में पिछले वर्ष जून से आईआईटी पटना को राज्य के 85 महत्वपूर्ण पुलों का स्ट्रक्चरल ऑडिट करने की जिम्मेदारी सौंपी गई थी।

अब तक आईआईटी पटना 47 पुलों की प्रारंभिक रिपोर्ट पथ निर्माण विभाग को सौंप चुका है। इन रिपोर्टों के अध्ययन के बाद बिहार राज्य पुल निर्माण निगम ने नौ पुलों की स्थिति को गंभीर श्रेणी में रखा है। अधिकारियों का कहना है कि इन पुलों पर तत्काल मरम्मत और संरचनात्मक मजबूतीकरण का काम शुरू करना जरूरी है।

रिपोर्ट के अनुसार, मुजफ्फरपुर जिले के दो पुलों की हालत सबसे ज्यादा चिंताजनक पाई गई है। इनमें एक स्टेशन के पास स्थित पुल शामिल है, जबकि दूसरा बैरिया से जीरो माइल के बीच गंडक नदी पर बना महत्वपूर्ण पुल है। इन दोनों पुलों से रोजाना बड़ी संख्या में वाहन गुजरते हैं। ऐसे में तकनीकी खामियों की खबर ने स्थानीय प्रशासन और आम लोगों की चिंता बढ़ा दी है।

गया जिले में भी तीन पुलों की स्थिति पर गंभीर सवाल उठे हैं। रिपोर्ट में बसातपुर-सिंलौंजा मार्ग पर स्थित पुल, चटकी-दरियापुर-गोरा रोड का पुल और राजबिगहा से बेलदार बिगहा के बीच बने पुल को तत्काल मरम्मत की जरूरत वाला बताया गया है। इन पुलों की संरचनात्मक मजबूती कमजोर होने की आशंका जताई गई है।

लखीसराय जिले के दो पुलों को भी जोखिम की श्रेणी में रखा गया है। इनमें एक रेलवे ओवरब्रिज के समीप स्थित पुल और दूसरा शहर क्षेत्र का पुल शामिल है। इसके अलावा हाजीपुर में रेलवे के पुराने पुल के पास बने एक अन्य पुल की स्थिति भी चिंताजनक बताई गई है।

विशेषज्ञों का कहना है कि पुलों की संरचनात्मक कमजोरी कई कारणों से उत्पन्न हो सकती है। लगातार भारी वाहनों का दबाव, समय पर रखरखाव की कमी, बाढ़ और प्राकृतिक क्षरण जैसी स्थितियां पुलों की मजबूती को प्रभावित करती हैं। बिहार जैसे राज्य में, जहां हर साल बाढ़ का असर देखने को मिलता है, वहां पुलों की नियमित तकनीकी जांच बेहद जरूरी मानी जाती है।

आईआईटी पटना की रिपोर्ट सामने आने के बाद बिहार राज्य पुल निर्माण निगम ने इन पुलों की मरम्मत प्रक्रिया तेज करने की तैयारी शुरू कर दी है। अधिकारियों के अनुसार, क्षतिग्रस्त पुलों की मरम्मत और मजबूतीकरण के लिए जल्द ही अलग से निविदा जारी की जाएगी।

पथ निर्माण विभाग के सचिव पंकज कुमार पाल ने संबंधित अधिकारियों को आईआईटी की रिपोर्ट का सख्ती से पालन करने का निर्देश दिया है। उन्होंने स्पष्ट कहा है कि जिन पुलों की स्थिति कमजोर पाई गई है, वहां किसी भी तरह की लापरवाही बर्दाश्त नहीं की जाएगी। सूत्रों के अनुसार, लखीसराय के एक पुल को लेकर विशेष सतर्कता बरतने के निर्देश भी दिए गए हैं।

राज्य सरकार का मानना है कि समय रहते मरम्मत कार्य शुरू कर दिए जाने से बड़े हादसों को टाला जा सकता है। पिछले कुछ वर्षों में बिहार में कई पुल हादसे और पुलों के क्षतिग्रस्त होने की घटनाएं सामने आई हैं, जिसके बाद सरकार पर पुल सुरक्षा को लेकर लगातार सवाल उठते रहे हैं।

अगवानी घाट पुल हादसे के बाद पुल निर्माण और रखरखाव को लेकर राज्यव्यापी समीक्षा शुरू की गई थी। उसी समीक्षा के तहत बड़े पुलों की तकनीकी जांच कराने का निर्णय लिया गया। फिलहाल आईआईटी पटना 60 मीटर से अधिक लंबाई वाले पुलों का स्ट्रक्चरल ऑडिट कर रहा है।

वहीं 60 मीटर से कम लंबाई वाले पुलों की जिम्मेदारी संबंधित सड़क निर्माण एजेंसियों और रोड मेंटेनेंस पॉलिसी के तहत तय की गई है। अधिकारियों का कहना है कि छोटे पुलों की भी समय-समय पर जांच की जा रही है।

सड़क और पुल विशेषज्ञों का कहना है कि केवल निर्माण ही नहीं बल्कि नियमित रखरखाव भी उतना ही जरूरी होता है। कई बार पुल वर्षों तक बिना तकनीकी जांच के उपयोग में बने रहते हैं, जिससे दुर्घटना की संभावना बढ़ जाती है। विशेषज्ञों का मानना है कि आधुनिक तकनीक की मदद से पुलों की लगातार निगरानी की जानी चाहिए।

स्थानीय लोगों में भी इस रिपोर्ट के बाद चिंता का माहौल है। जिन इलाकों के पुलों को जोखिम वाली सूची में रखा गया है, वहां के लोग सरकार से जल्द कार्रवाई की मांग कर रहे हैं। लोगों का कहना है कि यदि समय पर मरम्मत नहीं हुई तो किसी बड़े हादसे की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता।

राजनीतिक हलकों में भी यह मामला चर्चा का विषय बन गया है। विपक्ष सरकार से पूछ रहा है कि यदि पुलों की स्थिति इतनी खराब थी तो पहले कार्रवाई क्यों नहीं की गई। वहीं सरकार का कहना है कि वर्तमान ऑडिट अभियान इसी उद्देश्य से शुरू किया गया ताकि संभावित खतरों की पहचान कर समय रहते समाधान किया जा सके।

तकनीकी विशेषज्ञों का मानना है कि बिहार में लगातार बढ़ते सड़क नेटवर्क और भारी ट्रैफिक दबाव को देखते हुए पुलों की क्षमता का पुनर्मूल्यांकन आवश्यक हो गया है। कई पुल ऐसे हैं जिनका निर्माण दशकों पहले हुआ था और अब उन पर पहले की तुलना में कई गुना अधिक भार पड़ रहा है।

आईआईटी पटना की रिपोर्ट ने एक बार फिर बिहार की आधारभूत संरचना और पुल सुरक्षा को राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में ला दिया है। अब सभी की नजर इस बात पर टिकी है कि सरकार कितनी तेजी से मरम्मत और मजबूतीकरण का काम पूरा कर पाती है।

फिलहाल पथ निर्माण विभाग और पुल निर्माण निगम दोनों ही हाई अलर्ट पर हैं और संबंधित जिलों के अधिकारियों को लगातार निगरानी रखने के निर्देश दिए गए हैं। आने वाले दिनों में शेष पुलों की रिपोर्ट भी सामने आने के बाद और बड़े खुलासे हो सकते हैं।

  • ये भी पढ़े..

    बीड़ी और खनन श्रमिकों के बच्चों के लिए बड़ी राहत, केंद्र सरकार दे रही 1,000 से 25,000 रुपये तक की छात्रवृत्ति

    Share Add as a preferred…

    पीएम सूर्य घर योजना में बिहार का राष्ट्रीय स्तर पर जलवा, सरकारी भवनों के सौर ऊर्जाकरण के लिए मिला प्रतिष्ठित सम्मान

    Share Add as a preferred…