भागलपुर : ललमटिया के पूर्व थानेदार के खिलाफ केस दर्ज करने की अनुशंसा; केंद्रीय SC-ST आयोग ने ‘पद के दुरुपयोग’ को माना गंभीर अपराध

भागलपुर। बिहार पुलिस की कार्यशैली और वर्दी की हनक का दुरुपयोग करने वाले अधिकारियों के खिलाफ अब संवैधानिक संस्थाओं ने कड़ा रुख अपनाना शुरू कर दिया है। भागलपुर के ललमटिया थाना के पूर्व थानाध्यक्ष राजीव रंजन और उनके सहयोगी पुलिसकर्मियों के लिए आने वाले दिन काफी भारी पड़ने वाले हैं। केंद्रीय अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (SC-ST) आयोग ने ललमटिया की एक महिला की शिकायत पर कड़ा संज्ञान लेते हुए भागलपुर आईजी को पूर्व थानेदार समेत दोषी पुलिसकर्मियों पर प्राथमिकी (FIR) दर्ज करने की अनुशंसा की है। मामला एक महिला को झूठे मुकदमे में जेल भेजने और पद के दुरुपयोग से जुड़ा है। आयोग के इस आदेश ने न केवल पुलिस महकमे में हड़कंप मचा दिया है, बल्कि यह भी स्पष्ट कर दिया है कि रसूख और वर्दी की आड़ में किसी दलित या वंचित वर्ग के अधिकारों का हनन अब बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।

मामला क्या है: झूठा मुकदमा और बहन की गिरफ्तारी

​यह पूरी कानूनी लड़ाई ललमटिया थाना क्षेत्र के पासीटोला निवासी रजनी भारती द्वारा शुरू की गई थी। रजनी भारती का आरोप है कि तत्कालीन थानाध्यक्ष राजीव रंजन और अन्य पुलिसकर्मियों ने उनकी बहन को एक झूठे मुकदमे में फंसाकर जेल भेज दिया। रजनी ने इस अन्याय के खिलाफ पहले जिले के वरीय पुलिस अधिकारियों का दरवाजा खटखटाया, लेकिन वहां से कोई ठोस कार्रवाई नहीं होने पर उन्होंने केंद्रीय एससी-एसटी आयोग में लिखित शिकायत दर्ज कराई।

​शिकायत में रजनी भारती ने मुख्य रूप से ये आरोप लगाए:

  • ​पुलिस द्वारा पद का दुरुपयोग कर निर्दोष को फंसाया गया।
  • ​वरीय पुलिस अधिकारियों को शिकायत करने के बावजूद दोषियों पर कोई कार्रवाई नहीं की गई।
  • ​एससी-एसटी महिला के साथ अत्याचार किया गया।

आयोग की सुनवाई: वरीय अधिकारियों की अनुपस्थिति और तल्ख टिप्पणी

​इस मामले में केंद्रीय आयोग के समक्ष 19 मार्च 2026 को महत्वपूर्ण सुनवाई हुई। इस सुनवाई के दौरान वादिनी रजनी भारती और भागलपुर पुलिस की ओर से साइबर डीएसपी कनिष्क श्रीवास्तव उपस्थित रहे। हालांकि, भागलपुर के आईजी और एसएसपी इस सुनवाई में शामिल नहीं हो सके। उन्होंने पत्राचार के माध्यम से सूचित किया कि जिले में ईद त्योहार की सुरक्षा व्यवस्था और मुख्यमंत्री की यात्रा की तैयारियों के कारण उनका उपस्थित होना संभव नहीं है।

​वरीय अधिकारियों ने आयोग को यह जानकारी जरूर दी कि तत्कालीन थानाध्यक्ष राजीव रंजन को निलंबित (Suspend) कर दिया गया है और उनके विरुद्ध विभागीय कार्यवाही प्रक्रियाधीन है। हालांकि, आयोग ने सुनवाई के दौरान स्पष्ट किया कि घटना में पुलिस द्वारा पद का स्पष्ट दुरुपयोग किया गया है और एससीएसटी महिला के साथ अत्याचार हुआ है।

सख्त फैसला: SC-ST एक्ट और BNSS के तहत केस दर्ज करने का आदेश

​सुनवाई के दौरान साक्ष्यों का अवलोकन करने के बाद आयोग ने माना कि इस मामले में वरीय अधिकारियों ने भी समय रहते दोषियों पर प्रभावी कार्रवाई नहीं की। आयोग ने अब इस मामले में आर-पार की लड़ाई का रुख अपनाया है।

​आयोग ने निम्नलिखित अनुशंसाएं की हैं:

  • प्राथमिकी दर्ज हो: पूर्व थानाध्यक्ष राजीव रंजन और अन्य दोषी पुलिसकर्मियों के विरुद्ध एससी-एसटी (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 की धारा 4 और भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की सुसंगत धाराओं के तहत विधि सम्मत केस पंजीकृत किया जाए।
  • वरिष्ठ अधिकारी से जांच: मामले की जांच किसी वरिष्ठ स्तर के पुलिस अधिकारी से कराने का निर्देश दिया गया है।
  • कड़ी विभागीय कार्रवाई: आयोग ने दोषियों के विरुद्ध नियमानुसार कड़ी विभागीय कार्यवाही सुनिश्चित करने को कहा है।
  • एक महीने का अल्टीमेटम: आयोग ने भागलपुर पुलिस को इन तमाम निर्देशों के अनुपालन की रिपोर्ट एक महीने के भीतर प्रस्तुत करने का आदेश दिया है।

वर्दी की मर्यादा और न्याय की उम्मीद

​22 अप्रैल 2026 को सामने आया आयोग का यह फैसला भागलपुर पुलिस की छवि के लिए एक बड़ा झटका है। यह मामला दर्शाता है कि जब रक्षक ही भक्षक बन जाएं, तो आम आदमी का विश्वास डगमगाने लगता है। राजीव रंजन जैसे अधिकारियों पर केस दर्ज होने की अनुशंसा उन तमाम पुलिसकर्मियों के लिए एक सबक है जो कानून को अपनी जागीर समझते हैं। रजनी भारती द्वारा लड़ी गई यह जंग यह साबित करती है कि व्यवस्था के दमन के खिलाफ यदि सही मंच पर आवाज उठाई जाए, तो न्याय की उम्मीद हमेशा जीवित रहती है। अब देखना यह है कि भागलपुर पुलिस प्रशासन एक महीने के भीतर इस पर क्या कार्रवाई करता है।

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