
भागलपुर। भागलपुर की जीवनरेखा कहे जाने वाले विक्रमशिला सेतु पर आवागमन बंद होने का असर अब केवल रफ़्तार और व्यापार तक सीमित नहीं रहा है, बल्कि यह अब लोगों के निजी जीवन और खुशियों की दहलीज पर भी वार करने लगा है। 10 मई 2026 की शाम गंगा के तट पर एक ऐसा मंजर देखने को मिला, जहाँ व्यवस्था की बेबसी और एक दूल्हे की विवशता आमने-सामने खड़ी थी। पुल के क्षतिग्रस्त होने के बाद प्रशासन द्वारा सुरक्षा कारणों से शाम पांच बजे के बाद नौका परिचालन पर लगाई गई रोक ने एक बारात के पहियों को उस वक्त थाम लिया, जब दूल्हा अपने जीवन की सबसे महत्वपूर्ण रस्म निभाने के लिए बेताब था। सेहरा सजाए, आंखों में सपने लिए भातोरिया का जयराम कुमार जब गंगा किनारे पहुँचा, तो उसे पता चला कि उसके और उसकी दुल्हन के बीच बहती गंगा की लहरें अब अगले 12 घंटों तक पार नहीं की जा सकतीं। इस स्थिति ने दूल्हे को इतना विचलित कर दिया कि उसने सीधे जिला प्रशासन से भावुक अपील करते हुए कह दिया, ‘साहब, सब कुछ तैयार है, बस ये नदी पार कराकर मेरी शादी करा दीजिए।’
घाट पर थमी बारात: जब खुशियों और मुहूर्त के बीच आई ‘समय की दीवार’
भागलपुर के भातोरिया निवासी जयराम कुमार की शादी तय समय के अनुसार गंगा के उस पार होनी थी। घर में मंगल गीत गाए जा रहे थे, बारात निकलने की तैयारी पूरी थी, लेकिन रास्ते की बाधा ने पूरी योजना को तहस-नहस कर दिया। विक्रमशिला सेतु के बंद होने के बाद प्रशासन ने आवाजाही के लिए नावों का सहारा दिया है, लेकिन इसकी एक समय-सीमा तय है। सुबह 5 बजे से शाम 5 बजे तक ही नावों को नदी पार करने की अनुमति दी गई है। जयराम और उसके परिजन अपनी तैयारियों में थोड़े विलंब क्या हुए, उनके लिए नदी का रास्ता बंद हो गया।
जब जयराम अपने रिश्तेदारों के साथ घाट पर पहुँचा, तो सूरज ढलने को था और अंतिम नाव अपना फेरा पूरा कर चुकी थी। घाट पर मौजूद कर्मियों ने नियमों का हवाला देते हुए आगे जाने से साफ इनकार कर दिया। दूल्हे के वेश में सजे जयराम के लिए यह स्थिति किसी सदमे से कम नहीं थी। उसने घाट पर खड़े होकर काफी देर तक मिन्नतें कीं, लेकिन सुरक्षा प्रोटोकॉल के आगे उसकी एक न चली। जयराम ने कहा कि शादी का कार्ड बहुत पहले छप चुका था, सारी रस्में तय थीं, लेकिन पुल का टूटना और फिर नाव का समय समाप्त होना उसकी पूरी जिंदगी के सबसे बड़े दिन पर भारी पड़ रहा है।
जीजा की चिंता और मुहूर्त का संकट: मुकेश कुमार ने बयां किया दर्द
दूल्हे के साथ मौजूद उसके जीजा मुकेश कुमार, जो अकबरनगर के रहने वाले हैं, इस पूरी स्थिति से अत्यंत चिंतित और आक्रोशित नजर आए। मुकेश कुमार ने बताया कि हिंदू परंपराओं में शादी का मुहूर्त ग्रहों और नक्षत्रों की चाल पर टिका होता है। यदि समय पर नदी पार नहीं की गई, तो न केवल बारात रुक जाएगी, बल्कि वह ‘शुभ मुहूर्त’ भी निकल जाएगा जिसके लिए महीनों से तैयारी की गई थी। मुकेश ने कहा कि प्रशासन को कम से कम शादी-विवाह जैसे आयोजनों के लिए नियमों में थोड़ी ढील देनी चाहिए या विशेष परमिट की व्यवस्था करनी चाहिए।
मुकेश के अनुसार, बारात के साथ काफी सामान, महिलाएं और बच्चे भी हैं। रात के समय गंगा किनारे ठहरना न तो सुरक्षित है और न ही व्यवहारिक। उन्होंने बताया कि लड़की पक्ष के लोग उस पार बारात का इंतजार कर रहे हैं और यहाँ दूल्हा और बाराती बेबस होकर प्रशासन की ओर देख रहे हैं। यह स्थिति केवल उनके परिवार की नहीं है, बल्कि विक्रमशिला सेतु के आसपास रहने वाले उन तमाम लोगों की है जिनके घरों में इन दिनों शहनाइयां बज रही हैं।
नौका परिचालन की समय-सीमा: सुरक्षा बनाम सामाजिक अनिवार्यता
विक्रमशिला सेतु के क्षतिग्रस्त होने के बाद जिला प्रशासन ने सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता दी है। गंगा की लहरों का मिजाज और रात के अंधेरे में नाव चलाने के जोखिम को देखते हुए ही शाम 5 बजे के बाद परिचालन बंद करने का निर्णय लिया गया है। लेकिन, बिहार की सामाजिक और सांस्कृतिक संरचना में शादियां अक्सर रात के समय ही संपन्न होती हैं। ऐसे में शाम 5 बजे का कट-ऑफ टाइम उन लोगों के लिए एक बड़ी समस्या बन गया है जिन्हें रस्मों के लिए रात में आवाजाही करनी पड़ती है।
प्रशासनिक दृष्टिकोण से देखें तो एसडीआरएफ और पुलिस बल की तैनाती केवल दिन के उजाले में ही प्रभावी ढंग से हो पाती है। रात में किसी भी प्रकार की दुर्घटना होने पर राहत कार्य पहुँचाना अत्यंत कठिन होगा। लेकिन जयराम कुमार जैसे आम नागरिकों के लिए यह सुरक्षा नियम एक बड़ी मुसीबत बन गया है। जयराम की ‘साहब शादी करा दीजिए’ वाली पुकार यह दर्शाती है कि आम जनता के लिए नियमों की कठोरता कभी-कभी उनके भावनात्मक और सामाजिक अस्तित्व पर प्रहार करती है।
विक्रमशिला सेतु का बंद होना: रफ़्तार ही नहीं, रिश्ते भी प्रभावित
भागलपुर और नवगछिया के बीच का यह सेतु केवल कंक्रीट का ढांचा नहीं है, बल्कि यह दो भौगोलिक क्षेत्रों के रिश्तों का सेतु भी है। पुल बंद होने से रसद और व्यापार तो प्रभावित हुआ ही है, लेकिन पारिवारिक मिलन और उत्सवों पर लगा यह ग्रहण सबसे अधिक पीड़ादायक है। जयराम कुमार का मामला तो मीडिया के सामने आ गया, लेकिन ऐसे दर्जनों दूल्हे और बारातें होंगी जो इन दिनों गंगा के तट पर अपनी किस्मत को कोस रहे होंगे।
पुल की मरम्मत का कार्य बीआरओ (BRO) द्वारा शुरू किया जा चुका है, लेकिन इसे पूरी तरह बहाल होने में समय लगेगा। तब तक के लिए नौका ही एकमात्र विकल्प है। स्थानीय लोगों की मांग है कि कम से कम लगन और शादियों के इस सीजन को देखते हुए प्रशासन को विशेष ‘इमरजेंसी विंडो’ बनानी चाहिए। इसमें पुलिस की निगरानी में केवल उन लोगों को जाने की अनुमति दी जाए जिनके पास शादी का कार्ड या कोई मेडिकल इमरजेंसी हो।
जनता की मांग: विशेष व्यवस्था की दरकार
अकबरनगर से आए बारातियों और जयराम के परिजनों ने सामूहिक रूप से जिला प्रशासन से अपील की है कि वे इस मानवीय पहलू पर विचार करें। लोगों का कहना है कि जब सेतु चालू था, तो रात के 2 बजे भी बारातें आसानी से निकल जाती थीं। अब अचानक आए इस संकट ने लोगों के सामाजिक बजट और मानसिक शांति दोनों को बिगाड़ दिया है।
जयराम कुमार की आंखों में आंसू और उसके चेहरे की घबराहट यह बताने के लिए काफी है कि एक आम आदमी के लिए सरकारी नीतियां और व्यवस्था की खामियां कितनी बड़ी मुसीबत बन सकती हैं। दूल्हे ने प्रशासन से हाथ जोड़कर विनती की है कि उसे किसी भी सुरक्षित माध्यम से उस पार पहुँचा दिया जाए ताकि उसकी शादी की रस्में अधूरी न रहें। भागलपुर समाहारणालय तक यह खबर पहुँचने के बाद अब उम्मीद की जा रही है कि प्रशासन इस पर कोई बीच का रास्ता निकालेगा।
फिलहाल, गंगा किनारे एक बारात खड़ी है, एक दूल्हा सेहरा सजाए जिला अधिकारी की अनुमति का इंतजार कर रहा है और नदी की लहरें अपनी रफ़्तार से बह रही हैं। 11 मई की यह रात जयराम कुमार के लिए किसी इम्तिहान से कम नहीं है। क्या प्रशासन इस भावुक अपील पर पसीजेगा या नियम की मर्यादा मुहूर्त पर भारी पड़ेगी, यह आने वाले कुछ घंटे ही तय करेंगे। भागलपुर की जनता अब टकटकी लगाए उस पुल की ओर देख रही है जिसका टूटना अब सीधे उनके दिलों और घरों की खुशियों को प्रभावित कर रहा है।


