
भागलपुर। भागलपुर की पहचान और उत्तर व दक्षिण बिहार के बीच के सबसे मजबूत राजनैतिक व व्यापारिक सेतु, ‘विक्रमशिला महासेतु’ के क्षतिग्रस्त होने के बाद उपजे अभूतपूर्व संकट ने पूरे कोसी और सीमांचल क्षेत्र को एक ऐसी राजनैतिक और आर्थिक घेराबंदी में डाल दिया है, जिसका समाधान अब जमीन पर नहीं बल्कि गंगा की उफनती लहरों के बीच खोजा गया है। पुल के जर्जर होने और आवागमन ठप होने से कटिहार, पूर्णिया, अररिया, किशनगंज और नवगछिया जैसे इलाकों का सड़क संपर्क पूरी तरह से छिन्न-भिन्न हो गया है। इस विषम परिस्थिति में भागलपुर जिला प्रशासन ने एक ऐसी ‘मैरीटाइम’ योजना पर काम शुरू किया है, जो आने वाले दिनों में इस क्षेत्र की आर्थिक रीढ़ को फिर से खड़ा कर सकती है। जिलाधिकारी नवल किशोर चौधरी की विशेष पहल पर पश्चिम बंगाल की राजधानी कोलकाता से चार बड़े मालवाहक जहाज भागलपुर के लिए रवाना किए गए हैं। ये जहाज केवल नाव नहीं, बल्कि कोसी-सीमांचल के उन लाखों लोगों के लिए एक ‘लाइफ सपोर्ट’ की तरह काम करेंगे, जो पिछले कई दिनों से पुल की मरम्मत की बाट जोह रहे हैं।
कोलकाता से मंगाया गया ‘फ्लोटिंग ब्रिज’: तिनटंगा से कहलगांव के बीच का नया रास्ता
विक्रमशिला सेतु के टूटने के बाद से भागलपुर शहर और नवगछिया के बीच मालवाहक ट्रकों और भारी वाहनों का आना-जाना पूरी तरह बंद है। इसका सीधा असर रोजमर्रा की वस्तुओं की कीमतों और आपूर्ति पर पड़ा है। स्थिति की नजाकत को देखते हुए प्रशासन ने कोलकाता की विशेषज्ञ कंपनी से संपर्क साधा। जिलाधिकारी के प्रयासों का परिणाम यह रहा कि अब गंगा की लहरों पर भारी वाहनों को पार कराने के लिए चार विशेष मालवाहक जहाजों का इंतजाम किया गया है। इन जहाजों के परिचालन के लिए जो मुख्य रूट चुना गया है, वह तिनटंगा करारी घाट और कहलगांव घाट के बीच का है।
यह मार्ग सामरिक और व्यापारिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है क्योंकि यह भारी वाहनों को भागलपुर शहर के भीतर आए बिना ही राष्ट्रीय राजमार्ग के एक हिस्से से दूसरे हिस्से तक पहुँचाने की क्षमता रखता है। कोलकाता से मंगाए गए इन जहाजों की सबसे बड़ी खासियत इनकी ‘लोड बेयरिंग’ क्षमता है। जानकारी के अनुसार, ये जहाज एक बार में 10 से 24 भारी वाहनों (ट्रक और बसें) को एक तट से दूसरे तट तक सुरक्षित ले जाने में सक्षम हैं। यह उस ‘रो-रो’ (Roll-on/Roll-off) तकनीक जैसा ही है, जो बड़े बंदरगाहों पर इस्तेमाल की जाती है।
शार्क शिपिंग कंपनी की विशेषज्ञ टीम ने किया गंगा का मुआयना
इस बड़े प्रोजेक्ट को धरातल पर उतारने के लिए केवल जहाजों का आना काफी नहीं है, बल्कि गंगा के बदलते जलस्तर और तलहटी (Siltation) की स्थिति को समझना भी अनिवार्य है। इसी उद्देश्य से कोलकाता की प्रतिष्ठित ‘शार्क शिपिंग कंपनी’ के दो वरिष्ठ निदेशक, मोहम्मद अरशद और तनवीर हसन खुद भागलपुर पहुँचे हैं। उन्होंने स्थानीय प्रशासनिक अधिकारियों और तकनीकी विशेषज्ञों के साथ तिनटंगा करारी और कहलगांव के घाटों का विस्तृत भौतिक निरीक्षण किया।
विशेषज्ञों की इस टीम ने गंगा के बहाव की गति, घाटों की गहराई और रैंप (जहाज पर चढ़ने का स्थान) बनाने की संभावनाओं को परखा है। शार्क शिपिंग कंपनी के निदेशकों ने माना कि विक्रमशिला सेतु पर दबाव कम करने के लिए यह एक चुनौतीपूर्ण लेकिन पूरी तरह व्यावहारिक समाधान है। उनके अनुसार, कोलकाता से चलने वाले ये जहाज विशेष रूप से उथले पानी में भी भारी वजन के साथ चलने के लिए डिजाइन किए गए हैं। निरीक्षण के दौरान यह भी देखा गया कि किस तरह के प्लेटफॉर्म बनाए जाएं ताकि बड़े ट्रक बिना किसी दुर्घटना के जहाज पर चढ़ और उतर सकें।
कोसी-सीमांचल की थम चुकी रफ्तार को मिलेगा ‘डबल बूस्टर’
विक्रमशिला सेतु का टूटना केवल यातायात की समस्या नहीं है, बल्कि यह भागलपुर और आसपास के जिलों की अर्थव्यवस्था पर एक बड़ा प्रहार है।
- व्यापारिक नुकसान: पूर्णिया और कटिहार से आने वाले मक्का, जूट और अन्य कृषि उत्पादों का ट्रक अब झारखंड और पश्चिम बंगाल की ओर नहीं बढ़ पा रहा है।
- सप्लाई चेन: भागलपुर शहर में निर्माण सामग्री (गिट्टी और बालू) के दाम आसमान छूने लगे हैं क्योंकि ट्रक अब मुंगेर या अन्य लंबे रास्तों से होकर आ रहे हैं।
- स्वास्थ्य आपातकाल: सीमांचल क्षेत्र के मरीज जो इलाज के लिए भागलपुर या पटना जाते हैं, उनके लिए यह सेतु जीवन-मरण का सवाल बना हुआ है।
प्रशासन द्वारा मंगाए गए ये चार जहाज इस ‘इकोनॉमिक पैरालिसिस’ (आर्थिक लकवा) को खत्म करने में मील का पत्थर साबित होंगे। एक बार में 24 ट्रक ले जाने की क्षमता का मतलब है कि अगर ये जहाज दिन भर में 10 फेरे भी लगाते हैं, तो सैकड़ों वाहनों का दबाव पुल के वैकल्पिक रास्तों से हट जाएगा। इससे न केवल समय की बचत होगी, बल्कि ईंधन के अतिरिक्त खर्च और माल ढुलाई की लागत में भी कमी आएगी।
चुनौतियां और प्रशासनिक सक्रियता: जिलाधिकारी की सधी हुई रणनीति
जिलाधिकारी नवल किशोर चौधरी इस पूरे प्रोजेक्ट की पल-पल की निगरानी कर रहे हैं। उनका मानना है कि जब तक विक्रमशिला सेतु का स्थाई समाधान (मरम्मत या नया समानांतर पुल) नहीं हो जाता, तब तक हमें ‘जलमार्ग’ को ही अपना मुख्य राजमार्ग मानना होगा। प्रशासन के लिए सबसे बड़ी चुनौती घाटों तक पहुँचने वाली सड़कों की मरम्मत करना है। कहलगांव और तिनटंगा के ग्रामीण रास्तों को भारी ट्रकों के वजन के लायक बनाना एक बड़ी इंजीनियरिंग चुनौती है, जिस पर कार्य योजना तैयार कर ली गई है।
घाटों पर रोशनी की व्यवस्था, सुरक्षा गार्डों की तैनाती और एक व्यवस्थित ‘टोल व टोकन’ प्रणाली लागू करने पर भी विचार किया जा रहा है। प्रशासन यह सुनिश्चित करना चाहता है कि जहाज पर चढ़ने के दौरान वैसी अफरा-तफरी न मचे जैसी वर्तमान में बरारी घाट पर छोटी नावों के समय देखी जा रही है। शार्क शिपिंग कंपनी के इंजीनियरों ने सुझाव दिया है कि जहाजों के सुरक्षित परिचालन के लिए गंगा के कुछ हिस्सों में ‘ड्रेजिंग’ (मिट्टी हटाना) की भी आवश्यकता पड़ सकती है, ताकि जहाज बीच मझधार में न फंसें।
आम यात्रियों के लिए क्या होगा बदलाव?
हालांकि ये जहाज मुख्य रूप से मालवाहक वाहनों के लिए हैं, लेकिन इनकी क्षमता इतनी अधिक है कि ये आपात स्थिति में एम्बुलेंस और अन्य आवश्यक सेवाओं के वाहनों को भी प्राथमिकता पर पार करा सकेंगे। वर्तमान में बरारी घाट पर जो यात्री फेरी सेवा चल रही है, वहां भारी वाहनों को ले जाने की सुविधा नहीं है। इन चार जहाजों के आने से बरारी घाट पर यात्रियों का दबाव भी कम होने की उम्मीद है क्योंकि अधिकांश व्यापारिक गतिविधियां तिनटंगा-कहलगांव रूट पर शिफ्ट हो जाएंगी।
भागलपुर के लोगों के लिए यह एक नई तरह का अनुभव होगा। गंगा के पाट पर इतने बड़े जहाजों का परिचालन इस क्षेत्र के परिवहन इतिहास में एक नया अध्याय जोड़ेगा। कोसी-सीमांचल की जनता जो खुद को कटा हुआ महसूस कर रही थी, अब उम्मीद कर रही है कि कोलकाता से आए ये ‘मददगार’ उनके विकास का पहिया फिर से घुमा देंगे। जिलाधिकारी ने स्पष्ट किया है कि कागजी खानापूर्ति के बजाय अब धरातल पर काम दिखना चाहिए, और यही वजह है कि कोलकाता की टीम के साथ तालमेल बैठाकर घाटों को ‘रो-रो’ सेवा के लिए युद्धस्तर पर तैयार किया जा रहा है। आने वाले सप्ताह में इन जहाजों के ट्रायल के साथ ही भागलपुर की सड़कों पर फिर से भारी वाहनों की रौनक लौटने की संभावना है।


