दिल्ली की भीड़ में खामोश हुई पीरपैंती के लाल की धड़कन: दरियागंज के कमरे में फंदे से लटका मिला 21 वर्षीय शेख दिल्लो का शव, घर में मचा कोहराम

भागलपुर/पीरपैंती। बिहार के सीमावर्ती इलाके पीरपैंती से रोजी-रोटी की तलाश में देश की राजधानी दिल्ली गए एक युवा मजदूर की संदिग्ध परिस्थितियों में मौत ने पूरे इलाके को झकझोर कर रख दिया है। भागलपुर जिले के पीरपैंती बाजार निवासी शेख मल्लू का 21 वर्षीय पुत्र शेख दिल्लो सोमवार की सुबह दिल्ली के दरियागंज इलाके में अपने कमरे के भीतर फंदे से झूलता पाया गया। वह आंखों में बेहतर भविष्य और परिवार की माली हालत सुधारने के सपने लेकर दिल्ली की व्यस्त गलियों में मजदूरी करने गया था, लेकिन किसे पता था कि वहां से उसकी वापसी तिरंगे या अपनों के कंधे पर एक बेजान शरीर के रूप में होगी। 11 मई 2026 की वह सुबह पीरपैंती के उस घर के लिए काल बनकर आई, जहाँ का चिराग अब हमेशा के लिए बुझ चुका है। इस घटना ने एक बार फिर महानगरों की चकाचौंध के पीछे छिपे प्रवासी मजदूरों के अकेलेपन और उनके मानसिक एवं शारीरिक संघर्ष की कड़वी हकीकत को उजागर कर दिया है।

दरियागंज की वो मनहूस सुबह: जब खिड़की से दिखा खौफनाक मंजर

​दिल्ली का दरियागंज इलाका अपनी व्यस्तता और व्यापारिक गतिविधियों के लिए जाना जाता है। इसी इलाके के एक छोटे से कमरे में शेख दिल्लो अपने कुछ साथियों के साथ रहता था। रोज की तरह सोमवार की सुबह भी उसके दोस्त काम पर जाने की तैयारी कर रहे थे। जब काफी देर तक दिल्लो ने अपने कमरे का दरवाजा नहीं खोला और अंदर से कोई हलचल सुनाई नहीं दी, तो साथियों को चिंता हुई। उन्होंने पहले तो दरवाजा खटखटाया और आवाजें दीं, लेकिन जब कोई जवाब नहीं मिला, तो संदेह गहरा गया।

​घबराहट में दोस्तों ने कमरे की खिड़की से अंदर झांकने की कोशिश की। जैसे ही उनकी नजर अंदर पड़ी, सबके होश उड़ गए। 21 साल का ऊर्जावान दिल्लो कमरे की छत से फंदे के सहारे लटका हुआ था। वह पूरी तरह बेजान हो चुका था। दोस्तों का शोर सुनकर आसपास रहने वाले अन्य प्रवासी मजदूर और स्थानीय लोग भी मौके पर जमा हो गए। दिल्लो का एक सगा भाई भी दिल्ली के ही दूसरे इलाके में मजदूरी करता था। आनन-फानन में उसे सूचना दी गई। जैसे ही भाई वहां पहुँचा, अपने छोटे भाई की लाश देखकर वह सुध-बुध खो बैठा। दिल्ली पुलिस को भी मामले की जानकारी दी गई, जिन्होंने मौके पर पहुँचकर शव को फंदे से नीचे उतारा और कानूनी प्रक्रिया शुरू की।

पीरपैंती बाजार में पसरा मातम: पिता शेख मल्लू पर टूटा दुखों का पहाड़

​दिल्ली से जैसे ही यह मनहूस खबर पीरपैंती बाजार पहुँची, पूरे मोहल्ले में सन्नाटा पसर गया। दिल्लो के पिता शेख मल्लू को जब उनके बड़े बेटे ने फोन पर छोटे भाई की मौत की जानकारी दी, तो उनके पैरों तले जमीन खिसक गई। एक पिता के लिए इससे बड़ा दुख क्या होगा कि जिस बेटे को उसने मेहनत-मजदूरी के लिए परदेस भेजा था, उसकी मौत की खबर उसे फोन पर मिले। घर में महिलाओं की चीख-पुकार सुनकर पड़ोसी भी दौड़ पड़े।

​शेख दिल्लो केवल 21 वर्ष का था, यानी अपनी उम्र के उस पड़ाव पर जहाँ सपने सबसे ऊंचे होते हैं। वह अपने परिवार का सहारा बनने के लिए पीरपैंती की गलियों को छोड़कर दिल्ली गया था। स्थानीय लोगों ने बताया कि दिल्लो काफी मिलनसार और मेहनती युवक था। वह अपनी कमाई का एक बड़ा हिस्सा घर भेजता था ताकि उसके छोटे भाई-बहनों की पढ़ाई और घर का खर्च चल सके। सोमवार की पूरी दोपहर शेख मल्लू के घर पर सांत्वना देने वालों का तांता लगा रहा, लेकिन पिता की आँखों के आंसू थमने का नाम नहीं ले रहे थे। उन्हें रह-रहकर अपने बेटे की वो बातें याद आ रही थीं, जो उसने पिछली बार घर आने पर या फोन पर की थीं।

पंचायत प्रतिनिधियों ने व्यक्त किया शोक: शव लाने की तैयारी

​घटना की जानकारी मिलते ही स्थानीय पंचायत के मुखिया प्रतिनिधि मोहम्मद सुल्तान और अन्य गणमान्य व्यक्ति पीड़ित परिवार के घर पहुँचे। मुखिया प्रतिनिधि ने पीड़ित पिता को ढांढस बंधाया और दिल्ली में रह रहे उनके बड़े बेटे से बात कर स्थिति का जायजा लिया। मोहम्मद सुल्तान ने कहा कि एक गरीब परिवार के युवा का इस तरह असमय काल कवलित होना अत्यंत दुखद और पीड़ादायक है। उन्होंने बताया कि शेख दिल्लो दिल्ली में मजदूरी कर अपने परिवार का भरण-पोषण कर रहा था।

​फिलहाल, दिल्ली पुलिस ने शव को पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया है। पोस्टमार्टम रिपोर्ट आने के बाद ही यह स्पष्ट हो पाएगा कि यह आत्महत्या का मामला है या इसके पीछे कोई और कारण। हालांकि, प्राथमिक दृष्टि में इसे फंदा लगाकर की गई आत्महत्या ही माना जा रहा है। दिल्ली में मौजूद दिल्लो का भाई और उसके दोस्त एम्बुलेंस और अन्य कागजी कार्रवाई पूरी करने में जुटे हैं ताकि जल्द से जल्द शव को उसके पैतृक गांव पीरपैंती लाया जा सके। उम्मीद जताई जा रही है कि मंगलवार देर रात या बुधवार सुबह तक पार्थिव शरीर पीरपैंती पहुँचेगा।

महानगरों का संघर्ष और प्रवासी मजदूरों की त्रासदी

​शेख दिल्लो की मौत ने एक बार फिर बिहार से पलायन करने वाले हजारों युवाओं की उस त्रासदी को सामने ला दिया है, जो रोजी-रोटी के लिए अपनों से दूर अजनबी शहरों में रहते हैं। दिल्ली, मुंबई और सूरत जैसे शहरों में बिहार के युवा बेहद कठिन परिस्थितियों में काम करते हैं। अक्सर छोटे और घुटन भरे कमरों में कई-कई लोग साथ रहते हैं, जहाँ न तो प्राइवेसी होती है और न ही मानसिक तनाव साझा करने का कोई उचित माध्यम।

​21 वर्ष की उम्र में किसी युवक का ऐसा कदम उठाना इस बात की ओर इशारा करता है कि शायद वह किसी गहरे मानसिक दबाव या घरेलू परेशानी से जूझ रहा था। प्रवासी मजदूरों के लिए बीमारी, काम की अनिश्चितता और घर की याद अक्सर अवसाद का कारण बन जाती है। पीरपैंती के इस युवक की मौत ने उन तमाम परिवारों को डरा दिया है जिनके बच्चे बाहर रहकर मजदूरी करते हैं। स्थानीय नागरिकों की मांग है कि सरकार को ऐसे प्रवासी मजदूरों की सुरक्षा और उनके कल्याण के लिए कुछ ठोस कदम उठाने चाहिए ताकि मुसीबत के समय उन्हें सही परामर्श या सहायता मिल सके।

एक होनहार युवा का दुखद अंत

​शेख दिल्लो अब इस दुनिया में नहीं है, लेकिन उसके पीछे छूटे सवाल और उसका रोता-बिलखता परिवार व्यवस्था के मुंह पर एक तमाचा है। पीरपैंती बाजार की गलियाँ, जहाँ कभी दिल्लो अपने दोस्तों के साथ घूमता था, आज उसकी अंतिम विदाई की प्रतीक्षा कर रही हैं। दिल्ली की पुलिस डायरी में वह शायद एक और ‘सुसाइड केस’ बनकर रह जाएगा, लेकिन उसके पिता शेख मल्लू के लिए वह उनकी उम्मीदों का वह पुल था जो अब टूट चुका है।

​प्रशासनिक स्तर पर भी यह प्रयास किए जा रहे हैं कि शव को लाने में परिवार को कोई आर्थिक दिक्कत न हो। मुखिया प्रतिनिधि ने आश्वासन दिया है कि वे अपनी ओर से और स्थानीय प्रशासन के माध्यम से पीड़ित परिवार को हर संभव सरकारी सहायता दिलवाएंगे। फिलहाल, पीरपैंती बाजार में हर कोई उस पल का इंतजार कर रहा है जब उनके गांव का यह लाल एक अंतिम बार अपनी मिट्टी में लौटेगा। यह घटना हमें यह सोचने पर मजबूर करती है कि आखिर हमारे युवा अपने ही राज्य में रोजगार न पाकर बाहर जाने और वहां घुट-घुट कर मरने के लिए क्यों मजबूर हैं।

​पीरपैंती के शेख दिल्लो का यह मामला केवल एक व्यक्तिगत दुर्घटना नहीं, बल्कि एक सामाजिक विफलता का भी प्रतीक है। उस कमरे की खामोशी और खिड़की से दिखा वह मंजर उन सभी के लिए सबक है जो मजदूरों की मेहनत को तो देखते हैं, लेकिन उनकी पीड़ा और उनके सूनेपन को नजरअंदाज कर देते हैं। दिल्लो की शहादत (मजदूरी के संघर्ष में जान गँवाना) पीरपैंती के इतिहास के पन्नों में एक काले दिन के रूप में दर्ज हो गई है।

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