विक्रमशिला सेतु के जख्मों पर सेना का मरहम: 30 दिनों में बेली ब्रिज से जुड़ेगा भागलपुर और नवगछिया, बुधवार से शुरू होगा निर्माण का महायज्ञ

भागलपुर। उत्तर और दक्षिण बिहार को जोड़ने वाली एकमात्र जीवनरेखा, विक्रमशिला सेतु पर पिछले कई दिनों से लगा ‘ब्रेक’ अब हटने की दिशा में बढ़ गया है। पुल के क्षतिग्रस्त होने से उपजे संकट को समाप्त करने के लिए भारतीय सेना और सीमा सड़क संगठन (BRO) ने साझा कमान संभाल ली है। मंगलवार, 12 मई 2026 को जिला प्रशासन और सेना की इंजीनियरिंग विंग के बीच हुए महत्वपूर्ण विमर्श के बाद यह तय हो गया है कि क्षतिग्रस्त हिस्से पर ‘बेली ब्रिज’ के निर्माण का कार्य बुधवार यानी 13 मई से युद्ध स्तर पर शुरू कर दिया जाएगा। भागलपुर जिलाधिकारी डॉ. नवल किशोर चौधरी ने इस पूरे रेस्क्यू ऑपरेशन का खाका पेश करते हुए बताया कि सेना की विशेष इंजीनियरिंग टीम ने अपना तकनीकी सर्वेक्षण पूरा कर लिया है। लक्ष्य यह निर्धारित किया गया है कि अगले एक महीने के भीतर बेली ब्रिज तैयार कर लिया जाए, ताकि पुल के दो हिस्सों में बंटे ढांचे को फिर से जोड़कर आवागमन को सामान्य बनाया जा सके। यह परियोजना न केवल तकनीकी रूप से चुनौतीपूर्ण है, बल्कि भागलपुर की अर्थव्यवस्था और जनजीवन को फिर से पटरी पर लाने के लिए एक अनिवार्य मिशन बन गई है।

सेना की 417 इंजीनियरिंग ब्रिगेड ने संभाला मोर्चा

​विक्रमशिला सेतु की जटिल संरचना और गंगा की तेज धारा के बीच बेली ब्रिज खड़ा करना कोई साधारण कार्य नहीं है। इसके लिए भारतीय सेना की ‘417 इंजीनियरिंग ब्रिगेड’ को तैनात किया गया है। इस पूरी टीम का नेतृत्व ब्रिगेडियर सिद्धार्थ सिंह कर रहे हैं। सोमवार को ही ब्रिगेडियर सिद्धार्थ सिंह के नेतृत्व में सेना के विशेषज्ञ अधिकारियों ने पुल के क्षतिग्रस्त स्लैब और पिलरों का घंटों तक सूक्ष्म निरीक्षण किया। इस दौरान उन्होंने पाया कि मुख्य सेतु का एक बड़ा हिस्सा पूरी तरह कटकर अलग हो गया है, जिसे पारंपरिक मरम्मत के जरिए तुरंत ठीक करना संभव नहीं है।

​निरीक्षण के बाद ब्रिगेडियर ने अपने अधीनस्थों और सहयोगियों को निर्माण की रूपरेखा को लेकर कड़े दिशा-निर्देश जारी किए हैं। सेना की इस विशेष टीम में करीब 60 सदस्य शामिल होंगे, जिनमें अनुभवी इंजीनियर, गोताखोर और भारी मशीनरी के ऑपरेटर होंगे। यह ब्रिगेड अपनी त्वरित निर्माण क्षमता के लिए जानी जाती है, विशेषकर युद्ध जैसी परिस्थितियों या प्राकृतिक आपदा के समय अस्थाई पुलों के निर्माण में इन्हें विशेषज्ञता हासिल है।

कोलकाता से आएगा सामान, नवगछिया की ओर सजेगा कार्यस्थल

​बेली ब्रिज के निर्माण के लिए आवश्यक भारी-भरकम सामग्री और लोहे के गर्डर्स कोलकाता से मंगाए जा रहे हैं। चूंकि विक्रमशिला सेतु का वह हिस्सा जो नवगछिया की ओर है, वहां निर्माण सामग्री को रखने और उसे असेंबल करने के लिए अधिक जगह उपलब्ध है, इसलिए कार्यस्थल वहीं तय किया गया है। वर्तमान में विक्रमशिला सेतु के समानांतर एक और पुल का निर्माण कार्य चल रहा है, जिसका जिम्मा मेसर्स एसपी सिंगला एजेंसी के पास है।

​प्रशासन ने तय किया है कि कोलकाता से आने वाले बेली ब्रिज के मटेरियल्स को इसी एजेंसी के विस्तृत प्रांगण में रखा जाएगा। यहाँ सेना के जवान और इंजीनियर खाली जगह पर ब्रिज के विभिन्न हिस्सों को असेंबल करेंगे यानी पुल का पूरा ढांचा (स्ट्रक्चर) जमीन पर ही तैयार किया जाएगा। एक बार जब ढांचा मजबूती से जुड़ जाएगा, तो उसे विशालकाय क्रेनों की मदद से क्षतिग्रस्त हिस्से तक पहुँचाया जाएगा और वहां सटीक तकनीकी गणना के साथ सेट कर दिया जाएगा। यह प्रक्रिया अत्यंत जोखिम भरी और वैज्ञानिक है, क्योंकि वजन का संतुलन बिगड़ते ही मुख्य ढांचे पर दबाव बढ़ सकता है।

प्रशासनिक मुस्तैदी और टीम का आवासन

​भागलपुर जिलाधिकारी ने बताया कि बीआरओ और सेना की इस 100 से अधिक सदस्यों वाली (जिसमें 60 प्रमुख निर्माण सदस्य हैं) टीम के ठहरने और रसद की पूरी जिम्मेदारी जिला प्रशासन ने ली है। टीम के आवासन के लिए उपयुक्त और सुरक्षित स्थानों को चिन्हित कर लिया गया है ताकि इंजीनियरों और जवानों को कार्यस्थल तक पहुँचने में कम से कम समय लगे। इसके साथ ही, निर्माण कार्य के दौरान सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए पुल के दोनों किनारों पर अतिरिक्त पुलिस बल की तैनाती कर दी गई है।

​जिलाधिकारी ने स्पष्ट किया कि प्रशासन बीआरओ टीम को हर संभव तकनीकी और लॉजिस्टिक सहयोग प्रदान कर रहा है। बिजली की निरंतर आपूर्ति, क्रेन के लिए रास्ता और स्थानीय श्रमिकों की आवश्यकता को भी तुरंत पूरा किया जा रहा है। जिलाधिकारी ने भरोसा जताया है कि जिस जज्बे के साथ सेना ने इस काम को हाथ में लिया है, उससे यह सुनिश्चित है कि भागलपुर की जनता को एक महीने के भीतर इस संकट से मुक्ति मिल जाएगी।

क्या होता है बेली ब्रिज और क्यों चुना गया इसे?

​बेली ब्रिज एक प्रकार का पोर्टेबल, प्री-फैब्रिकेटेड और ट्रस ब्रिज (Truss Bridge) है। इसकी सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसे बिना किसी भारी वेल्डिंग के केवल बोल्ट और पिन के जरिए तेजी से जोड़ा जा सकता है। दूसरे विश्व युद्ध के दौरान इसका आविष्कार किया गया था और तब से यह दुर्गम क्षेत्रों में सेना की पहली पसंद रहा है। विक्रमशिला सेतु के मामले में बेली ब्रिज का चयन इसलिए किया गया क्योंकि पुल का मुख्य हिस्सा क्षतिग्रस्त होकर झुक गया है। पक्का स्लैब डालने में महीनों का समय लग सकता था, जबकि बेली ब्रिज एक मजबूत अस्थाई विकल्प है जो भारी ट्रकों और बसों के भार को सहने की क्षमता रखता है। एक बार बेली ब्रिज लग जाने के बाद, नीचे से मुख्य पुल की स्थायी मरम्मत का काम भी निर्बाध रूप से चलता रहेगा।

आवागमन ठप होने से मची है हाहाकार

​पिछले कुछ दिनों से विक्रमशिला सेतु के बंद होने के कारण भागलपुर, नवगछिया, पूर्णिया, कटिहार और सीमांचल के अन्य जिलों का संपर्क टूट गया है। आवश्यक वस्तुओं की कीमतें आसमान छूने लगी हैं क्योंकि ट्रकों को कई सौ किलोमीटर का चक्कर लगाकर मुंगेर या अन्य रास्तों से आना पड़ रहा है। छोटी नावों और स्टीमरों पर लोगों की भीड़ जान जोखिम में डालकर नदी पार कर रही है। ऐसे में बेली ब्रिज का निर्माण केवल एक तकनीकी कार्य नहीं, बल्कि एक बड़ी मानवीय राहत है।

​भागलपुर के स्थानीय निवासियों और व्यवसायियों ने बुधवार से शुरू होने वाले इस निर्माण कार्य का स्वागत किया है। लोगों का कहना है कि अगर सेना ने यह जिम्मेदारी ली है, तो काम की गुणवत्ता और समय-सीमा पर कोई शक नहीं रह जाता। बुधवार को जब निर्माण कार्य की पहली ईंट या कहें कि पहला बोल्ट कसा जाएगा, तो वह भागलपुर की रफ़्तार को फिर से बहाल करने की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम होगा। फिलहाल, पूरे पुल क्षेत्र को ‘कंस्ट्रक्शन जोन’ घोषित कर दिया गया है और आम लोगों की आवाजाही को पूरी तरह प्रतिबंधित रखा गया है ताकि सेना अपने काम को बिना किसी बाधा के पूरा कर सके।

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