
पटना: बिहार में कृषि शिक्षा और वैज्ञानिक खेती को नई दिशा देने के उद्देश्य से राज्य सरकार ने एक महत्वाकांक्षी पहल की घोषणा की है। आने वाले वित्तीय वर्ष में राज्य के 629 पीएम श्री और राजकीय विद्यालयों में मिनी सॉयल टेस्टिंग लैब स्थापित की जाएंगी। इस योजना के माध्यम से स्कूली विद्यार्थियों को मिट्टी परीक्षण की वैज्ञानिक प्रक्रिया से जोड़ा जाएगा, वहीं किसानों को भी अपनी भूमि की उर्वरता और पोषक तत्वों की स्थिति के बारे में सटीक जानकारी मिल सकेगी।
कृषि मंत्री विजय कुमार सिन्हा ने कृषि भवन में आयोजित एक उच्चस्तरीय समीक्षा बैठक के दौरान इस योजना को मंजूरी देते हुए अधिकारियों को इसके प्रभावी और समयबद्ध क्रियान्वयन का निर्देश दिया। बैठक में मृदा स्वास्थ्य एवं उर्वरता योजना, स्कूल सॉयल हेल्थ प्रोग्राम तथा मुख्यमंत्री बागवानी मिशन के अंतर्गत संचालित विभिन्न योजनाओं की प्रगति की समीक्षा की गई।
स्कूलों से शुरू होगी वैज्ञानिक खेती की नई सोच
राज्य सरकार का मानना है कि कृषि के क्षेत्र में स्थायी और वैज्ञानिक बदलाव लाने के लिए नई पीढ़ी को प्रारंभिक स्तर से ही आधुनिक कृषि तकनीकों से जोड़ना आवश्यक है। इसी सोच के तहत स्कूल सॉयल हेल्थ प्रोग्राम को व्यापक स्तर पर लागू किया जा रहा है।
इस कार्यक्रम के अंतर्गत विद्यार्थियों को मिट्टी की गुणवत्ता जांचने, नमूना एकत्र करने, पोषक तत्वों का विश्लेषण करने और मृदा स्वास्थ्य को समझने का व्यावहारिक प्रशिक्षण दिया जाएगा। इससे छात्र केवल किताबों तक सीमित नहीं रहेंगे बल्कि प्रयोगशाला आधारित सीखने की प्रक्रिया का हिस्सा बनेंगे।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह पहल कृषि शिक्षा को अधिक व्यवहारिक और उपयोगी बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी।
पहले चरण में 160 विद्यालयों में मिली सफलता
समीक्षा बैठक में अधिकारियों ने बताया कि वित्तीय वर्ष 2025-26 के दौरान राज्य के 160 पीएम श्री और राजकीय विद्यालयों में मिनी सॉयल टेस्टिंग लैब स्थापित की जा चुकी हैं।
इन विद्यालयों में छात्रों को मिट्टी परीक्षण की प्रक्रिया से जोड़ने के सकारात्मक परिणाम सामने आए हैं। कई स्कूलों में विद्यार्थियों ने स्वयं मिट्टी के नमूने एकत्र कर उनका परीक्षण किया और मृदा स्वास्थ्य से जुड़ी महत्वपूर्ण जानकारियां हासिल कीं।
सरकार का मानना है कि पहले चरण की सफलता को देखते हुए अब इस कार्यक्रम को राज्यभर में बड़े स्तर पर विस्तार देने का समय आ गया है।
629 विद्यालयों में स्थापित होंगी नई प्रयोगशालाएं
वित्तीय वर्ष 2026-27 में इस योजना का दायरा कई गुना बढ़ाया जाएगा। सरकार ने राज्य के 629 विद्यालयों में मिनी सॉयल टेस्टिंग लैब स्थापित करने का निर्णय लिया है।
इन प्रयोगशालाओं के माध्यम से हजारों छात्र-छात्राओं को वैज्ञानिक कृषि पद्धतियों की जानकारी मिलेगी। साथ ही विद्यालयों को स्थानीय कृषि गतिविधियों से जोड़ने का अवसर भी मिलेगा।
कृषि विभाग का मानना है कि स्कूल स्तर पर विकसित यह व्यवस्था भविष्य में कृषि अनुसंधान और नवाचार की मजबूत नींव तैयार कर सकती है।
कक्षा 7 से 11 तक के विद्यार्थी होंगे शामिल
योजना के तहत कक्षा 7, 8, 9 और 11 के विद्यार्थियों को विशेष रूप से शामिल किया जाएगा।
छात्रों को मिट्टी के नमूने एकत्र करने, उनका परीक्षण करने, प्रयोगशाला उपकरणों का उपयोग करने और मृदा स्वास्थ्य रिपोर्ट तैयार करने की प्रक्रिया सिखाई जाएगी।
शिक्षकों और कृषि विशेषज्ञों के सहयोग से विद्यार्थियों को यह भी बताया जाएगा कि मिट्टी की गुणवत्ता का फसलों की उत्पादकता पर क्या प्रभाव पड़ता है और संतुलित उर्वरक उपयोग क्यों आवश्यक है।
वैज्ञानिक सोच और अनुसंधान क्षमता को मिलेगा बढ़ावा
कृषि मंत्री विजय कुमार सिन्हा ने कहा कि इस योजना का उद्देश्य केवल मिट्टी की जांच तक सीमित नहीं है। इसका बड़ा लक्ष्य विद्यार्थियों में वैज्ञानिक दृष्टिकोण विकसित करना और उन्हें अनुसंधान आधारित सोच की ओर प्रेरित करना है।
उन्होंने कहा कि आज के दौर में कृषि केवल पारंपरिक अनुभव का विषय नहीं रह गई है। आधुनिक तकनीक, डेटा आधारित निर्णय और वैज्ञानिक परीक्षण खेती की सफलता के महत्वपूर्ण आधार बन चुके हैं।
विद्यालयों में प्रयोगशालाओं की स्थापना से छात्र प्रारंभिक स्तर पर ही इन तकनीकों को समझ सकेंगे और भविष्य में कृषि क्षेत्र में नवाचार के लिए प्रेरित होंगे।
किसानों को भी मिलेगा प्रत्यक्ष लाभ
यह योजना केवल शिक्षा क्षेत्र तक सीमित नहीं रहेगी बल्कि किसानों को भी इसका सीधा लाभ मिलेगा।
भारत सरकार की ओर से प्रत्येक विद्यालय को 50 मिट्टी नमूनों का संग्रहण और परीक्षण करने का लक्ष्य दिया गया है। परीक्षण के बाद किसानों को मृदा स्वास्थ्य कार्ड उपलब्ध कराया जाएगा।
मृदा स्वास्थ्य कार्ड में मिट्टी में उपलब्ध पोषक तत्वों, उर्वरता की स्थिति और आवश्यक सुधारात्मक उपायों की जानकारी होगी। इससे किसान अपनी भूमि की वास्तविक जरूरत के अनुसार उर्वरकों का उपयोग कर सकेंगे।
विशेषज्ञों का कहना है कि इससे उत्पादन लागत कम होगी और फसलों की उत्पादकता बढ़ेगी।
एक लाख रुपये की लागत से बनेगी प्रत्येक लैब
सरकार ने प्रत्येक मिनी सॉयल टेस्टिंग लैब की स्थापना के लिए एक लाख रुपये की लागत निर्धारित की है।
इस लागत का 60 प्रतिशत हिस्सा केंद्र सरकार और 40 प्रतिशत हिस्सा राज्य सरकार वहन करेगी। इस प्रकार केंद्र और राज्य सरकार के साझा सहयोग से पूरे कार्यक्रम को लागू किया जाएगा।
प्रयोगशालाओं में मिट्टी परीक्षण से संबंधित आवश्यक उपकरण, परीक्षण किट और प्रशिक्षण सामग्री उपलब्ध कराई जाएगी ताकि विद्यार्थियों को गुणवत्तापूर्ण व्यावहारिक अनुभव मिल सके।
संतुलित उर्वरक उपयोग को मिलेगा बढ़ावा
कृषि वैज्ञानिकों का मानना है कि देश के कई हिस्सों में किसानों द्वारा बिना जांच के उर्वरकों का अत्यधिक उपयोग किया जाता है, जिससे मिट्टी की गुणवत्ता प्रभावित होती है।
मृदा परीक्षण के आधार पर उर्वरक उपयोग की सलाह मिलने से किसान संतुलित मात्रा में पोषक तत्वों का प्रयोग कर सकेंगे। इससे मिट्टी की उर्वरता लंबे समय तक बनी रहेगी और पर्यावरणीय प्रभाव भी कम होगा।
सरकार को उम्मीद है कि यह कार्यक्रम टिकाऊ और वैज्ञानिक खेती को बढ़ावा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।
ड्रैगन फ्रूट विकास योजना की भी हुई समीक्षा
समीक्षा बैठक के दौरान मुख्यमंत्री बागवानी मिशन के अंतर्गत संचालित ड्रैगन फ्रूट विकास योजना की भी समीक्षा की गई।
अधिकारियों ने बताया कि चतुर्थ कृषि रोड मैप के तहत तैयार परियोजना रिपोर्ट के आधार पर इस योजना को लागू किया जा रहा है। पिछले तीन वित्तीय वर्षों के लिए लगभग तीन करोड़ रुपये की लागत से इस योजना को स्वीकृति प्रदान की गई है।
वित्तीय वर्ष 2026-27 के लिए स्वीकृत राशि में से 13.62 लाख रुपये के व्यय को भी मंजूरी प्रदान की गई है।
फसल विविधीकरण पर सरकार का जोर
कृषि मंत्री ने कहा कि राज्य सरकार कृषि के आधुनिकीकरण और फसल विविधीकरण को प्राथमिकता दे रही है।
ड्रैगन फ्रूट जैसी उच्च मूल्य वाली फसलों को बढ़ावा देकर किसानों की आय बढ़ाने का प्रयास किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि पारंपरिक खेती के साथ-साथ नई और लाभकारी फसलों की ओर किसानों को प्रेरित करना समय की आवश्यकता है।
कृषि क्षेत्र में नवाचार को मिलेगा बल
मंत्री ने कहा कि विद्यालयों में मृदा परीक्षण प्रयोगशालाओं की स्थापना और ड्रैगन फ्रूट जैसी योजनाएं कृषि क्षेत्र में नवाचार और आत्मनिर्भरता को नई दिशा देंगी।
उन्होंने अधिकारियों को निर्देश दिया कि सभी योजनाओं का क्रियान्वयन पारदर्शी और समयबद्ध तरीके से किया जाए ताकि किसानों और विद्यार्थियों को अधिकतम लाभ मिल सके।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह योजना सफलतापूर्वक लागू होती है तो बिहार देश के उन राज्यों में शामिल हो सकता है जहां स्कूल शिक्षा और कृषि विज्ञान को एक साथ जोड़कर भविष्य की कृषि व्यवस्था को मजबूत करने का प्रयास किया जा रहा है। यह पहल न केवल छात्रों को वैज्ञानिक ज्ञान देगी बल्कि किसानों को भी बेहतर उत्पादन और अधिक आय की दिशा में मददगार साबित होगी।


