विक्रमशिला सेतु की मरम्मत के लिए सेना ने संभाली कमान: एमईएस और बीआरओ ने परखी पुल की मजबूती, जल्द बनेगा बेली ब्रिज

भागलपुर। भागलपुर की जीवनरेखा और उत्तर-दक्षिण बिहार के बीच संपर्क का मुख्य सूत्र कहे जाने वाले विक्रमशिला सेतु के जख्मों को भरने के लिए अब भारतीय सेना के जांबाज अभियंताओं ने मोर्चा संभाल लिया है। रविवार, 10 मई 2026 की दोपहर जब मिलिट्री इंजीनियर सर्विस (एमईएस) की विशेष टीम रांची विंग से भागलपुर पहुँची, तो सेतु पर पसरा सन्नाटा एक नई उम्मीद और हलचल में तब्दील हो गया। पुल के क्षतिग्रस्त स्लैब के कारण पिछले कई दिनों से थमी हुई सड़कों की रफ्तार को फिर से बहाल करने के लिए सेना की इंजीनियरिंग टीम ने बीआरओ (सीमा सड़क संगठन) के साथ मिलकर एक वृहद तकनीकी मुआयना शुरू किया है। रांची विंग के ब्रिगेडियर के नेतृत्व में आई इस उच्चस्तरीय टीम ने कर्नल सामर्थ गुप्ता और अन्य सैन्य अधिकारियों के साथ सेतु के ऊपरी ढांचे से लेकर नदी के भीतर डूबे पिलरों तक का बारीकी से निरीक्षण किया। यह दौरा केवल एक निरीक्षण मात्र नहीं था, बल्कि उस ‘मिशन सेतु’ का आगाज था, जिसके जरिए भागलपुर और सीमांचल के बीच टूटे हुए सड़क संपर्क को एक बार फिर से जोड़ने की तैयारी है। सेना की इस सक्रियता ने यह स्पष्ट कर दिया है कि अब सेतु की मरम्मत का कार्य केवल प्रशासनिक फाइलों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि सैन्य अनुशासन और तकनीकी विशेषज्ञता के साथ इसे युद्धस्तर पर पूरा किया जाएगा।

आधुनिक तकनीक और ड्रोन से सेतु के ‘स्वास्थ्य’ की जांच

​ब्रिगेडियर के नेतृत्व में पहुँची एमईएस की टीम ने सेतु के ऊपरी भाग पर पहुँचकर सबसे पहले उन हिस्सों का भौतिक सत्यापन किया जहाँ स्लैब में दरारें आई हैं। बीआरओ के कर्नल सामर्थ गुप्ता ने पिछले तीन दिनों की जांच से निकले निष्कर्षों और एकत्रित किए गए डेटा से सैन्य टीम को अवगत कराया। इस दौरान अभियंताओं ने आधुनिक ड्रोन कैमरों का सहारा लिया। ड्रोन के जरिए सेतु के उन कोणों और हिस्सों की उच्च क्षमता वाली तस्वीरें और वीडियो लिए गए, जहाँ इंसानी पहुँच संभव नहीं थी। विशेष रूप से स्लैब के निचले हिस्से और पिलर के जोड़ (Joints) की स्थिति को डिजिटल मैपिंग के जरिए समझा गया।

​निरीक्षण के दौरान यह पाया गया कि जिस स्थान पर स्लैब क्षतिग्रस्त हुआ है, उसके दोनों ओर 7.5-7.5 मीटर का क्षेत्र तकनीकी रूप से अब भी पूरी तरह सुरक्षित और स्थिर है। यह एक अत्यंत महत्वपूर्ण खोज है क्योंकि यही वह आधार बनेगा जहाँ प्री-फैब्रिकेटेड बेली ब्रिज के फाउन्डेशन को टिकाया जाएगा। सेना के अधिकारियों ने सेतु की सतह पर उन जगहों को चिह्नित (Marking) किया है जहाँ बेली ब्रिज की शिफ्टिंग और स्थापना की जानी है। करीब 10 मिनट तक टीम ने केवल उसी बिंदु पर मंथन किया जहाँ से सेतु का ढांचा सबसे कमजोर प्रतीत हो रहा था।

गंगा की लहरों के बीच पिलरों का मुआयना: एसडीआरएफ के साथ साझा मिशन

​सेतु के ऊपरी भाग की जांच के बाद, ब्रिगेडियर और उनकी टीम ने जलमार्ग के जरिए पुल के आधार (Foundation) को परखने का निर्णय लिया। एसडीआरएफ (SDRF) की विशेष मोटर बोट के जरिए सैन्य इंजीनियर क्षतिग्रस्त पिलर के बिल्कुल समीप पहुँचे। यहाँ का दृश्य काफी चुनौतीपूर्ण था क्योंकि गंगा की लहरों के बीच पिलर की स्थिति को समझना तकनीकी रूप से काफी जटिल कार्य है। टीम ने बोट से पिलर के नीचे से ऊपर की स्लैब सतह का गहन निरीक्षण किया।

​इस दौरान सेना के अदम्य साहस का परिचय तब मिला जब ब्रिगेडियर के निर्देश पर एक सैन्य जवान को क्षतिग्रस्त स्लैब के पिलर पर चढ़ाया गया। यह काफी जोखिम भरा कार्य था, लेकिन उस जवान ने पिलर के ऊपरी हिस्से पर पहुँचकर कुछ विशिष्ट तकनीकी जांच की और नीचे आकर टीम को अपना फीडबैक दिया। जवान द्वारा दी गई जानकारी और बोट से किए गए निरीक्षण के आधार पर यह समझने की कोशिश की गई कि क्या पिलर की नींव में कोई धंसान या विस्थापन तो नहीं हुआ है। प्राथमिक जांच में पिलर की स्थिति संतोषजनक पाई गई है, जिससे बेली ब्रिज निर्माण की संभावनाओं को और बल मिला है।

बेली ब्रिज: यातायात बहाली का एकमात्र और तात्कालिक विकल्प

​एमईएस और बीआरओ के बीच हुई चर्चा के बाद अब यह पूरी तरह से तय हो चुका है कि विक्रमशिला सेतु पर ‘प्री-फैब्रिकेटेड बेली ब्रिज’ का निर्माण ही एकमात्र समाधान है। चूंकि मुख्य स्लैब की मरम्मत में महीनों का समय लग सकता है और भागलपुर की जनता इतने लंबे समय तक जाम और अलगाव की स्थिति नहीं झेल सकती, इसलिए सेना ने बेली ब्रिज के विकल्प को मंजूरी दी है। कर्नल सामर्थ गुप्ता ने बताया कि इस ब्रिज की लंबाई और चौड़ाई को लेकर सभी तकनीकी विवरण तैयार कर लिए गए हैं।

​बेली ब्रिज की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसे बहुत कम समय में असेंबल किया जा सकता है और यह भारी वजन सहने में भी सक्षम होता है। हालांकि, शुरुआत में इस पर केवल हल्के वाहनों और एम्बुलेंस जैसी आपातकालीन सेवाओं को ही अनुमति दी जाएगी। सेना के इंजीनियरों ने उन जगहों को फाइनल कर दिया है जहाँ ब्रिज के स्टील स्ट्रक्चर को सेतु के मजबूत हिस्सों से जोड़ा जाएगा। 7.5 मीटर की सुरक्षित दूरी यह सुनिश्चित करेगी कि बेली ब्रिज का भार मुख्य पुल के कमजोर हिस्से पर न पड़े।

सोमवार की बैठक: ‘मिशन सेतु’ की निर्णायक रूपरेखा

​रांची से आई एमईएस की टीम सोमवार को भागलपुर में एक अत्यंत महत्वपूर्ण बैठक करने वाली है। इस बैठक में बीआरओ के अधिकारी, जिला प्रशासन के प्रतिनिधि और बिहार राज्य पुल निर्माण निगम के वरिष्ठ अभियंता शामिल होंगे। सूत्रों का कहना है कि इस बैठक में निर्माण कार्य के आरंभ की आधिकारिक तिथि और संसाधनों के आवंटन पर ठोस निर्णय लिया जाएगा। सेना के अधिकारी चाहते हैं कि निर्माण प्रक्रिया शुरू होने से पहले सुरक्षा और रसद (Logistics) की सभी व्यवस्थाएं पुख्ता कर ली जाएं।

​सोमवार को होने वाली इस उच्चस्तरीय वार्ता में एमईएस के अधिकारी यह भी तय करेंगे कि निर्माण कार्य के दौरान सेतु पर आम लोगों की आवाजाही को किस तरह नियंत्रित किया जाए। जिला प्रशासन को निर्देश दिया जा सकता है कि वे निर्माण स्थल के आसपास सुरक्षा घेरा और अधिक मजबूत करें ताकि सेना की टीम बिना किसी बाहरी बाधा के अपने काम को अंजाम दे सके। इस बैठक के बाद ही यह स्पष्ट होगा कि भागलपुर की जनता को कब तक इस सेतु के माध्यम से गंगा पार करने की सुविधा मिल सकेगी।

आईआईटी पटना और संयुक्त रिपोर्ट: विज्ञान और शक्ति का मेल

​विक्रमशिला सेतु की मरम्मत का यह कार्य केवल सेना के भरोसे नहीं है, बल्कि इसमें देश के प्रमुख शिक्षण संस्थान आईआईटी पटना की मेधा का भी बड़ा योगदान है। जानकारी के अनुसार, बेली ब्रिज का निर्माण एमईएस, बीआरओ और आईआईटी पटना के विशेषज्ञों द्वारा तैयार की गई एक संयुक्त रिपोर्ट (Joint Report) के आधार पर किया जाएगा। आईआईटी पटना के अभियंताओं ने सेतु के कंक्रीट और स्टील की उम्र व क्षमता का जो वैज्ञानिक विश्लेषण किया है, उसे सेना की टीम ने अपने ‘ब्लूप्रिंट’ में शामिल किया है।

​यह संयुक्त रिपोर्ट इस पूरे मिशन का मार्गदर्शक दस्तावेज होगी। इसमें पिलर की वहन क्षमता से लेकर गंगा के जलस्तर और हवा के दबाव जैसे सभी कारकों का ध्यान रखा गया है। एमईएस के ब्रिगेडियर ने संकेत दिया है कि वे आईआईटी के सुझावों और बीआरओ के अनुभवों के आधार पर ही बेली ब्रिज की डिजाइन को अंतिम रूप देंगे। सेना, बीआरओ और शैक्षणिक संस्थानों का यह समन्वय यह दर्शाता है कि इस समस्या के समाधान के लिए सरकार और रक्षा मंत्रालय ने अपनी पूरी ताकत झोंक दी है।

भागलपुर के लिए उम्मीदों की नई किरण

​रविवार दोपहर का यह निरीक्षण भागलपुर के लिए किसी बड़ी राहत से कम नहीं है। सेतु के क्षतिग्रस्त होने के बाद से जिस तरह से परिवहन व्यवस्था पंगु हो गई थी, उसे देखते हुए सेना का आगमन एक ‘सुरक्षा कवच’ की तरह महसूस किया जा रहा है। स्थानीय लोगों ने घाट किनारे और सेतु के पास खड़े होकर सेना की इस कार्रवाई को देखा और उनके प्रति आभार व्यक्त किया। प्रशासन का भी मानना है कि सेना की भागीदारी से न केवल काम की गति बढ़ेगी, बल्कि इसकी गुणवत्ता और सुरक्षा भी विश्वस्तरीय होगी।

​सेतु के टूटे हिस्से को काफी देर तक देखने और एक-एक सेंटीमीटर की बारीकी से जांच करने के बाद सेना की टीम अब अपनी अंतिम रणनीति बना चुकी है। सोमवार की बैठक के बाद जैसे ही मिशन को ‘गो सिग्नल’ मिलेगा, भागलपुर के परिवहन इतिहास में एक नया अध्याय शुरू होगा। गंगा की लहरों के ऊपर लोहे और साहस से बनने वाला यह बेली ब्रिज केवल एक पुल नहीं, बल्कि संकट के समय में भारतीय सेना की अपने नागरिकों के प्रति प्रतिबद्धता का प्रतीक बनेगा। फिलहाल, पूरे शहर की नजरें सोमवार को होने वाली बैठक और उसके बाद शुरू होने वाले निर्माण कार्य पर टिकी हैं।

  • ये भी पढ़े..

    भागलपुर में गैस, पेट्रोल और डीजल की आपूर्ति पूरी तरह सामान्य, प्रशासन ने अफवाहों से बचने की अपील की

    Share Add as a preferred…

    विक्रमशिला सेतु पर वायरल रीलों को लेकर प्रशासन सख्त, भ्रामक जानकारी फैलाने वालों पर होगी कानूनी कार्रवाई

    Share Add as a preferred…