
भागलपुर। चैत की तपती दुपहरी और पछुआ हवाओं के झोंकों के बीच जब किसान सुनहरी गेहूं की बालियों को सहेजने की जद्दोजहद में जुटे हैं, तब भागलपुर के नाथनगर से एक ऐसी हृदयविदारक खबर आई है जिसने मानवीय संवेदनाओं को झकझोर कर रख दिया है। नाथनगर थाना क्षेत्र के फतेहपुर गांव में मंगलवार को खुशियों की खलिहान अचानक चीख-पुकार और मातम के मरघट में तब्दील हो गई। गेहूं की तैयारी (दौनी) के दौरान एक थ्रेसर मशीन काल बनकर आई और सुबो देवी नामक महिला की जिंदगी को हमेशा के लिए खामोश कर दिया। यह हादसा केवल एक आकस्मिक मौत नहीं है, बल्कि यह उन हजारों ग्रामीण महिलाओं के जीवन की असुरक्षा की कहानी है जो आधुनिक मशीनों के बीच अपनी जान जोखिम में डालकर परिवार का पेट पालने में मदद करती हैं।
फतेहपुर गांव के एक छोटे से खेत के किनारे खड़ी वह थ्रेसर मशीन, जो कुछ मिनट पहले तक अनाज और भूसे को अलग कर रही थी, अचानक सुबो देवी के लिए यमराज का फंदा बन गई। साड़ी का एक सिरा और घूमता हुआ थ्रेसर का बेल्ट—इन दोनों के बीच का वह कुछ सेकंड का फासला कब मिट गया, किसी को पता भी नहीं चला। जब तक लोग समझ पाते और मशीन का इंजन बंद कर पाते, तब तक सुबो देवी की देह लहूलुहान होकर मशीन के जबड़ों में फंस चुकी थी।
होनी का खूनी खेल: खलिहान में कैसे उतरी मौत
फतेहपुर गांव में मंगलवार की सुबह अन्य दिनों की तरह ही सक्रिय थी। गेहूं की फसल कटकर खलिहान में आ चुकी थी और सुबो देवी अपने घर के पास ही थ्रेसर के पास काम में हाथ बंटा रही थीं। गांव के लोग बताते हैं कि सुबो देवी काफी मेहनती थीं और हर साल इस मौसम में वे खेती के कामों में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेती थीं। दोपहर के वक्त जब धूप अपने पूरे शबाब पर थी, तभी अचानक एक तेज चीख ने पूरे इलाके को सुन्न कर दिया।
काम करने के दौरान सुबो देवी की साड़ी का पल्लू थ्रेसर की घूमती हुई धुरी या बेल्ट की चपेट में आ गया। थ्रेसर मशीन इतनी शक्तिशाली थी कि उसने साड़ी के साथ सुबो देवी को भी अपनी ओर खींच लिया। मशीन की गति इतनी तेज थी कि उन्हें संभलने या पीछे हटने का एक मौका भी नहीं मिला। वहां मौजूद ग्रामीणों और परिजनों ने जैसे ही यह मंजर देखा, उनके हाथ-पांव फूल गए। आनन-फानन में शोर मचाया गया और मशीन के पास खड़े ऑपरेटर ने इंजन को बंद किया, लेकिन तब तक थ्रेसर के ब्लेड और रोटर सुबो देवी को बुरी तरह जख्मी कर चुके थे। खलिहान की वह मिट्टी, जो थोड़ी देर पहले तक अनाज की खुशबू से सराबोर थी, अब खून से लाल हो चुकी थी।
मायागंज की ओर भागती एंबुलेंस और दम तोड़ती उम्मीदें
हादसे के बाद फतेहपुर गांव में अफरा-तफरी का ऐसा माहौल बना कि किसी को कुछ सूझ नहीं रहा था। सुबो देवी की गंभीर हालत को देखते हुए परिजनों ने एक पल भी बर्बाद नहीं किया। उन्हें तुरंत उठाकर वाहन पर लादा गया और भागलपुर के सबसे बड़े अस्पताल, जवाहरलाल नेहरू चिकित्सा महाविद्यालय अस्पताल (मायागंज) की ओर रुख किया गया। रास्ते भर परिजनों की प्रार्थनाएं और सिसकियां चलती रहीं। सुबो देवी के शरीर से बहता खून और उनकी उखड़ती सांसें यह गवाही दे रही थीं कि चोटें बहुत गहरी हैं।
अस्पताल पहुँचते ही इमरजेंसी वार्ड के डॉक्टरों ने उनकी जांच शुरू की। लेकिन होनी को कुछ और ही मंजूर था। अस्पताल की दहलीज तक पहुँचते-पहुँचते सुबो देवी के संघर्षरत शरीर ने हार मान ली। डॉक्टरों ने नब्ज टटोलने के बाद उन्हें मृत घोषित कर दिया। डॉक्टरों का कहना था कि मशीन की चपेट में आने से शरीर के अंदरूनी हिस्सों में घातक चोटें आईं और अधिक रक्तस्राव मौत का मुख्य कारण बना। अस्पताल के उस ठंडे सफेद गलियारे में जब सुबो देवी की मौत की आधिकारिक पुष्टि हुई, तो वहां मौजूद परिजनों के सब्र का बांध टूट गया।
परिजनों का वज्रपात: बज्रंगी मंडल और परिवार का छलका दर्द
मायागंज अस्पताल के बाहर परिजनों का रो-रोकर बुरा हाल है। मृतक सुबो देवी के परिजन बज्रंगी मंडल ने बताया कि वे लोग साधारण ग्रामीण हैं और खेती ही उनके जीवन का आधार है। उन्होंने कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि जिस मशीन से वे अनाज निकालकर घर की सुख-समृद्धि की उम्मीद कर रहे थे, वही मशीन उनके परिवार के एक सदस्य को लील जाएगी। सुबो देवी की मौत ने उनके बच्चों और परिवार के सिर से उस साये को छीन लिया है जो हर सुख-दुख में उनके साथ खड़ा रहता था।
गांव के लोग बताते हैं कि सुबो देवी व्यवहार कुशल और मिलनसार महिला थीं। फतेहपुर गांव में आज किसी के घर में चूल्हा नहीं जला। हर कोई उस खौफनाक मंजर को याद कर सिहर उठता है जब मशीन ने उन्हें अपनी चपेट में लिया था। बज्रंगी मंडल और अन्य परिजनों के आंसू नहीं थम रहे हैं। उनके लिए यह एक ऐसी क्षति है जिसकी भरपाई कोई मुआवजा या सहानुभूति नहीं कर सकती।
कृषि मशीनीकरण की कीमत: क्या सुरक्षा के मानक केवल कागजों पर हैं?
नाथनगर की यह घटना एक बार फिर उस कड़वी हकीकत को उजागर करती है जिसे हम हर साल कटनी और दौनी के सीजन में नजरअंदाज कर देते हैं। थ्रेसर मशीनें आधुनिक खेती के लिए जितनी जरूरी हैं, उतनी ही खतरनाक भी साबित हो रही हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में चलने वाले अधिकांश थ्रेसर पुराने मॉडलों के होते हैं, जिनमें सुरक्षा गार्ड (Safety Guards) का अभाव होता है। अक्सर मशीनों की बेल्ट और घूमते हुए हिस्से खुले रहते हैं, जो कपड़ों या हाथों को आसानी से पकड़ लेते हैं।
विशेषज्ञों का कहना है कि गेहूं की दौनी के समय धूल और शोर इतना अधिक होता है कि काम करने वाले का ध्यान भटकना स्वाभाविक है। सुबो देवी के मामले में भी उनकी ढीली साड़ी मौत का कारण बनी। विशेषज्ञों और कृषि विभाग द्वारा बार-बार यह सलाह दी जाती है कि थ्रेसर या अन्य भारी मशीनों के पास काम करते समय तंग कपड़े पहनने चाहिए और महिलाओं को विशेष रूप से अपने आंचल या पल्लू को संभालकर रखना चाहिए। लेकिन जागरूकता की कमी और काम के दबाव में इन छोटे मगर जीवन रक्षक नियमों की अनदेखी हो जाती है।
प्रशासन और समाज के लिए एक बड़ा सबक
नाथनगर पुलिस को इस घटना की सूचना दे दी गई है और पुलिस ने मामले की जानकारी ली है। हालांकि यह एक शुद्ध रूप से दुर्घटना का मामला है, लेकिन इसने ग्रामीण क्षेत्रों में औद्योगिक सुरक्षा के अभाव पर सवाल खड़े कर दिए हैं। फतेहपुर गांव के स्थानीय लोगों का कहना है कि मशीनों के ऑपरेटरों को भी प्रशिक्षित होना चाहिए और उन्हें यह सुनिश्चित करना चाहिए कि मशीन के आसपास काम करने वाला व्यक्ति सुरक्षित दूरी पर हो।
अक्सर देखा जाता है कि मजदूरी बचाने या काम जल्द निपटाने के चक्कर में एक ही मशीन पर क्षमता से अधिक लोग काम करने लगते हैं। सुबो देवी की मौत ने फतेहपुर की गलियों में सन्नाटा तो पसरा ही दिया है, साथ ही यह भागलपुर के अन्य गांवों के किसानों के लिए भी एक गंभीर चेतावनी है। खेतों में काम करना केवल पसीने का खेल नहीं है, बल्कि यहां हर कदम पर सावधानी की आवश्यकता है।
निष्कर्ष: सुनहरी फसल पर मातम की चादर
जैसे-जैसे शाम ढल रही है, फतेहपुर गांव की हवा में गेहूं की खुशबू के साथ सुबो देवी के परिजनों के रुदन की आवाजें घुल रही हैं। भागलपुर की इस ग्रामीण बेल्ट में यह हादसा लंबे समय तक याद रखा जाएगा। सरकार और प्रशासन को चाहिए कि वे खेती के इन व्यस्त सीजनों में ‘सुरक्षा अभियान’ चलाएं ताकि फिर कोई सुबो देवी किसी थ्रेसर की भेंट न चढ़े।
फतेहपुर की सुनहरी फसल इस बार अनाज के दानों के साथ एक परिवार के आंसुओं का बोझ भी ढो रही है। एक छोटी सी लापरवाही ने एक घर का आंगन सूना कर दिया। इस दुखद घड़ी में ‘द वॉइस ऑफ बिहार’ परिवार मृतक सुबो देवी की आत्मा की शांति की प्रार्थना करता है और उनके शोक संतप्त परिजनों के प्रति गहरी संवेदना प्रकट करता है। इस घटना से सबक लेकर यदि अन्य किसान सतर्क हो जाएं, तो शायद सुबो देवी की यह कुर्बानी व्यर्थ नहीं जाएगी। याद रखें, खलिहान में अनाज से ज्यादा कीमती आपकी और आपके अपनों की जान है।


